Tuesday, 29 October 2013

आतंकवाद और हम

आतंकवाद और हम 

आज पुनः आतंकवाद नें हमपर विजय पाई है
किसी की मांग उजड़ी  है
तो कहीं सुनी कलाई है
कहीं शोणित की गंगा
तो कहीं सिसकियों की यमुना बहाई है
कभी गुलाबी नगरी
तो कभी बुद्ध भूमि
धमाकों से थर्राई है |

       एक तरफ हम कहते हैं
       कि हम सृष्टि के सर्वश्रेष्ट प्राणी हैं
       और मनुष्यता के नाम पर प्रगतिशील भी
       लेकिनअफ़सोस कि 
       एक बड़े लोकतंत्र का स्वामी
       अपनत्व कि आग में जल रहा है | 
                                                                             
हम तो केवल
इतना जानते हैं कि
हम केवल वादे करना जानते हैं
और उसको निभाने की शक्ति है नगण्य |
हमें अपना अंतर्मन भी सुनाई नहीं देता ,
कि मौत का मातम कितना शर्मसार होता है
और उसे पनाह देने का परिणाम
मरघट का  सा हो सकता है |

       सच है
मनुष्यता जीवन देने में है,
लेने में नहीं क्योंकि यही है आर्षवाणी |

Thursday, 24 October 2013

मैं हिंदी हूँ

मैं हिंदी हूँ 

हर रोज मैं देखता उसे,
वो सकुचाई सहमी सी पड़ी रहती,
वो सबको देखती,
पर उसे शायद ही कोई देखता,
पर हाँ वर्ष में एक दिन,
हर कोई उसकी तरफ देखता,
उसके साथ जीने मरने की कसमें खाता,
वर्ष में एक दिन का अपनापन,
फिर अगले साल तक का रूखापन ?
अरसा बीत गया था उसे देखते-देखते
एक दिन मेरे सब्र का बांध टुटा,
और मैं उसके पास जाकर पूछ बैठा,
कौन हो तुम ?


क्यूँ खामोश सी पड़ी रहती हो यहाँ,
मेरे सवालों ने जैसे उसे नींद से जगाया,
और वो बमुश्किल बोल पाई,
मैं हिंदी हूँ ,
वर्तमान मुझे बहुत कष्ट दे रहा,
भविष्य मुझे अंधकारमय दिख रहा,
अतीत के अच्छे,बुरे पल याद करने की हिम्मत मुझमें नहीं ,
दक्षिण को मेरी जरुरत नहीं,
पश्चिम मुझे चाहता नहीं,
पूरब मुझे अपनाता नहीं,
अब तो उत्तर भी बेरुखी दिखाता |
न्याय के मंदिर में तो कोई मेरा नाम तक नहीं जानते,
और युवा पीढ़ी तो मुझे बिल्कुल नहीं पहचानते,
शहर में मेरी क़द्र नहीं,
अब तो गाँव भी मुझसे आँखे चुराता है,
जिसे देखो वो अंग्रेजी की तरफ भागा जाता है,
किससे कहूँ ,
किस पर निकालूँ ,
अपने मन की गुबार,
अब नहीं सहा जाता,
अपने ही घर में सौतेला व्यवहार,
उसके जवाबों से हैरान परेशान ,
मैं सोचने लगा,
कहीं मैं भी तो नहीं हूँ,
उसका गुनहगार



Monday, 21 October 2013

मर्यादा पुरषोत्तम राम

मर्यादा पुरषोत्तम राम

मित्रों आपमें से बहुतों ने,अमूमन विवाह सम्बंधित विज्ञापनों में लिखा  देखा होगा राम मिलाए जोड़ी,मैंने भी देखा था,लेकिन कल कमला नगर मार्केट की ओर जाते वक़्त बड़े मोटे अक्षरों में इस लाइन पर नजर पड़ी तो मैं सोचने को मजबूर हो गया,की क्या राम एक आदर्श पति थे,व्यक्तिगत रूप से मर्यादा पुरषोत्तम राम करोड़ों जनमानस के लिए पूज्यनीय हैं पर राम एक पति के रूप में कदाचित पूज्यनीय नहीं हैं और ना ही थे(ये मेरा व्यक्तिगत विचार है )| क्या कोई मर्यादा पुरषोत्तम एक धोबी की शंका पर अपनी पत्नी से  अग्नि  परीक्षा के लिए कह सकता है ? राम द्वारा सीता को अग्नि परीक्षा के लिए कहना अयोध्या नरेश की महानता हो सकती है लेकिन यह एक पति की क्रूरता थी | सीता ने भी अपने युग सापेक्ष पति के आदेश का पालन किया,शायद इसलिए वो पञ्च कन्या में शुमार नहीं की जाती (पञ्च कन्या ,तारा ,कुंती ,अहिल्या ,मंदोदरी ,द्रौपदी ).सीता चाहतीं तो राम के आदेश को मानने से इंकार कर सकती थीं,लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया|.राम का महिमामंडन करने वाले ये कहते हैं की उन्होंने दशरथ के 14 वर्षों के वनवास के आदेश को शिरोधार्य कर महान त्याग किया | दुर्भाग्य है की राम की तथाकथित महानता के बीच हम लक्ष्मण और उनकी पत्नी उर्मिला का त्याग भूल जाते हैं| नवविवाहित उर्मिला 14 वर्षों तक विरह की अग्नि में जली थी,पर क्या लक्ष्मण ने उर्मिला को अग्नि परीक्षा के लिए कहा था| क्या आज की लडकियाँ राम जैसा पति चाहेंगी?शायद नहीं | वैसे भी अब सीता को अग्नि परीक्षा की जरुरत नहीं है | क्या ये अच्छा नहीं होता की विज्ञापन एजेंसीयाँ अपना स्लोगन बदलकर लक्ष्मण मिलाए जोड़ी कर ले | 

Tuesday, 15 October 2013

जीवन, मृत्यु

 जीवन, मृत्यु 
अपनी शैया पर लेटे
स्याह अँधेरे में
आसमान की तरफ देखता
असंख्य तारों का
मैं ले रहा था  साक्षात्कार
ज्ञान की चासनी में लपेटे मेरे प्रश्न और उनके आसमानी उत्तर
मुझे आनंद के सागर की सैर करा रहे थे
भूल गया था मैं उस वक़्त
सूर्य की पहली लालिमा और उसके प्रभाव को
जीवन भी तो ऐसा ही है
उस रात्रि के चमकते तारे की तरह
जब तक मृत्यु रूपी सूर्य की पहली किरण
उसे अपने आगोश में ना भर ले
हालाँकि उन असंख्य तारों में
विरले होते हैं,
जो सुबह तक दृष्टिगोचर होते हैं

उनकी चमक लोगों के मानस पटल पर लंबे अरसे तक अंकित रहती है
नहीं चाहिए मुझे चौरासी लाख योनि
ना ही कामना करता हूँ मैं मोक्ष
की,इसी जन्म में मैं साकार करना चाहता हूँ
अपने होने और उसकी चमक को |

Friday, 11 October 2013

छाता और आम आदमी

छाता और आम आदमी 

सुबह जब आँख खुली तो देखा इन्द्र देवता अपने समस्त अवयवों के साथ मौजूद हैं| ,

वैसे कल की गर्मी से यह एहसास हो चूका था की आज किसी भी वक़्त बारिश की बूंदें तपती धरती को अपने आगोश में लेंगी | 

बारिश की बूंदों को देखकर कुछ देर के लिए मै भूल गया की मुझे कार्यालय भी जाना है, एकबारगी मन हुआ की ना जाऊ,फिर पापी पेट ने दस्तक दी और मै बिलकुल वैसे तैयार हो गया जैसे चुनाव के पहले नेतागण होते हैं | 

कर्म के समर में कूदने ,पर अजीब मुसीबत थी चार चक्रीय वाहन है नहीं,त्रि चक्रीय वाहन से जाने से बेहतर था पैदल जाऊ,लेकिन पूरी तरह भींग के जाना नहीं चाहता था,फिर मुझे याद आया छाता| 

बिल्कुल वैसे जैसे चुनावों के वक़्त नेता और राजनीतिक दल आम आदमी को खोजता है |

बड़े प्यार से मैंने छाते को देखा , उसे भी आश्चर्य हुआ की आज मै उसे इतनी तवज्जो क्यों दे रहा हूँ |

खैर रास्ते भर मैंने उसे अपने शरीर से अलग नहीं होने दिया,क्योंकि बारिश इसकी इजाजत नहीं दे रहा था |

हवा का झोंका जिधर से ज्यादा होता मै छाते को उधर मोड़ रहा था| मै सोच रहा था छाते और आम आदमी की किस्मत भी तो एक जैसी होती है। 

बारिश,धुप  और चुनाव के वक़्त दोनों सबसे ज्यादा प्रासंगिक होते हैं। 

बारिश,धुप और चुनाव ख़त्म फिर किसी को इनकी सुध नहीं रहती ।

मेरा कार्यालय आ गया और बारिश भी ख़त्म हो गई थी ।

अन्दर आते ही मैंने सुरेश से कहा इसे मोड़ के रख दो अब कुछ दिनों तक इसकी जरुरत नहीं पड़ेगी ।