Saturday, 11 January 2014

बदलता शहर

बदलता शहर

माचिस के डब्बे सी जगह को घर कहते हैं
जहाँ रात को नींद ना आए उसे शहर कहते हैं,
इंसान ने धरा है जहाँ मशीनों का रूप
भावनाओं की जहाँ नहीं होती कोई पूछ। 
हर जगह दिखेगा जहाँ पाश्चात्य का रंग
मैकडोनल ने जहाँ छीना है कुल्हड़ का संग। 
गगनचुंबी इमारतें और पाताल लोक की तरफ जाता मन
सपनों के बोझ तले जहाँ छीना जा रहा बच्चों का बचपन। 
नीम का पेड़ जहाँ अब दिवास्वप्न लगता है
संयुक्त परिवार तो सिर्फ बुद्धू बक्से में दिखता है। 
माँ यहाँ अब मोम हो गई हैं
संवेदना जहाँ मौन हो गई हैं। 
नियॉन की रोशनी में दीखता जहाँ मॉडलों का अधनंगा शरीर
नोटों की ढेर पर बैठा इंसान भी है यहाँ मन से फ़क़ीर ।
दिखाते हैं जोड़े यहाँ अपने संबंधों को ऐसे
जैसे हों वो राँझा और हीर । 

Monday, 6 January 2014

बचपन और जवानी

बचपन और जवानी 

बचपन में उम्र की सीढियां चढ़कर
जब जवानी की दहलीज पर पहुंचा
तो देखा कामयाबी
दुनियादारी,रिश्तों का मायाजाल
जिंदगी की जद्दोजहद
मेरा इंतजार कर रहे थे, 
फिर मुझे याद  आया अपना बचपन,
कितना नादान था बचपन हमारा
ना मन में कुछ पाने की तमन्ना थी
ना कुछ खोने का डर,
वैसे भी बचपन में खोने के लिए होता क्या है
उम्र के सिवा,
ना रात को सोने की जल्दी थी
ना अलसुबह उठने का दबाव,
बहुत मुश्किल है भूत और वर्त्तमान के फासले को मिटाना,
अभी कामयाबी के पीछे भागता हूँ 
बचपन में तितलियों के पीछे भागता था,
जेब में पैसे नहीं फिर भी उमंगों का सागर था,
बचपन में बहुत से हाथ बढ़ते थे गिरने पर उठाने वाले
अब तो उठाने वाले हाथों के दर्शन विरले ही होते हैं
हर तरफ गिराने वाले हाथ ही नजर आते हैं,
सपने तो अब भी देखता हूँ 
पर उनमें तितलियाँ नहीं होती,
क्या कोई लौटाएगा मेरा बचपन,
मैं भी कितना अल्पज्ञ हूँ
जो वर्त्तमान को भूत में बदलने का सपना देख रहा,
अब तो बचपन की यादों को लेकर ही खुदा के पास जाना है
एक नए बचपन की उम्मीद लेकर।