Saturday, 13 December 2014

कितने बदल गए हम

कभी मारुती 800 हमारी
मुस्कान हुआ करती थी
अब तो ऑडी में भी लोग
परेशान से दिखते हैं,
जमाना क्यों इतना बदल गया
कि जाने पहचाने चेहरे भी
अंजान से  दिखते हैं |
काश ऐसा होता
कि हम अपने ग़मों को
OLX पे बेचकर
खुशियों को Flipcart से खरीद पाते
E.M.I चुकाने की Tension ना होती
तो हम भी खुलकर जिंदगी जी पाते |
महीने की 20 तारीख आते-आते
जब Salary ख़त्म होने को आती है,
तो ईमानदारी भले चुभती हो
पर बेईमानी में नींद कहाँ आती है ?
एक तरफ हम चाँद पर जा रहे
तो दूसरी तरफ बेटों की चाह में
बेटियों की भ्रूण हत्या करवा रहे |
नेताओं का तो काम ही है धर्म की आँच पर
सियासत की रोटी पकाना पर हम आम इंसान
क्यूँ मंदिर मस्जिद के नाम पर एक दूसरे का लहू बहा रहे ?
आज सैकड़ों चैनलों के बावजूद हमारा दिल नहीं बहलता,
सुबह नंगे पांव ओस की बूंदों पर अब कोई नहीं टहलता |
नर्सरी के दाखिले में तो अब अच्छे-अच्छों के पसीने निकल जाते हैं
अमीर तो मखमली बिस्तर पर भी नींद को तरस जाते हैं
और गरीब फुटपाथ पर सोते हुए रौंदे जाते हैं |
संस्कार और संस्कृति की बात करने वाले पिछड़े समझे जाते हैं
और मंदिर में लाखों का चढ़ावा चढ़ाने वाले
बूढ़े माँ बाप की जिम्मेदारी उठाने से कतराते हैं |

Sunday, 30 November 2014

ये कहाँ आ गए हम यूँ ही दूर-दूर चलते

                                ये कहाँ आ गए हम यूँ ही दूर-दूर चलते 
स्कूल के बस्ते में किताबों का बोझ बढ़ गया
जिसे 98 % से काम मार्क्स आया
वो साला रेस में पिछड़ गया,
अब मुर्गे की बांग नहीं 
वाट्स ऍप के Tune से सुबह होती है 
बिस्तर के सामने अब भगवान नहीं 
सन्नी Leone और शकीरा की फोटो लगी होती है | 
कोई हमारी आदतों को 
लाइक करे ना करे इसकी फिकर नहीं 
पर फेसबुक के स्टेटस के लाइक की बड़ी फिकर होती है | 
अपनी चीजों को शेयर करना तो जैसे हम भूल ही गए 
हाँ फेसबुक पर कोई हमारी चीजों को शेयर करे 
तो दिल को बड़ी तसल्ली होती है | 
गुरु की जगह अब गूगल आ गया है 
और बिना गुरु दक्षिणा के वो ज्ञान की रौशनी फैला रिया है | 
एक जमाना था 
जब एक छत के नीचे 
दिन रात कई बच्चों की किलकारियाँ गूंजा करती थी
अब तो एक बच्चे की 
किलकारी में माँ की किलकारी निकल जाती है | 
चावल दाल खाने वाले अब गरीब समझे जाते हैं 
और धन कुबेर अपनी मर्सिडीज़ में 
कुत्ते को पिज़्ज़ा बर्गर खिलाते हैं | 
टेलीग्राम की जगह अब ट्विटर आ गया 
और डाकिये के पत्रों को E mail खा गया | 
गीता कुरान और Bible  की जगह 
Maxim,Debonair Playboy छा गया | 
शिव,हनुमान और राम को 
हमने दोयम दर्जे का बना दिया 
क्योंकि जीते जी हमने 
आसाराम और रामपाल जैसों को भगवान का दर्जा दिला दिया | 
हम दो हमारे दो के चक्कर में
हमने संयुक्त परिवार को सूली पे चढ़ा दिया 
और दोस्तों 
मुफ्त में तो अब हंसी भी नहीं दिखती है 
क्योंकि हंसने,हंसाने के लिए भी अब Laughter Club आ गया 

Friday, 3 October 2014

हे राम तुम कैसे मर्यादा पुरुषोत्तम थे

हे राम तुम कैसे मर्यादा पुरुषोत्तम थे जिसकी पत्नी को जीवन भर कष्ट झेलना पड़ा,जिसके बच्चों को संस्कार तो मिला पर पिता का वो सानिध्य और प्यार नहीं जिसके वो हक़दार थे | तुम्हारी मर्यादाओं के मोह ने उर्मिला का वैवाहिक सुख छीन लिया | राजा के कर्तव्य से विमुख होकर तुमने वनवास जाना बेहतर समझा ताकि तुम्हारी मर्यादा पुरुषोत्तम की छवि पर कोई अंगुली ना उठाए | राजा दशरथ पुत्र वियोग में प्राण त्याग बैठे तब भी तुम्हारी मर्यादा की तंद्रा नहीं टूटी | एक धोबी के बातों की अफवाह पर तुमने जनक नंदनी के चरित्र पर संदेह किया,क्या यहाँ भी तुम मर्यादाओं से बंधे हुए थे | तुमने अग्नि परीक्षा के संदेह की ऐसी नींव डाली जो वर्तमान युग में भी पुरुषो की मानसिकता को जकड़े हुए है | हे राम तुम्हारी मर्यादा पालन की लालसा ने तुम्हें अमर बना कर उन्हें इतिहास में विलीन कर दिया जो तुम्हारी मर्यादा पालन के भुक्त भोगी थे | वर्तमान में क्यों कोई नारी तुम्हें अपने वर के रूप में कामना करे ? ना तुम अच्छे पति साबित हुए,ना अच्छे पुत्र,ना अच्छे पिता और ना ही अच्छे शासक फिर तुम मर्यादा पुरुषोत्तम कैसे राम ?अच्छा है राम तुम इस युग में नहीं हो,ये सोचकर ही मैं काँप उठता हूँ की अगर इस देश का भविष्य तुम्हारे जैसे मर्यादा पुरुषोत्तम के हाथ में आ जाए,,,,,,,नहीं कदापि नहीं | रावण की मानसिकता ने तो केवल उसके स्वयं का विनाश किया पर तुम्हारी मानसिकता ,,,,,,,,,,,,,रहने दो राम तुम तो ज्ञानी हो | मुझे अपनी मर्यादाओं में ही रहने दो | 

Tuesday, 16 September 2014

मोदी,मैजिक और मतदाता

                                                       मोदी,मैजिक और मतदाता
किसी भी लोकतांत्रिक मूल्यों में आस्थावान देश के लिए चुनाव एक बड़ा पर्व माना जाता है | और बात जब भारत की हो तो चुनावों की महत्ता महापर्व सरीखा रूप धारण कर लेती है | आज ही उत्तर प्रदेश सहित कुछ राज्यों के उपचुनावी नतीजे आए हैं सो इसपर,चिंतन मनन (पक्ष,विपक्ष ) और लेखन तो लाजमी है | मई 20 14 में मोदी जब प्रचंड बहुमत से जीत कर आए थे तो भाजपा के साथ-साथ कुछ चुनावी विश्लेषकों ने यह मान लिया था अब अगले कुछ सालों तक भारतीय राजनीति का उदय और अस्त कमल और उसकी सहयोगियों के इर्द गिर्द ही घूमेगा | खैर इस भ्रम को पहला झटका पिछले महीने हुए बिहार विधानसभा के उपचुनावों में लगा और इस टूटन को आज के उपचुनावों के परिणाम ने और पुष्ट कर दिया | आखिर साढ़े तीन महीने में ऐसा क्या हो गया की वही मतदाता जिन्होंने कमल को माथे का ताज बनाया था आज उन्हें उसमें सिर्फ कांटे नजर आने लगे ?अच्छे दिन के वादे खोखले दिखने लगे | इसके पीछे दो तीन वजहें हैं | पहला कि हम आम भारतीय बहुत अधीर हैं,हमें सत्ता और व्यवस्था से बहुत उम्मीदें रहती हैं,हम वो मतदाता हैं जो एक कवि के शब्दों में मन हुआ तो राई को पहाड़ बना दिया और ना मन हुआ तो हिमालय की तरफ आँख उठाकर भी नहीं देखा |हम अभी  राई को आम भारतीय मानसिकता और मोदी के वादों को हिमालय मानकर इसका विश्लेषण करेंगे | मोदी ने जनता से भ्रस्टाचार हटाने,सबको रोजगार देने,स्मार्ट सिटी,वर्ल्ड क्लास स्टेशन,बुलेट ट्रेन,चौबीस घंटे बिजली  सरीखे हिमालयी वादे किए | जबकि जनता टेलीविज़न में दिखाए जाने वाले झंडू बाम वाले विज्ञापन की तरह तुरंत अपनी समस्या का निदान चाह रही थी | पिछले साढ़े तीन महीनों में महंगाई कमोबेश उसी तरह रही,बिजली आम लोगों को गर्मी में उसकी औकात बताती रही| इन समस्याओं से इतर इन चुनावों का दूसरा पहलु ये रहा की मोदी ने लोकसभा चुनावों के बाद अपनी प्राथमिकता बदल ली| उन्होंने चुनावों में रूचि तो ली लेकिन लोकसभा चुनावों की तरह नहीं वरना यह बात मैं दावे के साथ कह सकता हूँ की मोदी अगर भूटान के बजाय एक दिन भागलपुर में रैली करते तो आज वहां हाथ नहीं कमल होता |यहाँ समस्या इस बात की है कि लोग अच्छी चीजों के लिए समय नहीं देना चाहते और घूम फिरकर फिर जाति और धर्म के दलदल में फंस जाते हैं वरना कोई वजह नहीं की उत्तर प्रदेश में इतने घटिया शासन के बावजूद सपा को 8 सीटें मिलती और मुलायम की तीसरी पीढ़ी मैनपुरी से चुनाव जीत जाती दरअसल परंपरागत भारतीय राजनीति में जो जाति और धर्म की लकीर खींची गई है उसे गौण करने के लिए मोदी को विकास की लम्बी लकीर खींचनी होगी | इस लकीर खींचने के काल में छोटे मोटे चुनाव आते रहेंगे |जनता को थोड़ा धैर्य रखना चाहिए मोदी भी बारह साल तक मुख्यमंत्री रहने के बाद प्रधानमंत्री बने,हम बारह महीने तो इंतजार कर ही सकते हैं | वैसे भी चुनाव की चिंता नेता करते हैं Statesman नहीं वो तो सिर्फ काम करते हैं | 

Saturday, 26 July 2014

एक वो दिन आएगा

                           एक वो दिन आएगा
जब भगवान को लड्डू की जगह Dairy Milk चढ़ाया जाएगा
Sunny Leone और राखी सावंत को भारत रत्न से नवाजा जाएगा
हरे भरे खेतों की जगह माचिस के डब्बे सा घरोंदा नजर आएगा
बच्चे माँ के पेट से Facebook,Twitter enbuild निकलेंगे
औरत-मर्द की जगह औरत-औरत और मर्द-मर्द का जोड़ा ही नजर आएगा
अबला पुरुष अपनी रक्षा के लिए राष्ट्रीय पुरुष आयोग जाएगा
बच्चे विद्यालय की जगह मदिरालय में नामांकन करवाएंगे
सुबह दूध की थैलियों के बदले चार बोतल वोदका घर आएँगे
बापू की जगह हनी सिंह महात्मा बन जाएंगे
इंसान धरती पर नहीं चाँद पर हनीमून मनाएंगे
ईमानदारों को जेल और बेईमानों को सम्मान दिए जाएंगे
संसद में शरीफ ढूंढने से भी नजर नहीं आएँगे
लोग पापों से प्रायश्चित के लिए गया की जगह गोवा जाएंगे
मानवता और इंसानियत सिर्फ शब्दकोशों में नजर आएँगे और
एक वो दिन आएगा
जब गाजा और काश्मीर तो होंगे पर इंसान कहीं नजर नहीं आएगा |

Monday, 21 July 2014

वर्ल्ड क्लास भारतीय रेल आख्यान

                                               वर्ल्ड क्लास भारतीय रेल आख्यान

आज सुबह मुझे बहु प्रचारित वर्ल्ड क्लास नई delhi रेलवे स्टेशन जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ (इधर काफी दिनों से नहीं गया था क्योंकि रेलवे ने बिहार जाने वाली गाड़ियों के लिए एक नया वर्ल्ड क्लास स्टेशन आनंद विहार तैयार कर दिया है) | मेरी दीदी howrah-नई delhi राजधानी से आ रही थी,उन्हें रिसीव करने जाना था| खैर रात में जल्दी सो गया था क्योंकि हम यह मानकर चलते हैं कि राजधानी लेट नहीं होती | ट्रेन सुबह 10 बजे पहुंचने वाली थी | सुबह उठते ही दीदी का फ़ोन आया कि ट्रेन एक घंटे लेट है | खैर मैं नियत समय पर(करीब 10.45) स्टेशन पहुँच गया | एक जिम्मेदार नागरिक की तरह (वैसे बिना टिकट के हम बहुत यात्रा किये हैं,खैर वो दौर और था) प्लेटफार्म टिकट लेने गया तो देखा चार लंबी लाइन लगी हुई थी | भीड़ में जाकर पता चला की ये वर्ल्ड क्लास का अपना क्लास है दो लाइन वैध थी और दो अवैध | मुझे उस काउंटर के आसपास कोई वर्दीधारी नजर नहीं आया (प्लेटफार्म टिकट में कोई कमाई नहीं होती है ना शायद इसलिए) |आधे घंटे की जद्दोजहद के बाद मेरे हाथ में प्लेटफार्म टिकट आया,चेहरे पर ख़ुशी थी एक बाधा पार करने की | अंदर गया तो देखा स्टेशन के डिस्प्ले बोर्ड पर अब ट्रेन के दो घंटे लेट से आने की स्क्रीन चल रही थी | ओफ़ हो अजीब मुसीबत है यार | प्यास लगी थी चारों तरफ नजर दौड़ाया कहीं सार्वजनिक नल से वर्ल्ड क्लास पानी आ रहा हो,नतीजा सिफर रहा,क्लास तो दूर की बात कहीं नल से पानी ही नहीं आ रहा था| (लोग भारतीय रेल को बेवजह बदनाम करते हैं कोई यहाँ आके देखे तो सही की रेलवे कैसे पानी बचाती है) बोतल वाला पानी लेने गया,भैया ek Bisleri देना,उसने जवाब दिया ठंडा नहीं होगा,मैंने कहा जो भी है दे दो | मैंने उसे बीस रूपये दिए,एक मिनट वेट किया कि वो दो रूपये मुझे लौटाएगा क्योंकि बोतल पर कीमत अठारह रुपए अंकित थी | उधर से कोई प्रतिक्रिया ना मिलता देख मैंने कहा भैया पैसे।उसने मुझे ऐसे देखा मानो मैंने कोई अपराध कर दिया हो,यहाँ बीस में ही बोतल मिलती है उधर से जवाब आया | मैंने उससे ज्यादा बहस नहीं की (सोचा वर्ल्ड क्लास स्टेशन का सरचार्ज ले रहा हो आखिर वो अपने पॉकेट से तो देगा नहीं ना) |खैर ट्रेन ढाई घंटे की देरी से पहुंची |हम लोग गाड़ी में बैठे ही थे की दीदी बोली मुगलसराय स्टेशन पर इसी ट्रेन में किसी पैसेंजर के खाने में कॉकरोच मिल गया था,उसने हंगामा मचा दिया इस वजह से ट्रेन वहाँ काफी लेट हो गई | हमको उस पैसेंजर पर बहुत गुस्सा आया इसलिए नहीं की उसकी वजह से ट्रेन लेट हो गई बल्कि इसलिए की एक तो रेलवे ने उस कॉकरोच का अलग से पैसा नहीं लिया और दूसरा ये की उस बुड़बक को क्या ये पता नहीं था की वर्ल्ड क्लास ट्रेन में कॉकरोच भी वर्ल्ड क्लास का होगा | हूँ इति वर्ल्ड क्लास पुराण |              

Sunday, 15 June 2014

नौकरशाही या नौकरगिरी

नौकरशाही या नौकरगिरी   

जब मैं  6ठी-7वी कक्षा में पढ़ता था उस वक़्त स्कूल जाते हुए अक्सर मुझे सड़क पर उन्मादी हाथी की तरह दौड़ती लाल बत्ती लगी एम्बेसडर बहुत रोमांचित करती थी | खैर उस समय मुझे सिर्फ इतना पता चला था कि ये लाल बत्ती वाले जिले के कर्ता-धर्ता यानि माई बाप होते हैं लेकिन मुझे यह बात काफी समय तक परेशान करती रही की इस लाल बत्ती वाले माई बाप को स्वामी की जगह नौकरशाह क्यों कहा जाता है?
                                                                            कालांतर में उम्र और विचारों की परिपक्वता के साथ मैं यह समझ पाया की नौकरशाह वह होता है जो सरकारी नीतियों,मंत्रियों के दावों,वादों के हवाई किले को जमीनी रूप देता है| वह अपने स्वतंत्र विचारों को कार्यान्वित ना कर संविधान के दायरे में रहकर कार्य करता है | पर अफ़सोस इस नौकरशाही ने जनता जनार्दन के मन मस्तिष्क पर अपनी कर्मण्यता नहीं बल्कि अकर्मण्यता की वजह से छाप छोड़ी है | आजादी के बाद कुछेक क्रांतिकारी नौकरशाहों के अपवादों को छोड़ दें तो सरदार पटेल द्वारा स्टील फ्रेम कहकर अभिहित की जाने वाली(अब यह अलमुनियम फ्रेम में बदल गई है) नौकरशाही अपनी राजनीतिक जी हजुरी,अकर्मण्यता को लपेटे पूरे शानो शौकत के साथ बरक़रार है | दरअसल यह प्रजाति शक्ति और अकर्मण्यता का अद्भुत सम्मिश्रण है | इसकी शक्ति का पुंज राजनीतिक वर्ग है | हालाँकि राजनीतिक वर्ग भी कभी-कभी इससे खफा हो जाता है | हमारे एक पूर्व प्रधानमंत्री ने इस संपूर्ण प्रजाति के बारे में कहा था कि अगर मेरा वश चले तो मैं इन सबको गोली मार दूँ | खैर राजनीतिज्ञों और नौकरशाही के बीच की यह नूराकुश्ती तमाम शिकवे शिकायतों के साथ चलती रहती है |
                                         अब हम आते हैं इसके दूसरे पहलु पर | इस प्रजाति के अधिकांश जंतु जो नेताओं के तलवे चाटते हैं,नियम कानून की आढ़ में फाइलों पर कुंडली मारे बैठे रहते हैं उन्हें इसके प्रतिफल के रूप में मिलती है मनचाही पोस्टिंग,बिना कर्तव्यों का निर्वहन किए अधिकारों का रौब आदि| यह वो वर्ग है जो कहने को तो नौकरशाही का प्रतिनिधित्व करता है लेकिन इस प्रजाति को नौकरशाही की जगह नौकरगिरी वर्ग कहें तो अतिशयोक्ति ना होगी | समय के साथ-साथ यह वर्ग और मजबूत होता जा रहा है | इस प्रजाति का दूसरा वर्ग और संभवतः जिसके कारण लोगों का नौकरशाही में थोड़ा बहुत विश्वास बचा है अपनी पोस्टिंग के बाद अपना पूरा सामान नहीं खोलता की पता नहीं कब तबादला हो जाए | इनकी कर्तव्यनिष्ठा पर हमेशा बेईमान और भ्रष्टाचारी हावी रहते हैं | आखिर यह वर्ग ऐसा क्या करता है ?कुछ नहीं केवल ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के वायरस का इंजेक्शन लेकर सरकारी नीतियों को कार्यान्वित करते हैं | जनता को सरकार के होने का अहसास दिलाते हैं | इसी वायरस के असर को ख़त्म करने के लिए राजनीतिक वर्ग निलंबन,तबादला,प्रताड़ना जैसे अनेकों एंटी वायरस का प्रयोग करते हैं | अशोक खेमका,दुर्गा शक्ति नागपाल,पूर्व में टी.एन.शेषन,जी आर खैरनार,किरण बेदी आदि गिने चुने लोग इसी ईमानदारी के वायरस से ग्रसित प्रजाति हैं जो राजनीतिक आकाओं को बिलकुल नहीं सुहाती | तो क्या हमारा 67 वर्षीय लोकतंत्र इसी माई-बाप वाली प्रजाति के रहमो करम पर चलेगा ? किसी ना किसी को तो बदलाव का वाहक बनना पड़ेगा | शेर के मुँह में खून का स्वाद लग चूका है,हम उसे घास पात नहीं खिला सकते लेकिन उसे नरभक्षी होने से तो रोक सकते हैं जो हर कदम पर जनता की उम्मीदों का खून पीने को आतुर हैं | इस नरभक्षी बनती जा रही प्रजाति को रोकने के लिए हमें अनेकों,शेषन,खेमका,बेदी,नागपाल चाहिए | वरना वो दिन दूर नहीं जब नौकरगिरी सही मायने वाली बची-खुची नौकरशाही का भी खात्मा कर देगी

                                                     

Tuesday, 20 May 2014

                                           भाजपाई शिव की महिमा 


हे मानव और इस तरह जैसे ही शिव (मोदी जी) के हाथ में 282 कमल की पंखुड़ियां आई समस्त मानव जाति अचंभित रह गई | भाजपा के भीष्म पितामह(आडवाणी जी) सहित ना केवल तमाम भाजपाई वरन धर्मनिरपेक्षता के ठेकेदार और कलयुगी मीडिया भी भौंचक रह गई | कच्छ से कन्या कुमारी तक पंजा विलाप कर रहा था। भाजपाई शिव को 7 रेस कोर्स रोड में जाते देख देवताओं और दानवों के शरीर पर साम्प्रदायिकता का सांप लोटने लगा | स्वर्ग के युवराज (राहुल गांधी ) नाराज होकर इटली प्रस्थान करने की सोचने लगे | राजमाता (सोनिया गांधी ) ने इस्तीफे का हार फेंका,बड़ा ही विहंगम दृश्य था सारे कांग्रेसी नतमस्तक होकर क्रंदन करने लगे, ममतामयी राजमाता पिघल गईं और इस्तीफा वापस ले लिया | इस घनघोर विपत्ति में सारे कांग्रेसी देवता अग्नि(दिग्विजय सिंह) के पास जाने की सोच रहे थे, पता चला वो रासलीला में व्यस्त हैं| इधर ब्रह्मा जी(मनमोहन सिंह) जिन्होंने पिछले दस वर्षों से मौन धारण कर रखा था अचानक इतिहास भूगोल की बातें करने लगे | हे मानवो इस चुनाव में सबसे ह्रदय विदारक दृश्य यू.पी,बिहार में देखने को मिला | देवी मायावती को हाथी ने अपने सूंड से उठाकर मीलों दूर फेंक दिया था,गुरु शुक्राचार्य(मुलायम) अपनी साइकिल (जो बिलकुल टूट चुकी थी) पर किसी तरह तीन सांसदों को लादे हुए अपने पुत्र को को कोस रहे थे| नारद मुनि (अमर सिंह) स्तब्ध थे | बिहारी इंद्र(नीतीश कुमार) इस्तीफा देकर वनवास जाने की सोचने लगे| हे मानव अभी-अभी तीर्थ यात्रा(जेल) से लौटे गुरु बृहस्पति(लालू यादव) तो इतने क्रोधित हुए की उन्होंने शिव(नरेंद्र मोदी) को बधाई तक नहीं दी | लालटेन की रोशनी में गुरु बृहस्पति फिर से चारा खोज अभियान पर निकल पड़े |  देवी ममता और जयललिता खुश होकर भी दुखी थी | इधर हस्तिनापुर में बड़ी विचित्र घटना घटी| देवी प्रियंका अपने इष्टदेव(रॉबर्ट वाड्रा) के साथ DLF के आवास में प्रस्थान कर गई| धर्मराज युधिष्ठिर(अरविंद केजरीवाल) जो अभी अभी अपने पापों का प्रायश्चित कर काशी से लौटे थे एक बार फिर धरने पर बैठ गए,लेकिन इस बार मांग यह थी की शिव जी को मिले 282 कमलों की जाँच की जाए | हे मानवो इस तरह जैसे ही शिव ने दिल्ली की गद्दी संभाली अमेरिका ने वीजा,पाकिस्तान ने द|उद,सहित समस्त विश्व ने पुष्प वर्षा की| 

Thursday, 17 April 2014

खुला खत मनमोहन सिंह जी के नाम...

                     आदरणीय मनमोहन सिंह जी अभी आप प्रधानमंत्री हैं,और मुझे ही नहीं समूचे देश को यह पता है कि मई के महीने में आपके नाम के आगे पूर्व लग जाएगा | चलिए इसमें कोई बुराई नहीं है सत्ता की प्रवृति ही चंचल होती है आज यहाँ कल वहाँ | आप काफी दिनों से यह कह रहे थे की मेरा मूल्यांकन इतिहास करेगा | हर व्यक्ति के कृतित्व का मूल्यांकन इतिहास करता है | परंतु क्या आपने कभी अपना मूल्यांकन किया? कभी आपकी अंतरात्मा ने आपको झकझोरा? क्या आपने कभी जनता की आवाज सुनने की कोशिश की? कभी नेहरू गांधी परिवार के मन के विरुद्ध कोई कार्य किया? महोदय आपने ऐसा कुछ नहीं किया| आप टेनिसन के सरिता की तरह एक सामान भाव से बहते गए | विषयों, समस्याओं,गंभीर मुद्दों पर तो जैसे आपने ना बोलने की कसम खा ली हो |  देश आपसे तकनीक के मामले में 3G,4G,की उम्मीद कर रहा था आप 2G में फंस कर रह गए| राष्ट्रमंडल घोटाले में आपने देश को इतने पदक दिलाए की समूची खेल बिरादरी शर्मशार हो गई | जिस कोयले से गरीबों के घरों में बिजली जलनी चाहिए थी आपने उससे सारे देश के अरमानों को जला दिया | सारा देश आपको आदर्श समझता था आपने देशवासियों को आदर्श घोटाले का नया एवं अदभुत आदर्श दिया | आपने जिस संविधान की शपथ ली थी उसे आपके पैरों तले बार-बार रौंदा गया | आपने ईमानदारी की एक अदभुत परिभाषा गढ़ी जिसमें  ईमानदारों के लिए कोई जगह नहीं थी | शुशासन व्यवस्था ईमानदारी की जगह आपके समूचे कार्यकाल में ,गरीबी,भुखमरी,भ्रष्टाचार,निकम्मापन का बोलबाला रहा| समूचा देश जब महंगाई,भ्रष्टाचार के दर्द से कराह रहा था तब आपने उसपर मरहम लगाने की बजाए जख्मों पर नमक छिड़का। माना की सत्ता एक जहर है लेकिन जब वो जहर पी आप रहे थे तो उसका असर देश पर क्यों पड़ा? माना की आप सत्ता लोभी नहीं थे फिर भी आपने आलोचनाओं के बावजूद उससे चिपके रहना क्यों बेहतर समझा | आपके पूर्व मीडिया सलाहकार और पूर्व कोयला सचिव ने कुछ नया नहीं कहा सिर्फ विपक्ष के उन आरोपों की पुष्टि की जो वह काफी पहले से आपपर लगाता आ रहा था | आपने राजनीति में परिवारवाद को बढ़ावा नहीं दिया फिर भी आप एक परिवार वैचारिक गुलाम बनके रह गए | महोदय आपको इतिहास ने मौका दिया था,इतिहास बनाने का अफ़सोस आप इतिहास बनके रह गए | आप विजेता नहीं हैं,विजेता अपने मनमाफिक इतिहास में अपना नाम दर्ज करवाता है आप पराजित योद्धा हैं जिसके लिए इतिहास में कोई जगह नहीं होती | आपकी लम्बी और स्वस्थ्य आयु की कामना | 

Friday, 4 April 2014

लहर और साहिल

               लहर और साहिल 

लहरें हमेशा साहिल की मेहमान होती हैं,
वो कुछ क्षण के लिए ही सही
साहिल को अपनी मौजूदगी का एहसास कराती हैं|
साहिल को पता है की लहर का हर
एक स्पर्श उसे जीवंत बनाता है|
दोनों एक दूसरे की दोस्त भी हैं और दुश्मन भी|
दुश्मनी इस मायने में की
लहर अपनी तीव्रता से किनारे के अस्तित्व को झकझोरना चाहती है,
और दोस्ती इस मायने में की
लहर की हर तीव्रता किनारे की खूबसूरती को चार चाँद लगाती है |
मेहमान ज्यादा देर मेजबान के यहाँ रुके तो उसकी महत्ता और प्रासंगिकता कम हो जाती है,
लहर इस बात को बखूबी जानती है
तभी तो वो साहिल को हमेशा छुके वापस चली जाती है|
दोनों को एक दूसरे की मौजूदगी अच्छी लगती है,
लेकिन वो एक दूसरे की निजता का भी सम्मान करते हैं | 

Saturday, 11 January 2014

बदलता शहर

बदलता शहर

माचिस के डब्बे सी जगह को घर कहते हैं
जहाँ रात को नींद ना आए उसे शहर कहते हैं,
इंसान ने धरा है जहाँ मशीनों का रूप
भावनाओं की जहाँ नहीं होती कोई पूछ। 
हर जगह दिखेगा जहाँ पाश्चात्य का रंग
मैकडोनल ने जहाँ छीना है कुल्हड़ का संग। 
गगनचुंबी इमारतें और पाताल लोक की तरफ जाता मन
सपनों के बोझ तले जहाँ छीना जा रहा बच्चों का बचपन। 
नीम का पेड़ जहाँ अब दिवास्वप्न लगता है
संयुक्त परिवार तो सिर्फ बुद्धू बक्से में दिखता है। 
माँ यहाँ अब मोम हो गई हैं
संवेदना जहाँ मौन हो गई हैं। 
नियॉन की रोशनी में दीखता जहाँ मॉडलों का अधनंगा शरीर
नोटों की ढेर पर बैठा इंसान भी है यहाँ मन से फ़क़ीर ।
दिखाते हैं जोड़े यहाँ अपने संबंधों को ऐसे
जैसे हों वो राँझा और हीर । 

Monday, 6 January 2014

बचपन और जवानी

बचपन और जवानी 

बचपन में उम्र की सीढियां चढ़कर
जब जवानी की दहलीज पर पहुंचा
तो देखा कामयाबी
दुनियादारी,रिश्तों का मायाजाल
जिंदगी की जद्दोजहद
मेरा इंतजार कर रहे थे, 
फिर मुझे याद  आया अपना बचपन,
कितना नादान था बचपन हमारा
ना मन में कुछ पाने की तमन्ना थी
ना कुछ खोने का डर,
वैसे भी बचपन में खोने के लिए होता क्या है
उम्र के सिवा,
ना रात को सोने की जल्दी थी
ना अलसुबह उठने का दबाव,
बहुत मुश्किल है भूत और वर्त्तमान के फासले को मिटाना,
अभी कामयाबी के पीछे भागता हूँ 
बचपन में तितलियों के पीछे भागता था,
जेब में पैसे नहीं फिर भी उमंगों का सागर था,
बचपन में बहुत से हाथ बढ़ते थे गिरने पर उठाने वाले
अब तो उठाने वाले हाथों के दर्शन विरले ही होते हैं
हर तरफ गिराने वाले हाथ ही नजर आते हैं,
सपने तो अब भी देखता हूँ 
पर उनमें तितलियाँ नहीं होती,
क्या कोई लौटाएगा मेरा बचपन,
मैं भी कितना अल्पज्ञ हूँ
जो वर्त्तमान को भूत में बदलने का सपना देख रहा,
अब तो बचपन की यादों को लेकर ही खुदा के पास जाना है
एक नए बचपन की उम्मीद लेकर।