Saturday, 24 October 2015

तुम साहित्यकार नहीं एक विचारधारा के हो चाटुकार

क्यों तुमने लौटाने शुरू किए तब पुरस्कार
जब तुम्हारी स्याही को नहीं मिलने लगा
सत्ता का आधार |
लेखकों पर तो हमले हुए हैं अनेकों बार
पर अचानक पुरस्कार वापसी को
क्यों बनाया तुमने अपने विरोध का आधार ?
दादरी पर तुमने घड़ियाली आंसू बहाए
पर तस्लीमा और रुश्दी पर
अपनी जुबान तक न खोल पाए,
ये भी तो तुम्हारी ही बिरादरी के थे मेरे यार |
तुमने इतिहास को जी भर तोड़ा मरोड़ा
अशोक को सांप्रदायिक और औरंगज़ेब को धर्मनिरपेक्षता से जोड़ा
तुम्हें जो अच्छा लगा वो धर्मनिरपेक्ष हो गया
जो बुरा लगा वो धर्मांध |
तुमने तो कलाम को भी सच्चा मुसलमान नहीं माना
क्योंकि उन्होंने गीता को बनाया था अपने जीवन का वैचारिक आधार |
तुम अँधेरे में मंदिर जाते हो और उजियारे में भगवान को गरियाते हो,
अच्छा किया जो तुमने लौटा दिए पुरस्कार
दरअसल तुम साहित्यकार नहीं एक विचारधारा के हो चाटुकार |

Friday, 16 October 2015

गाय को गाय ही रहने दो उसे बीफ न बनाओ,

गाय को गाय ही रहने दो उसे बीफ न बनाओ,
किसी की आस्था रूपी माँ को,
थाली में सजाकर नफरत की आंधी न फैलाओ |
माना की तुम वोट बैंक के लिए
कुछ सियासतदानों की मज़बूरी हो,
पर हमारी सहिष्णुता को हमारी कमजोरी न बनाओ |
तुम्हारे रसूले पाक का हम करते हैं सम्मान,
पर तुम्हें भी रखना होगा हमारे देवताओं का मान |
तुम ब्रह्मुहर्त में अजान बजाओ,कोई बात नहीं,
पर दिवाली के पटाखों पर धर्म का मुलम्मा तो न चढ़ाओ |
होली के रंग में तुम्हें धर्म नजर आता है,
क्यों तुम्हारी औरतों को सिर्फ काले रंग का बुरका ही भाता है,
वंदे मातरम् क्यों तुम्हारे हलक के नीचे नहीं उतर पाता है |
तुम कहती हो हम गंगा जामुनी संस्कृति के वाहक हैं,
पर गंगा भी तुम्हें एक धर्म से जुड़ी नजर आती है |
फैलाओ अपने विचारों का फलक,
दड़बे में रहकर कोई आसमान नहीं छू पाता है |