Sunday, 22 November 2015

मेरे घर की दीवारें

बड़े शांत और सहज भाव से वो रोज मुझे कार्यालय के लिए विदा करती
और बड़ी शिद्दत से मेरे आने का करती वो इंतजार |
मेरी गैर मौजूदगी में मेरे घर की निगेहबानी करती,
वो मेरी तमाम अच्छी बुरी आदतों को देखते और सहते हुए खामोश रहती | 
हम एक दूसरे को उठते-बैठते खाते-सोते जी भर कर देखते |
मेरी पुतलियों की हरकतों से बेपरवाह
वो बड़ी बेशर्मी से एकटक मुझे घूरती रहती | 
मैं हँसता गुनगुनाता चीखता-चिल्लाता पर वो कभी React नहीं करती |
उसकी न तो कोई Demand थी न मेरी तरफ से कोई Supply.
वह मुझसे कभी शिकवे-शिकायत भी नहीं करती |
सर्दी गर्मी बरसात सबमें उसके भाव एक समान रहते |
अजीब सा रिश्ता था हमारे बीच शायद एक खामोश समर्पण |
मेरे अंदर ब्रह्मपुत्र वाली उफान देखकर भी
वो टेनिसन के सरिता की तरह शांत रहती |
वो मेरी सुःख दुःख की सच्ची साथी थी,
मेरी हमराज |
उसका मौन कभी-कभी मुझे बहुत Irritate करता,
पर शायद वही उसकी शक्ति थी
कुछ न कहते हुए भी बहुत कुछ बयां करना |
उसके अंदर कोई छल-प्रपंच नहीं था |
बिल्कुल निरी निपट दुनियादारी के शोर शराबे से बेखबर |
न ही उसके अंदर कोई काम वासना थी,
मुझे निर्वस्त्र देखकर भी उसका भाव वैसा ही निर्लिप्त रहता,
जैसा वस्त्र में देखकर |
उसे न तो अपने होने का कोई गुमान था
न कुछ खोने का डर |
बड़ी अजीब थी मेरे घर की दीवारें |
                                      

Saturday, 7 November 2015

पाटलिपुत्र का विचित्र राजतिलक

पाटलिपुत्र में आज सुबह से ही हलचल मची थी,संजय (मीडिया) का आँखों देखा विवरण,धृतराष्ट्र का कौतुहल,भीष्म पितामह की विवशता,शकुनी की कुटिलता,विदुर की सहजता सब अपने-अपने हिसाब से आकलन में लगे थे,कि आज पाटलिपुत्र की गद्दी पर किसका राजतिलक होगा ?| सूरज की चढ़ती किरणों के साथ यह तय होने लगा कि लालटेन में तेल न होने के बावजूद वो पाटलिपुत्र को रौशनी देगा (कैसे पता नहीं ),तीर खुश हो रहा था की डरते-डरते ही सही निशाना तो सही लगा,पंजे का कुछ भी दांव पर नहीं लगा था सो उसके लिए तो चिंता,चिंतन,आकलन जैसी कोई बात ही नहीं थी | अपराह्न होते-होते नगर वधुएँ (आरक्षण,जातिवाद,कुशासन,परिवारवाद ) मुरझाते और लगभग समर्पण करते हुए कमल की निराशा को देखते हुए निर्लज्जता से अपना वैचारिक अंग प्रदर्शन करते हुए नृत्य करने लगीं | ऐसा लग रहा था मानो पाटलिपुत्र सिर्फ पाटलिपुत्र पर ही नहीं वरन वहां से हस्तिनापुर पर भी राज करेगी |
                                                    इधर धर्मनिरपेक्षता के ठेकेदार खूंटे से असहाय सी बंधी गौ माता और उसके माथे पर लगे तिलक को हिकारत भरी नजरों से देखते हुए ताने मार रहे थे |
                                                                 कुछ समय बाद राजपुरोहित ने जैसे ही इस बात की उद्घोषणा की कि कुछ ही क्षणों में राजतिलक समारोह शुरू होगा सब शांत होकर अपने राजा की प्रतीक्षा करने लगे | फिर राजतिलक का समारोह आरंभ हुआ |
                          अभी राजा के मस्तक पर राजपुरोहित असहाय सी बंधी गौ माता के माथे पर लगे तिलक को राजमस्तक पर लगाने ही वाले थे कि अचानक दरबार में अँधेरा छा गया | सारे दरबारी सुशासन-सुशासन चिल्लाते हुए लालटेन की तलाश में निकले | खैर काफी देर के बाद किसी तरह राजतिलक का समारोह समाप्त हुआ |
  कुछ समय बाद नगरवासियों को यह एहसास हुआ कि उनके द्वारा किया गया राजा का चुनाव गलत साबित हो रहा है,जनता त्राहिमाम करने लगी तो उन्हें विकास और सुशासन की याद आई | बात बड़ी मुश्किल से राजा के कानों तक पहुंची तो राजा ने अपने तमाम दरबारियों को विकास और सुशासन की खोज करने को कहा |पर अब काफी देर हो चुकी थी,क्योंकि विकास और सुशासन अपनी उपेक्षा से कुपित होकर अज्ञातवास पर चले गए थे | इधर पाटलिपुत्र अपने मस्तक पर ऐसा विचित्र राजतिलक महसूस कर दुखी और कुपित हो रही थी | 

Sunday, 1 November 2015

पार्टी,selfie और मोदी जी

कल रात मैं डॉ अभिषेक मनु सिंघवी के बेटे की Reception Party में गया था | पार्टियों में तो यदा कदा जाता रहता हूँ,लेकिन यह मेरी पहली बड़ी राजनीतिक पार्टी थी | राजनीति की एक खूबसूरती जिसे मैं अब तक Idiot Box (TV) में देखा करता था,कि ऐसे आयोजनों में राजनीतिज्ञ दलगत वैचारिक मतभेद भुला कर आते हैं,यहाँ भी साक्षात दृष्टिगोचर हुआ | सत्ता और उससे जुड़े पहचान की निष्ठुरता भी यहाँ देखने को मिली | मनमोहन सिंह (ये तो बेचारे सत्ता में रहकर भी वैसे ही दिखे जैसे सत्ता में रहते हुए थे ),से लेकर UPA सरकार में रहे कई बड़े मंत्री आए और गए पर भीड़ में उन्हें लेकर न तो कोई उत्सुकता दिखी और न ही उनपर किसी ने ध्यान दिया | इस बीच राजमाता सोनिया गांधी और युवराज राहुल गांधी भी पहुंचे लेकिन Party People वैसे ही निष्ठुर बने रहे,खाने-पिने और चर्चाओं में मगन | सत्ता में रहने और नहीं रहने का ऐसा फर्क पहली बार मेरी आँखें देख रही थी | खैर पार्टी जैसे-जैसे अपने पूरे शबाब पर पहुँचने लगी राजनीतिक चर्चाओं ने भी जोर पकड़ लिया |लोग बिहार चुनाव पर चर्चा करते हुए दिल खोलकर मोदी जी की नाकामियों को गिना रहे थे | उनके विदेश दौरों पर चुटकियाँ ली जा रही थी | इस पुरे शाकाहारी पार्टी में लोगों की प्लेट पर तो नहीं लेकिन जुबां पर मुझे बीफ-बीफ भी सुनाई दे रहा था और उसमे अरहर दाल के तड़के भी लग रहे थे | खैर करीब 9 30 बजे मुझे भीड़ में थोड़ी सुगबुगाहट लगी,अचानक SPG वालों की चहलकदमियाँ तेज हो गई थी,पता चला की मोदी जी वर-वधु को आशीर्वाद देने आए हैं | जैसे ही वो Stage से नीचे उतरे वो बीफ,अरहर दाल और विदेशी दौरों वाली भीड़ मोदी जी की तरफ तेजी से दौड़ पड़ी और फिर 5,7 मिनट पुरा वातावरण सेल्फ़ी मय हो गया | मैं उस वक्त नीरजा चौधरी से मुखातिब था,वो भीड़ का कौतुहल और मोदी जी के प्रति क्रेज देखकर सिर्फ मुस्कुरा रही थीं और मैं उस भीड़ के चरित्र के दोहरेपन को देखकर इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि मोदी जी शायद उस नमक की तरह हो गए हैं,जो अगर खाने में थोड़ा ज्यादा हो जाए तो लोग अजीब तरीके से मुँह बनाने लगते हैं और कभी-कभी तो खाना छोड़ भी देते हैं (जैसे लोग आजकल पुरस्कार छोड़ रहे हैं ) लेकिन सुबह के नाश्ते से लेकर रात के खाने तक आपका काम बिना नमक के नहीं चल सकता | अगर आप नमक नहीं खाएंगे तो कमजोरी महसूस करेंगे | भले ही इस कमजोरी को आप सबके सामने उजागर न करें | वैसे भी ज्यादा नमक उन्हें तो बिलकुल रास नहीं आएगा जिनका वैचारिक Blood pressure मोदी जी के सत्ता में आते ही बहुत High हो गया है |