कल दोपहर किसी काम के सिलसिले में हम एक सांसद (लोकसभा ) महोदय की अर्धांगनी से मिलने गए थे | (नाम को गुप्त रहने देते हैं ) मुलाकात Social Media और अन्य औपचारिक बातों से शुरू हुई | बातों-बातों में मोहतरमा अपने पति के स्वदेशी प्रेम और पाश्चात्य सभ्यता के प्रति उनकी चिढ़ का बखान करने लगीं | वो कोक के बजाय रसना या रूह अफजा पीते हैं | पश्चिमी सभ्यता और उसके प्रतीकों जैसे डिस्को वगैरह उन्हें एकदम पसंद नहीं है | फिर हमने उन्हें बीच में ही टोका,तो फिर आप क्या पार्टियों,Disco वगैरह में अकेले जाती हैं (क्योंकि मोहतरमा को इन चीजों से बड़ा लगाव है ) हाँ अमूमन पार्टी अगर राजनीतिक न हो तो मैं अकेले ही जाती हूँ,अच्छा ह्म्म्म्म्म्म | अब मोहतरमा पूरे रौ में स्वदेशी को अपने पति की ओर से जागृत और महिमामंडित कर रहीं थीं | खैर उनकी स्वदेशी बातों के बीच हम जिस डील के लिए गए थे वो पूरी हो चुकी थी | बातों का कारवां अभी चल ही रहा था कि सांसद महोदय अपने फोन पर किसी से बतियाते हुए पहुंचे | अपनी वार्तालाप ख़त्म कर वो भी हमारे बीच आए और उन्होंने अपना फोन टेबल पर रखा,मैंने सोचा स्वदेशी बाबू का फोन जरूर Micromax या किसी और देशी कंपनी का होगा | पर न जी वो तो Apple का latest version था | सांसद महोदय के हाथ में शायद Omega या Rado की कोई बहुत महंगी घड़ी उनके स्वदेशी प्रेम को उजागर कर रही थी | इस बीच उनके बच्चे स्कूल से आए मैंने देखा दोनों बच्चे BMW से उतरे थे क्योंकि ड्राइंग रूम में शीशा लगा था और वो शीशा Transparent था | करीब डेढ़ दो घंटे की मीटिंग के बाद जब हम बाहर निकले तो देखा बंगले के अंदर Porsche,Mercedes,BMW,Pajero (जाहिर है ये सारी गाड़ियां न तो हमें दिखाने को लाई गई होंगी और न किराए की होंगी ) एक कतार में खड़ी स्वदेशी स्वदेशी चिल्ला रही थीं | बंगले से बाहर निकलकर हमने ड्राइवर को फोन किया उसने कहा सर पांच मिनट में आता हूँ | हम ड्राइवर की प्रतीक्षा कर रहे थे तब तक स्वदेशी प्रेमी सांसद महोदय अपनी Porsche गाड़ी में पीछे की सीट पर एप्पल आई फोन पर बतियाते और उस महंगी स्वदेशी घड़ी में समय देखते हुए बाहर निकले | हम स्वदेशी के मोहपाश से अभी निकले भी नहीं थे कि हमारा ड्राइवर टाटा इंडिका लेकर हाजिर हो गया | हम रास्ते भर इस स्वदेशी प्रेम के विचित्र अनुभव से गुदगुदाते हुए अपने गंतव्य तक पहुंचे
Saturday, 19 December 2015
Sunday, 22 November 2015
मेरे घर की दीवारें
बड़े शांत और सहज भाव से वो रोज मुझे कार्यालय के लिए विदा करती
और बड़ी शिद्दत से मेरे आने का करती वो इंतजार |
मेरी गैर मौजूदगी में मेरे घर की निगेहबानी करती,
वो मेरी तमाम अच्छी बुरी आदतों को देखते और सहते हुए खामोश रहती |
हम एक दूसरे को उठते-बैठते खाते-सोते जी भर कर देखते |
मेरी पुतलियों की हरकतों से बेपरवाह
वो बड़ी बेशर्मी से एकटक मुझे घूरती रहती |
मैं हँसता गुनगुनाता चीखता-चिल्लाता पर वो कभी React नहीं करती |
उसकी न तो कोई Demand थी न मेरी तरफ से कोई Supply.
वह मुझसे कभी शिकवे-शिकायत भी नहीं करती |
सर्दी गर्मी बरसात सबमें उसके भाव एक समान रहते |
अजीब सा रिश्ता था हमारे बीच शायद एक खामोश समर्पण |
मेरे अंदर ब्रह्मपुत्र वाली उफान देखकर भी
वो टेनिसन के सरिता की तरह शांत रहती |
वो मेरी सुःख दुःख की सच्ची साथी थी,
मेरी हमराज |
उसका मौन कभी-कभी मुझे बहुत Irritate करता,
पर शायद वही उसकी शक्ति थी
कुछ न कहते हुए भी बहुत कुछ बयां करना |
उसके अंदर कोई छल-प्रपंच नहीं था |
बिल्कुल निरी निपट दुनियादारी के शोर शराबे से बेखबर |
न ही उसके अंदर कोई काम वासना थी,
मुझे निर्वस्त्र देखकर भी उसका भाव वैसा ही निर्लिप्त रहता,
जैसा वस्त्र में देखकर |
उसे न तो अपने होने का कोई गुमान था
न कुछ खोने का डर |
बड़ी अजीब थी मेरे घर की दीवारें |
और बड़ी शिद्दत से मेरे आने का करती वो इंतजार |
मेरी गैर मौजूदगी में मेरे घर की निगेहबानी करती,
वो मेरी तमाम अच्छी बुरी आदतों को देखते और सहते हुए खामोश रहती |
हम एक दूसरे को उठते-बैठते खाते-सोते जी भर कर देखते |
मेरी पुतलियों की हरकतों से बेपरवाह
वो बड़ी बेशर्मी से एकटक मुझे घूरती रहती |
मैं हँसता गुनगुनाता चीखता-चिल्लाता पर वो कभी React नहीं करती |
उसकी न तो कोई Demand थी न मेरी तरफ से कोई Supply.
वह मुझसे कभी शिकवे-शिकायत भी नहीं करती |
सर्दी गर्मी बरसात सबमें उसके भाव एक समान रहते |
अजीब सा रिश्ता था हमारे बीच शायद एक खामोश समर्पण |
मेरे अंदर ब्रह्मपुत्र वाली उफान देखकर भी
वो टेनिसन के सरिता की तरह शांत रहती |
वो मेरी सुःख दुःख की सच्ची साथी थी,
मेरी हमराज |
उसका मौन कभी-कभी मुझे बहुत Irritate करता,
पर शायद वही उसकी शक्ति थी
कुछ न कहते हुए भी बहुत कुछ बयां करना |
उसके अंदर कोई छल-प्रपंच नहीं था |
बिल्कुल निरी निपट दुनियादारी के शोर शराबे से बेखबर |
न ही उसके अंदर कोई काम वासना थी,
मुझे निर्वस्त्र देखकर भी उसका भाव वैसा ही निर्लिप्त रहता,
जैसा वस्त्र में देखकर |
उसे न तो अपने होने का कोई गुमान था
न कुछ खोने का डर |
बड़ी अजीब थी मेरे घर की दीवारें |
Saturday, 7 November 2015
पाटलिपुत्र का विचित्र राजतिलक
पाटलिपुत्र में आज सुबह से ही हलचल मची थी,संजय (मीडिया) का आँखों देखा विवरण,धृतराष्ट्र का कौतुहल,भीष्म पितामह की विवशता,शकुनी की कुटिलता,विदुर की सहजता सब अपने-अपने हिसाब से आकलन में लगे थे,कि आज पाटलिपुत्र की गद्दी पर किसका राजतिलक होगा ?| सूरज की चढ़ती किरणों के साथ यह तय होने लगा कि लालटेन में तेल न होने के बावजूद वो पाटलिपुत्र को रौशनी देगा (कैसे पता नहीं ),तीर खुश हो रहा था की डरते-डरते ही सही निशाना तो सही लगा,पंजे का कुछ भी दांव पर नहीं लगा था सो उसके लिए तो चिंता,चिंतन,आकलन जैसी कोई बात ही नहीं थी | अपराह्न होते-होते नगर वधुएँ (आरक्षण,जातिवाद,कुशासन,परिवारवाद ) मुरझाते और लगभग समर्पण करते हुए कमल की निराशा को देखते हुए निर्लज्जता से अपना वैचारिक अंग प्रदर्शन करते हुए नृत्य करने लगीं | ऐसा लग रहा था मानो पाटलिपुत्र सिर्फ पाटलिपुत्र पर ही नहीं वरन वहां से हस्तिनापुर पर भी राज करेगी |
इधर धर्मनिरपेक्षता के ठेकेदार खूंटे से असहाय सी बंधी गौ माता और उसके माथे पर लगे तिलक को हिकारत भरी नजरों से देखते हुए ताने मार रहे थे |
कुछ समय बाद राजपुरोहित ने जैसे ही इस बात की उद्घोषणा की कि कुछ ही क्षणों में राजतिलक समारोह शुरू होगा सब शांत होकर अपने राजा की प्रतीक्षा करने लगे | फिर राजतिलक का समारोह आरंभ हुआ |
अभी राजा के मस्तक पर राजपुरोहित असहाय सी बंधी गौ माता के माथे पर लगे तिलक को राजमस्तक पर लगाने ही वाले थे कि अचानक दरबार में अँधेरा छा गया | सारे दरबारी सुशासन-सुशासन चिल्लाते हुए लालटेन की तलाश में निकले | खैर काफी देर के बाद किसी तरह राजतिलक का समारोह समाप्त हुआ |
कुछ समय बाद नगरवासियों को यह एहसास हुआ कि उनके द्वारा किया गया राजा का चुनाव गलत साबित हो रहा है,जनता त्राहिमाम करने लगी तो उन्हें विकास और सुशासन की याद आई | बात बड़ी मुश्किल से राजा के कानों तक पहुंची तो राजा ने अपने तमाम दरबारियों को विकास और सुशासन की खोज करने को कहा |पर अब काफी देर हो चुकी थी,क्योंकि विकास और सुशासन अपनी उपेक्षा से कुपित होकर अज्ञातवास पर चले गए थे | इधर पाटलिपुत्र अपने मस्तक पर ऐसा विचित्र राजतिलक महसूस कर दुखी और कुपित हो रही थी |
इधर धर्मनिरपेक्षता के ठेकेदार खूंटे से असहाय सी बंधी गौ माता और उसके माथे पर लगे तिलक को हिकारत भरी नजरों से देखते हुए ताने मार रहे थे |
कुछ समय बाद राजपुरोहित ने जैसे ही इस बात की उद्घोषणा की कि कुछ ही क्षणों में राजतिलक समारोह शुरू होगा सब शांत होकर अपने राजा की प्रतीक्षा करने लगे | फिर राजतिलक का समारोह आरंभ हुआ |
अभी राजा के मस्तक पर राजपुरोहित असहाय सी बंधी गौ माता के माथे पर लगे तिलक को राजमस्तक पर लगाने ही वाले थे कि अचानक दरबार में अँधेरा छा गया | सारे दरबारी सुशासन-सुशासन चिल्लाते हुए लालटेन की तलाश में निकले | खैर काफी देर के बाद किसी तरह राजतिलक का समारोह समाप्त हुआ |
कुछ समय बाद नगरवासियों को यह एहसास हुआ कि उनके द्वारा किया गया राजा का चुनाव गलत साबित हो रहा है,जनता त्राहिमाम करने लगी तो उन्हें विकास और सुशासन की याद आई | बात बड़ी मुश्किल से राजा के कानों तक पहुंची तो राजा ने अपने तमाम दरबारियों को विकास और सुशासन की खोज करने को कहा |पर अब काफी देर हो चुकी थी,क्योंकि विकास और सुशासन अपनी उपेक्षा से कुपित होकर अज्ञातवास पर चले गए थे | इधर पाटलिपुत्र अपने मस्तक पर ऐसा विचित्र राजतिलक महसूस कर दुखी और कुपित हो रही थी |
Sunday, 1 November 2015
पार्टी,selfie और मोदी जी
कल रात मैं डॉ अभिषेक मनु सिंघवी के बेटे की Reception Party में गया था | पार्टियों में तो यदा कदा जाता रहता हूँ,लेकिन यह मेरी पहली बड़ी राजनीतिक पार्टी थी | राजनीति की एक खूबसूरती जिसे मैं अब तक Idiot Box (TV) में देखा करता था,कि ऐसे आयोजनों में राजनीतिज्ञ दलगत वैचारिक मतभेद भुला कर आते हैं,यहाँ भी साक्षात दृष्टिगोचर हुआ | सत्ता और उससे जुड़े पहचान की निष्ठुरता भी यहाँ देखने को मिली | मनमोहन सिंह (ये तो बेचारे सत्ता में रहकर भी वैसे ही दिखे जैसे सत्ता में रहते हुए थे ),से लेकर UPA सरकार में रहे कई बड़े मंत्री आए और गए पर भीड़ में उन्हें लेकर न तो कोई उत्सुकता दिखी और न ही उनपर किसी ने ध्यान दिया | इस बीच राजमाता सोनिया गांधी और युवराज राहुल गांधी भी पहुंचे लेकिन Party People वैसे ही निष्ठुर बने रहे,खाने-पिने और चर्चाओं में मगन | सत्ता में रहने और नहीं रहने का ऐसा फर्क पहली बार मेरी आँखें देख रही थी | खैर पार्टी जैसे-जैसे अपने पूरे शबाब पर पहुँचने लगी राजनीतिक चर्चाओं ने भी जोर पकड़ लिया |लोग बिहार चुनाव पर चर्चा करते हुए दिल खोलकर मोदी जी की नाकामियों को गिना रहे थे | उनके विदेश दौरों पर चुटकियाँ ली जा रही थी | इस पुरे शाकाहारी पार्टी में लोगों की प्लेट पर तो नहीं लेकिन जुबां पर मुझे बीफ-बीफ भी सुनाई दे रहा था और उसमे अरहर दाल के तड़के भी लग रहे थे | खैर करीब 9 30 बजे मुझे भीड़ में थोड़ी सुगबुगाहट लगी,अचानक SPG वालों की चहलकदमियाँ तेज हो गई थी,पता चला की मोदी जी वर-वधु को आशीर्वाद देने आए हैं | जैसे ही वो Stage से नीचे उतरे वो बीफ,अरहर दाल और विदेशी दौरों वाली भीड़ मोदी जी की तरफ तेजी से दौड़ पड़ी और फिर 5,7 मिनट पुरा वातावरण सेल्फ़ी मय हो गया | मैं उस वक्त नीरजा चौधरी से मुखातिब था,वो भीड़ का कौतुहल और मोदी जी के प्रति क्रेज देखकर सिर्फ मुस्कुरा रही थीं और मैं उस भीड़ के चरित्र के दोहरेपन को देखकर इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि मोदी जी शायद उस नमक की तरह हो गए हैं,जो अगर खाने में थोड़ा ज्यादा हो जाए तो लोग अजीब तरीके से मुँह बनाने लगते हैं और कभी-कभी तो खाना छोड़ भी देते हैं (जैसे लोग आजकल पुरस्कार छोड़ रहे हैं ) लेकिन सुबह के नाश्ते से लेकर रात के खाने तक आपका काम बिना नमक के नहीं चल सकता | अगर आप नमक नहीं खाएंगे तो कमजोरी महसूस करेंगे | भले ही इस कमजोरी को आप सबके सामने उजागर न करें | वैसे भी ज्यादा नमक उन्हें तो बिलकुल रास नहीं आएगा जिनका वैचारिक Blood pressure मोदी जी के सत्ता में आते ही बहुत High हो गया है |
Saturday, 24 October 2015
तुम साहित्यकार नहीं एक विचारधारा के हो चाटुकार
क्यों तुमने लौटाने शुरू किए तब पुरस्कार
जब तुम्हारी स्याही को नहीं मिलने लगा
सत्ता का आधार |
लेखकों पर तो हमले हुए हैं अनेकों बार
पर अचानक पुरस्कार वापसी को
क्यों बनाया तुमने अपने विरोध का आधार ?
दादरी पर तुमने घड़ियाली आंसू बहाए
पर तस्लीमा और रुश्दी पर
अपनी जुबान तक न खोल पाए,
ये भी तो तुम्हारी ही बिरादरी के थे मेरे यार |
तुमने इतिहास को जी भर तोड़ा मरोड़ा
अशोक को सांप्रदायिक और औरंगज़ेब को धर्मनिरपेक्षता से जोड़ा
तुम्हें जो अच्छा लगा वो धर्मनिरपेक्ष हो गया
जो बुरा लगा वो धर्मांध |
तुमने तो कलाम को भी सच्चा मुसलमान नहीं माना
क्योंकि उन्होंने गीता को बनाया था अपने जीवन का वैचारिक आधार |
तुम अँधेरे में मंदिर जाते हो और उजियारे में भगवान को गरियाते हो,
अच्छा किया जो तुमने लौटा दिए पुरस्कार
दरअसल तुम साहित्यकार नहीं एक विचारधारा के हो चाटुकार |
जब तुम्हारी स्याही को नहीं मिलने लगा
सत्ता का आधार |
लेखकों पर तो हमले हुए हैं अनेकों बार
पर अचानक पुरस्कार वापसी को
क्यों बनाया तुमने अपने विरोध का आधार ?
दादरी पर तुमने घड़ियाली आंसू बहाए
पर तस्लीमा और रुश्दी पर
अपनी जुबान तक न खोल पाए,
ये भी तो तुम्हारी ही बिरादरी के थे मेरे यार |
तुमने इतिहास को जी भर तोड़ा मरोड़ा
अशोक को सांप्रदायिक और औरंगज़ेब को धर्मनिरपेक्षता से जोड़ा
तुम्हें जो अच्छा लगा वो धर्मनिरपेक्ष हो गया
जो बुरा लगा वो धर्मांध |
तुमने तो कलाम को भी सच्चा मुसलमान नहीं माना
क्योंकि उन्होंने गीता को बनाया था अपने जीवन का वैचारिक आधार |
तुम अँधेरे में मंदिर जाते हो और उजियारे में भगवान को गरियाते हो,
अच्छा किया जो तुमने लौटा दिए पुरस्कार
दरअसल तुम साहित्यकार नहीं एक विचारधारा के हो चाटुकार |
Friday, 16 October 2015
गाय को गाय ही रहने दो उसे बीफ न बनाओ,
गाय को गाय ही रहने दो उसे बीफ न बनाओ,
किसी की आस्था रूपी माँ को,
थाली में सजाकर नफरत की आंधी न फैलाओ |
माना की तुम वोट बैंक के लिए
कुछ सियासतदानों की मज़बूरी हो,
पर हमारी सहिष्णुता को हमारी कमजोरी न बनाओ |
तुम्हारे रसूले पाक का हम करते हैं सम्मान,
पर तुम्हें भी रखना होगा हमारे देवताओं का मान |
तुम ब्रह्मुहर्त में अजान बजाओ,कोई बात नहीं,
पर दिवाली के पटाखों पर धर्म का मुलम्मा तो न चढ़ाओ |
होली के रंग में तुम्हें धर्म नजर आता है,
क्यों तुम्हारी औरतों को सिर्फ काले रंग का बुरका ही भाता है,
वंदे मातरम् क्यों तुम्हारे हलक के नीचे नहीं उतर पाता है |
तुम कहती हो हम गंगा जामुनी संस्कृति के वाहक हैं,
पर गंगा भी तुम्हें एक धर्म से जुड़ी नजर आती है |
फैलाओ अपने विचारों का फलक,
दड़बे में रहकर कोई आसमान नहीं छू पाता है |
किसी की आस्था रूपी माँ को,
थाली में सजाकर नफरत की आंधी न फैलाओ |
माना की तुम वोट बैंक के लिए
कुछ सियासतदानों की मज़बूरी हो,
पर हमारी सहिष्णुता को हमारी कमजोरी न बनाओ |
तुम्हारे रसूले पाक का हम करते हैं सम्मान,
पर तुम्हें भी रखना होगा हमारे देवताओं का मान |
तुम ब्रह्मुहर्त में अजान बजाओ,कोई बात नहीं,
पर दिवाली के पटाखों पर धर्म का मुलम्मा तो न चढ़ाओ |
होली के रंग में तुम्हें धर्म नजर आता है,
क्यों तुम्हारी औरतों को सिर्फ काले रंग का बुरका ही भाता है,
वंदे मातरम् क्यों तुम्हारे हलक के नीचे नहीं उतर पाता है |
तुम कहती हो हम गंगा जामुनी संस्कृति के वाहक हैं,
पर गंगा भी तुम्हें एक धर्म से जुड़ी नजर आती है |
फैलाओ अपने विचारों का फलक,
दड़बे में रहकर कोई आसमान नहीं छू पाता है |
Friday, 14 August 2015
ऐसी स्वतंत्रता दिवस मनाकर क्या ये देश महान होगा ?
कल लाल किले की प्राचीर से
वादों की लंबी फेहरिस्त होगी,
आतंकी खतरों से पुलिस हलकान होगी
और नेताओं की सुरक्षा का भारी तामझाम होगा |
आम आदमी को परेशानी होगी और
ट्रैफिक भी जाम होगा |
दारु के ठेके कल रहेंगे बंद
इसलिए आज घरों में जाम ही जाम होगा |
ऑफिस जाने वालों के लिए
Independence Day की ख़ुशी नहीं
बल्कि Weekend का प्लान होगा |
सड़क किनारे बजेंगे देश भक्ति के गाने,
साल में एक दिन याद आएँगे,
आजादी के लिए मर मिटने वालों के फ़साने |
पर इन सबके बीच,
दो वक्त की
रोटी का जुगाड़ करने वाले
कल भी जाएंगे कमाने
सोचता हूँ क्या हैं आजादी के उनके लिए मायने ?
ऐसी स्वतंत्रता दिवस मनाकर क्या ये देश महान होगा ?
I am not an Indian -American,I am only American
बॉबी जिंदल ने कुछ दिनों पहले
I am not an Indian -American,I am only American
कहकर हम खुशफहमी में जीने वाले
भारतीयों के मुँह पर करारा तमाचा जड़ा था |
अब Sundar Pichai के
Google के CEO बनने पर हम ऐसे बावले हो रहे हैं
जैसे Google हमारा घर जमाई बनने को तैयार हो गया हो |
समय आ गया है कि इस सांकेतिक राष्ट्रवाद की
खुशफहमी से बाहर निकलकर
हमें यह सोचना चाहिए कि,
Sundar Pichai,Satya Nadela,Indira Nui,Shantanu Narayan,
जैसों का महिमामंडन करने से देश को क्या फायदा हो रहा है |
और वैसे भी ये सारे नाम
उस पूंजीवादी अमेरिकी विचारधारा की उपज हैं
जिस विचारधारा में माटी की खुशबु खोजने वाले को बेवकूफ समझा जाता है |
अच्छा होगा कि हम भी भारत में
Google,Microsoft,Pepsi,Adobe जैसे ब्रांड बनाने पर ध्यान दें |
Pichai जैसे सैकड़ों नाम खुद ब खुद हमारे पीछे चले आएँगे |
Saturday, 8 August 2015
वर्तिका,नीलेश,मोहब्बत और नियति
जनवरी की सर्द रात,दूब पर गिरी ओस की बूंदें और अकेलेपन का एहसास लिए
मुँह से सिगरेट के धुएँ जितनी निकलती कोहरे के कश्मकश के बीच
नीलेश अपनी धुन में कुछ गुनगुना रहा था,
अचानक एक धीमी सी सुरीली आवाज ने उसे पीछे मुड़ने पर मजबूर कर दिया,
आप नीलेश हो न,नीलेश ने खुद को थोड़ा सँभालते हुए कहा और आप शायद वर्तिका,
वर्तिका ने जुबान नहीं आँखों से नीलेश के शायद को पुख्ता करते हुए हाँ में स्वीकृति दी |
आपने खाना खाया,नीलेश ने वर्तिका से पूछा
वर्तिका इस असामान्य पहर में इस सामान्य प्रश्न के लिए शायद तैयार नहीं थी,
हमम थोड़ा सा खाया वैसे रात में मैं खाना न के बराबर ही खाती हूँ
अच्छा Coffee पिएँगी,उस सर्द रात में वर्तिका को नीलेश का ये ऑफर अच्छा लगा
फिर दोनों,हाथों में Coffee की गर्माहट को महसूस करते
चहलकदमी करते हुए बातों में मशगूल हो गए |
बातों का कारवां जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा था
नीलेश और शायद वर्तिका भी जनवरी की उस सर्द रात में भी,
एक अजीब सी गर्माहट महसूस कर रहे थे |
रात अपने पूरे शबाब पर थी शादी की रस्में ख़त्म हो चुकी थी,
इधर नीलेश और वर्तिका एक नए संबंध का महल बनाने की नींव खोद रहे थे |
नीलेश सोच रहा था कि काश वक्त थोड़ा बेईमान होता ,
तो मैं उसे रिश्वत देकर कुछ समय के लिए Hold पर रख देता |
खैर वक्त ने अपनी ईमानदारी नहीं छोड़ी और बोझिल मन से नीलेश ने वर्तिका को शुभ रात्रि कहा |
Flashback-नीलेश रात भर ठीक से सो नहीं पाया
यह वर्तिका से उसकी तीसरी मुलाकात थी,
पहली मुलाकात जो करीबन सात साल पहले एक मित्र की Farewell Party पर हुई थी,
उसकी धुंधली सी तस्वीर उसे याद थी |
दूसरी मुलाकात में कुल चार लोग थे और सच कहा जाए
तो उस मुलाकात में वर्तिका,नीलेश को थोड़ी बौद्धिक दंभ से भरी हुई एक घमंडी लड़की लगी थी |
हो सकता है ये Feeling वर्तिका के मन भी हो |
हाँ नीलेश को इतना अच्छे से याद था का पूर्व की उसकी दोनों मुलाकातें गर्मी में हुई थी,
लेकिन संबंधों या जानपहचान में कोई गर्माहट नहीं आई थी |
यह नियति ही थी की नीलेश और वर्तिका जिस Common friend के farewell में
पहली बार मिले थे,तीसरी बार उसी की शादी में वो एक दूसरे से फिर टकराए |
इधर वर्तिका भी Flashback में नीलेश के साथ हुई दो मुलाकातों
और बातों को याद करते हुए नींद के आगोश में समाने की कोशिश कर रही थी |
क्या वर्तिका और नीलेश की तीसरी मुलाकात किसी नए स्थायी संबंध को जन्म देगी ?
क्या वो दोनों खुलकर अपने दिल की बात एक दूसरे के सामने रखेंगे ?
थोड़ा धैर्य रखिये यह कहानी रफ्ता रफ्ता आगे बढ़ेगी ---- to be continued
मुँह से सिगरेट के धुएँ जितनी निकलती कोहरे के कश्मकश के बीच
नीलेश अपनी धुन में कुछ गुनगुना रहा था,
अचानक एक धीमी सी सुरीली आवाज ने उसे पीछे मुड़ने पर मजबूर कर दिया,
आप नीलेश हो न,नीलेश ने खुद को थोड़ा सँभालते हुए कहा और आप शायद वर्तिका,
वर्तिका ने जुबान नहीं आँखों से नीलेश के शायद को पुख्ता करते हुए हाँ में स्वीकृति दी |
आपने खाना खाया,नीलेश ने वर्तिका से पूछा
वर्तिका इस असामान्य पहर में इस सामान्य प्रश्न के लिए शायद तैयार नहीं थी,
हमम थोड़ा सा खाया वैसे रात में मैं खाना न के बराबर ही खाती हूँ
अच्छा Coffee पिएँगी,उस सर्द रात में वर्तिका को नीलेश का ये ऑफर अच्छा लगा
फिर दोनों,हाथों में Coffee की गर्माहट को महसूस करते
चहलकदमी करते हुए बातों में मशगूल हो गए |
बातों का कारवां जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा था
नीलेश और शायद वर्तिका भी जनवरी की उस सर्द रात में भी,
एक अजीब सी गर्माहट महसूस कर रहे थे |
रात अपने पूरे शबाब पर थी शादी की रस्में ख़त्म हो चुकी थी,
इधर नीलेश और वर्तिका एक नए संबंध का महल बनाने की नींव खोद रहे थे |
नीलेश सोच रहा था कि काश वक्त थोड़ा बेईमान होता ,
तो मैं उसे रिश्वत देकर कुछ समय के लिए Hold पर रख देता |
खैर वक्त ने अपनी ईमानदारी नहीं छोड़ी और बोझिल मन से नीलेश ने वर्तिका को शुभ रात्रि कहा |
Flashback-नीलेश रात भर ठीक से सो नहीं पाया
यह वर्तिका से उसकी तीसरी मुलाकात थी,
पहली मुलाकात जो करीबन सात साल पहले एक मित्र की Farewell Party पर हुई थी,
उसकी धुंधली सी तस्वीर उसे याद थी |
दूसरी मुलाकात में कुल चार लोग थे और सच कहा जाए
तो उस मुलाकात में वर्तिका,नीलेश को थोड़ी बौद्धिक दंभ से भरी हुई एक घमंडी लड़की लगी थी |
हो सकता है ये Feeling वर्तिका के मन भी हो |
हाँ नीलेश को इतना अच्छे से याद था का पूर्व की उसकी दोनों मुलाकातें गर्मी में हुई थी,
लेकिन संबंधों या जानपहचान में कोई गर्माहट नहीं आई थी |
यह नियति ही थी की नीलेश और वर्तिका जिस Common friend के farewell में
पहली बार मिले थे,तीसरी बार उसी की शादी में वो एक दूसरे से फिर टकराए |
इधर वर्तिका भी Flashback में नीलेश के साथ हुई दो मुलाकातों
और बातों को याद करते हुए नींद के आगोश में समाने की कोशिश कर रही थी |
क्या वर्तिका और नीलेश की तीसरी मुलाकात किसी नए स्थायी संबंध को जन्म देगी ?
क्या वो दोनों खुलकर अपने दिल की बात एक दूसरे के सामने रखेंगे ?
थोड़ा धैर्य रखिये यह कहानी रफ्ता रफ्ता आगे बढ़ेगी ---- to be continued
Sunday, 19 July 2015
तुम्हारे चेहरे पर पड़ी पसीने की बूंदें
वक्त बेवक्त तुम्हारे चेहरे पर पड़ी मोतियों सी पसीने की बूंदें
जला रही थी मुझे,
वो मेरी मौजूदगी में भी तुम्हारा स्पर्श करता
बार-बार तुम्हारे चाँद से चेहरे को
कम्बखत अपनी बूंदों से सरोबार करता,
कभी तुम्हारी आँखों में आता,
कभी तुम्हारे गर्म होठों को स्पर्श करता
और अपनी मनमानी करते हुए
चुपचाप तुम्हारी अधरों में समा जाता |
बेचैन हो जाता था,
मैं इन पसीने की बूंदों की किस्मत देखकर,
ये जब चाहे तुम्हारा स्पर्श कर सकते थे
एक दिन मेरे सब्र का बाँध टुटा
और मैं पसीने की बूंदों से पूछ बैठा
क्यूँ परेशान करता है तू मेरी बेचैन हुस्न को
उसने मुझे मुस्कुरा कर कहा
क्या मोहब्बत करना सिर्फ तुम्हें ही आता है ?
उसने शब्दों का कारवां आगे बढ़ाते हुए कहा
अरे पगले हमारी मोहब्बत तो निः स्वार्थ है
मैं तुम्हारी माशुका के चेहरे पर आता हूँ
उसकी खूबसूरती में चार चाँद लगाता हूँ
और बिना किसी कामना वासना के काल कलवित हो जाता हूँ |
उसके शब्दों ने मुझे थोड़ा लज्जित किया,
लेकिन निः स्वार्थ प्रेम की उसकी विचारधारा ने
मुझे मोहब्बत का बड़ा फलसफा दिया था |
अब तुम्हारे चेहरे पर पड़ी पसीने की बूंदें
मेरे दिल को बड़ा सुकून दे रही थी |
जला रही थी मुझे,
वो मेरी मौजूदगी में भी तुम्हारा स्पर्श करता
बार-बार तुम्हारे चाँद से चेहरे को
कम्बखत अपनी बूंदों से सरोबार करता,
कभी तुम्हारी आँखों में आता,
कभी तुम्हारे गर्म होठों को स्पर्श करता
और अपनी मनमानी करते हुए
चुपचाप तुम्हारी अधरों में समा जाता |
बेचैन हो जाता था,
मैं इन पसीने की बूंदों की किस्मत देखकर,
ये जब चाहे तुम्हारा स्पर्श कर सकते थे
एक दिन मेरे सब्र का बाँध टुटा
और मैं पसीने की बूंदों से पूछ बैठा
क्यूँ परेशान करता है तू मेरी बेचैन हुस्न को
उसने मुझे मुस्कुरा कर कहा
क्या मोहब्बत करना सिर्फ तुम्हें ही आता है ?
उसने शब्दों का कारवां आगे बढ़ाते हुए कहा
अरे पगले हमारी मोहब्बत तो निः स्वार्थ है
मैं तुम्हारी माशुका के चेहरे पर आता हूँ
उसकी खूबसूरती में चार चाँद लगाता हूँ
और बिना किसी कामना वासना के काल कलवित हो जाता हूँ |
उसके शब्दों ने मुझे थोड़ा लज्जित किया,
लेकिन निः स्वार्थ प्रेम की उसकी विचारधारा ने
मुझे मोहब्बत का बड़ा फलसफा दिया था |
अब तुम्हारे चेहरे पर पड़ी पसीने की बूंदें
मेरे दिल को बड़ा सुकून दे रही थी |
Thursday, 16 July 2015
बाहुबली में,एक्टिंग की बहुत कमी खली
गली,नुक्कड़,मेट्रो,मॉल,ऑफिस हर जगह बाहुबली का शोर मचा था | मैंने सोचा जब इतने लोग बाहुबली-बाहुबली चिल्ला रहे हैं तो जरूर इसमें कुछ बात होगी | बस कल कार्यालय से निकलकर अपने कुछ परिजनों के साथ जा पहुंचा बाहुबली की तपिश महसूस करने | शुरुआती दृश्यों को देखकर कुछ देर के लिए लगा कि सच में यह शोर वाजिब था | स्क्रीनप्ले,ग्राफ़िक्स सिनेमेटोग्राफी ये सब थोड़ा हॉलीवुड वाली Good फीलिंग दे रहे थे | लेकिन यह सुखद एहसास बस दस-पंद्रह मिनट के अंदर ही काल कलवित होने लगा | फिल्म जैसे-जैसे आगे बढ़ते गई मुझे लगा जैसे मैं किसी कॉमिक्स के किरदारों को परदे पर जीवंत देख रहा हूँ |
संवाद अदायगी में भाव शून्यता | बाहुबली द्वारा शिवलिंग को ऐसे उठाना जैसे वह सुबह-सुबह व्यायाम कर रहा हो |और उसका बार-बार 40 फ़ीट की ऊंचाई से पानी में ऐसे गिरना मानो वह ओलंपिक में Qualify करने की जी तोड़ कोशिश कर रहा हो | कुल मिलाकर फिल्म समय के साथ-साथ सच्चाई और वास्तविकता से मुझे कोसों दूर लेके जा रही थी | उसपर से रही सही कसर जबरदस्ती ठूंसे गए गानों ने निकाल दी | मैं उन गानों के वक्त कान में ईयर फोन लगाकर सोच रहा था कि बहुत अच्छा हुआ जो गांधी जैसी महान ऐतिहासिक फिल्म रिचर्ड एटनबरो ने बनाई |अगर यही फिल्म करण जोहर,डेविड धवन,राम गोपाल वर्मा या किसी अन्य typical bollywood type निर्देशक (जिनकी एकमात्र रचनात्मकता हॉलीवुड फिल्मों को केवल बॉलीवुड का तड़का लगाना होती है ) ने बनाई होती तो जरा सोचिये बेन किंग्सले (गांधी ) और रोहिणी हटंगटे (बा ) को इनलोगों ने कितना डांस करवाया होता |
बाहुबली ने फिल्म साइन करने के बाद लगता है सलमान खान से एक्टिंग की टिप्स ली थी और फिल्म में उसने उस टिप्स को पूरी शिद्दत के साथ फॉलो किया | हाँ शिवमणि और कटप्पा ने अपने हिस्से के किरदार को बहुत शानदार तरीके से परदे पर जीवंत किया | इस फिल्म को बनाने में जितनी लागत आई है उतने में रशेल क्रो की ग्लैडिएटर की तरह नहीं तो कम से कम उसके आस-पास जैसा बनाया जा सकता था | लेकिन बॉलीवुड एक बार फिर अपनी आदतों से बाज नहीं आया |
कुछ लोग आमिर की पीके पर इस फिल्म के बहाने कटाक्ष भी कर रहे थे,कि उसने भगवान को गरियाकर एक महीने में 100 करोड़ की कमाई की और बाहुबली ने शिवलिंग को उठाकर सिर्फ पांच दिनों में 200 करोड़ का आंकड़ा पार कर लिया | खैर ऐसा सतही विश्लेषण करने वाले कला और कलाकर को भी धर्म और जाति के दायरे में रखना चाहते हैं | उसकी चर्चा कभी बाद में की जाएगी | वैसे आमिर की पीके के सामने यह फिल्म कहीं नहीं टिकती |
हाँ यह फिल्म उनलोगों को जरूर पसंद आई होगी या आएगी जो सलमान के फैन हैं या फिर वो जो सिनेमा को केवल और केवल मनोरंजन का माध्यम समझते हैं |
पुनःश्च -- मैंने कौन बनेगा करोड़पति के एक एपिसोड में देखा था कि जब एक contestant किसी सवाल पर अटक जाता है तो अमिताभ उसे लाइफ लाइन का प्रयोग करने की सलाह देते हैं,और वह contestant वहां बैठे दर्शकों की सलाह मानकर जवाब देता है,और जवाब गलत हो जाता है | मतलब बहुमत हमेशा सही नहीं होता | बाहुबली पार्ट टू देखने की मुझे बिलकुल भी इच्छा नहीं है | कटप्पा का क्या हुआ ये मुझे आप में से ही कोई बता दीजिएगा |
संवाद अदायगी में भाव शून्यता | बाहुबली द्वारा शिवलिंग को ऐसे उठाना जैसे वह सुबह-सुबह व्यायाम कर रहा हो |और उसका बार-बार 40 फ़ीट की ऊंचाई से पानी में ऐसे गिरना मानो वह ओलंपिक में Qualify करने की जी तोड़ कोशिश कर रहा हो | कुल मिलाकर फिल्म समय के साथ-साथ सच्चाई और वास्तविकता से मुझे कोसों दूर लेके जा रही थी | उसपर से रही सही कसर जबरदस्ती ठूंसे गए गानों ने निकाल दी | मैं उन गानों के वक्त कान में ईयर फोन लगाकर सोच रहा था कि बहुत अच्छा हुआ जो गांधी जैसी महान ऐतिहासिक फिल्म रिचर्ड एटनबरो ने बनाई |अगर यही फिल्म करण जोहर,डेविड धवन,राम गोपाल वर्मा या किसी अन्य typical bollywood type निर्देशक (जिनकी एकमात्र रचनात्मकता हॉलीवुड फिल्मों को केवल बॉलीवुड का तड़का लगाना होती है ) ने बनाई होती तो जरा सोचिये बेन किंग्सले (गांधी ) और रोहिणी हटंगटे (बा ) को इनलोगों ने कितना डांस करवाया होता |
बाहुबली ने फिल्म साइन करने के बाद लगता है सलमान खान से एक्टिंग की टिप्स ली थी और फिल्म में उसने उस टिप्स को पूरी शिद्दत के साथ फॉलो किया | हाँ शिवमणि और कटप्पा ने अपने हिस्से के किरदार को बहुत शानदार तरीके से परदे पर जीवंत किया | इस फिल्म को बनाने में जितनी लागत आई है उतने में रशेल क्रो की ग्लैडिएटर की तरह नहीं तो कम से कम उसके आस-पास जैसा बनाया जा सकता था | लेकिन बॉलीवुड एक बार फिर अपनी आदतों से बाज नहीं आया |
कुछ लोग आमिर की पीके पर इस फिल्म के बहाने कटाक्ष भी कर रहे थे,कि उसने भगवान को गरियाकर एक महीने में 100 करोड़ की कमाई की और बाहुबली ने शिवलिंग को उठाकर सिर्फ पांच दिनों में 200 करोड़ का आंकड़ा पार कर लिया | खैर ऐसा सतही विश्लेषण करने वाले कला और कलाकर को भी धर्म और जाति के दायरे में रखना चाहते हैं | उसकी चर्चा कभी बाद में की जाएगी | वैसे आमिर की पीके के सामने यह फिल्म कहीं नहीं टिकती |
हाँ यह फिल्म उनलोगों को जरूर पसंद आई होगी या आएगी जो सलमान के फैन हैं या फिर वो जो सिनेमा को केवल और केवल मनोरंजन का माध्यम समझते हैं |
पुनःश्च -- मैंने कौन बनेगा करोड़पति के एक एपिसोड में देखा था कि जब एक contestant किसी सवाल पर अटक जाता है तो अमिताभ उसे लाइफ लाइन का प्रयोग करने की सलाह देते हैं,और वह contestant वहां बैठे दर्शकों की सलाह मानकर जवाब देता है,और जवाब गलत हो जाता है | मतलब बहुमत हमेशा सही नहीं होता | बाहुबली पार्ट टू देखने की मुझे बिलकुल भी इच्छा नहीं है | कटप्पा का क्या हुआ ये मुझे आप में से ही कोई बता दीजिएगा |
Wednesday, 15 July 2015
मोहब्बत का इम्तहान
तुम टेनिसन की सरिता
और मैं ब्रह्मपुत्र का उफान,
अरे पगली क्यूँ ले रही हो
तुम मेरी मोहब्बत का इतना इम्तहान |
मुझे नहीं पता
कि क्या पैमाना तय किया है
तुमने इस इम्तहान का,
पर गर मैं पास हो गया
1st division से,तो बोलो
क्या दोगी तुम मुझे इसका इनाम |
वैसे तो मैं इस परीक्षा में
distinction भी ला सकता हूँ
और कुव्वत है इतनी मेरी की
कुछ विषयों में तो मैं
100\100 लाऊँ
पर डरता हूँ
कहीं तुम दबाव में ना आ जाओ |
क्योंकि सुना है लोगों से मैंने
कि दबाव में लोग या तो निखरते हैं
या फिर बिखर जाते हैं |
तुम्हारा निखरना तो
मेरी मोहब्बत को मोक्ष दिलाएगा
पर गर तुम बिखर गई तो
ये मुझे ताउम्र रुलाएगा |
ऐसा नहीं है कि मैं
तुम्हारी कश्मकश नहीं समझता
पर मेरा बावरा मन
इस इम्तहान में पास होने को है मचलता|
और मैं ब्रह्मपुत्र का उफान,
अरे पगली क्यूँ ले रही हो
तुम मेरी मोहब्बत का इतना इम्तहान |
मुझे नहीं पता
कि क्या पैमाना तय किया है
तुमने इस इम्तहान का,
पर गर मैं पास हो गया
1st division से,तो बोलो
क्या दोगी तुम मुझे इसका इनाम |
वैसे तो मैं इस परीक्षा में
distinction भी ला सकता हूँ
और कुव्वत है इतनी मेरी की
कुछ विषयों में तो मैं
100\100 लाऊँ
पर डरता हूँ
कहीं तुम दबाव में ना आ जाओ |
क्योंकि सुना है लोगों से मैंने
कि दबाव में लोग या तो निखरते हैं
या फिर बिखर जाते हैं |
तुम्हारा निखरना तो
मेरी मोहब्बत को मोक्ष दिलाएगा
पर गर तुम बिखर गई तो
ये मुझे ताउम्र रुलाएगा |
ऐसा नहीं है कि मैं
तुम्हारी कश्मकश नहीं समझता
पर मेरा बावरा मन
इस इम्तहान में पास होने को है मचलता|
Friday, 3 July 2015
अब अच्छा नहीं लगता है केजरी
वो तुम्हारा विदेश की हसीन वादियों में छुट्टियां बिताना
तुम्हारे छोटे से घर का बिजली बिल लाखों में आना
फर्जी डिग्री वाले मंत्रियों के सहारे तुम्हारा नैतिकता का पाठ पढ़ाना
दिल्ली में वैट बढ़ाकर महंगाई के लिए केंद्र को गरियाना
खुद के घर में वैचारिक गंदगी की अनदेखी कर
तुम्हारा साफ़ दिखने का बहाना |
पार्टी में तानाशाही चलाकर लोगों को लोकतंत्र का पाठ पढ़ाना
तुम्हारा वो बातों बातों में रूठकर धरने पर बैठ जाना
Corex और Benadryl के सहारे अपनी खांसी को दबाना
दिल्ली वालों को स्वराज के सब्जबाग दिखाना
अपनी मैली कमीज को हरदम दूसरों से सफ़ेद बताना |
सोमनाथ जैसे सहयोगियों के सहारे तुम्हारा महिला सशक्तिकरण लाना |
अब अच्छा नहीं लगता है केजरी
तुम्हारा ये बिना कुछ किए केवल बातों की सरकार चलाना |
तुम्हारे छोटे से घर का बिजली बिल लाखों में आना
फर्जी डिग्री वाले मंत्रियों के सहारे तुम्हारा नैतिकता का पाठ पढ़ाना
दिल्ली में वैट बढ़ाकर महंगाई के लिए केंद्र को गरियाना
खुद के घर में वैचारिक गंदगी की अनदेखी कर
तुम्हारा साफ़ दिखने का बहाना |
पार्टी में तानाशाही चलाकर लोगों को लोकतंत्र का पाठ पढ़ाना
तुम्हारा वो बातों बातों में रूठकर धरने पर बैठ जाना
Corex और Benadryl के सहारे अपनी खांसी को दबाना
दिल्ली वालों को स्वराज के सब्जबाग दिखाना
अपनी मैली कमीज को हरदम दूसरों से सफ़ेद बताना |
सोमनाथ जैसे सहयोगियों के सहारे तुम्हारा महिला सशक्तिकरण लाना |
अब अच्छा नहीं लगता है केजरी
तुम्हारा ये बिना कुछ किए केवल बातों की सरकार चलाना |
Wednesday, 3 June 2015
नेट न्यूट्रीलिटी तो ठीक है पर नक्सलवाद का क्या ?
करीब डेढ़ दो
महीने पहले जब
नेट न्यूट्रीलिटी पर
मीडिया के तमाम
प्रारूपों में चर्चा
और बहस मुबाहिसों
का दौर (चर्चा
अब भी जारी
है ) चरम पर
था उसी बीच
नक्सली हमले में
अर्धसैनिक बलों सहित
आमजन भी नक्सलियों
की गोली का
शिकार हो रहे
थे| लेकिन ना
तो मीडिया ना
सत्ता पक्ष और
विपक्ष और ना
ही खुद को
बौद्धिक कहलाने का दंभ
भरने वालों के
बीच इसे लेकर
कोई बेचैनी दिखी
|लगा जैसे ये
रूटीन वर्क है
| इन दो घटनाओं
को लेकर जिस
तरह की दोहरी
प्रतिक्रियाओं और मानसिकता
का प्रदर्शन देखने
को मिला उससे
मैं यह सोचने
पर मजबूर हो
गया कि क्या
आधुनिक हो रहे
भारत के सरोकार
बदल रहे हैं
? क्या वैश्वीकरण की बयार
में बह रहे
देश में संवेदनाओं
का वैश्वीकरण रुक
गया है ?
यह
सही है कि
जब कोई मुद्दा
युग सापेक्ष हो
और उसके सरोकार
भविष्य से जुड़े
हों तो उसपर
चिंतन और चर्चा
लाजमी है |लेकिन
जो मुद्दा समय
के साथ-साथ
विकराल होती जा
रही हो मगर
युग सापेक्ष ना
हो तो उसका
क्या किया जाए
? एयरटेल के जीरो
प्लान के बाद
नेट न्यूट्रीलिटी पर
बहस छिड़ी तो
यह मुद्दा कई
दिनों तक ट्विटर
पर ट्रेंड करता
रहा |ऐसा लगा
मानो देश का
ही ट्रेंड बदल
रहा हो | ट्राई
को इस मसले
पर करीब 12 लाख
ई मेल प्राप्त
हुए | इसपर सरकार
ने भी तेजी
दिखाई और आधुनिक
युवा भारत को
आश्वासन दिया कि
सरकार बिना किसी
पक्षपात के नेट
की निष्पक्षता बरक़रार
रखेगी |
चलिए अच्छा
है |अब जरा
दूसरी तस्वीर देखिये
| छत्तीसगढ़ के सुकमा
में नक्सलियों के
हाथों अर्धसैनिकों की
निर्मम हत्या को नेताओं
ने शहीदों की
शहादत व्यर्थ नहीं
जाएगी जैसे घिसे
पिटे बयान देकर
कर्तव्य की इतिश्री
समझ ली | दस
राज्यों के 83 जिलों के
लाल गलियारे में
सामानांतर सरकार चलाने वाले
नक्सली जब जानवरों
की तरह इंसानों
की लाशें गिराते
हैं तो हम
आधुनिकता की आड़
में क्यों न्यूट्रीलिटी की
बहस में उलझ
जाते हैं | या
सत्ता के गलियारों
में भी नक्सली
हमलों पर तभी
उबाल आता है
जब लाशों की
संख्या ज्यादा हो | लेकिन
यह उबाल भी
चिताओं के ठंडी
होने से पहले
ही ठंडा हो
जाता है | ऐसा
क्यों होता है
कि नेट न्यूट्रालिटी
जैसे मुद्दे जब
ट्विटर पर ट्रेंड
करते हैं तो
सत्ता शीर्षासन करने
लगती है पर
नक्सलियों के हमले
पर पारंपरिक श्रद्धा
सुमन के बाद
लोगों के सरोकार
टेनिसन के सरिता
की तरह बहने
लगती है |जैसे
कुछ हुआ ही
ना हो |
क्या
ऐसा इसलिए है
कि जहाँ नेट
न्यूट्रीलिटी मुद्दा है वो
आधुनिक शहरी तबका
है |वो इंटरनेट
के सहारे खुद
के साथ-साथ
सत्ता के मत
को भी बदलवा
सकता है |वहीं
दूसरी ओर नक्सलवाद
से पीड़ित जिले
ऐसे हैं जो
अभी विकास की
गोद में अठखेलियां
खेल रहे हैं
| वहां आधुनिकता अभी सिर्फ
दरवाजे पर पहुंची
है, उसका गृह
प्रवेश नहीं हुआ
है | सबसे बड़ी
बात जिन जगहों
पर या जिन
लोगों के लिए
नेट न्यूट्रालिटी जीवन
मरण का प्रश्न
है वो नक्सलवाद
और उसके खतरे
से कोसों दूर
हैं | और जहाँ
नक्सलवाद अपने समस्त
अमानवीय भौतिक अवयवों के
साथ मौजूद है
वहां लोग नेट
न्यूट्रालिटी के बारे
में लगभग अंजान
हैं | वरना कोई
कारण नहीं कि
पिछले पांच सालों
में करीब 11000 से
अधिक मौतों के
बाद भी हम
इस आंतरिक समस्या
का समाधान नहीं
खोज पाए हैं
| हर नक्सली हमले
के बाद नेताओं
का घटनास्थल दौरा,मीडिया में एक
दो दिन खबरें,आम जनता
में थोड़ा सा
उबाल ( वो भी
बिल्कुल कायदे का ) बस
फिर सब शांत
| आधुनिक और सशक्त
भारत के लिए
नेट न्यूट्रीलिटी भले
एक जरुरत हो
सकती है लेकिन
बिना नक्सलवाद जैसी
पुरानी बीमारी का खात्मा
किये हमें आधुनिक
और बौद्धिक कहलाने
का कोई हक़
है क्या ?
Saturday, 16 May 2015
ईमानदारी का तबादला
एक बार फिर नई जगह,नए लोग,नई दीवारें,
मेरे बैठने की नई कुर्सी जिससे कभी मेरी ठीक से जान पहचान नहीं हो पाई |
इस नएपन में एक चीज हमेशा मौजूं रहती है,
व्यवस्था,जो मुझे हर पल विचलित करती रहती,
इशारों में मुझे समझाती,डराती,धमकाती,
कि कोशिश ना करो मुझे बदलने की
मैं तो उस मधुमक्खी के छत्ते की तरह हूँ
जो छेड़ने पर हमलावर हो जाती हैं
और ना छेड़ने पर शहद देती हैं |
पर मैं क्या करूँ
मुझे तो मधुमेह है,
मीठा तो जहर है मेरे लिए,
शायद इसलिए हर बार मैं व्यवस्थाओं को छेड़ देता हूँ ।
तिलमिला जाती हैं व्यवस्था की ये सारी मधुमक्खियाँ,
बेईमानी के डंक से लहूलुहान कर देना चाहती हैं |
पर मैंने भी ईमानदारी के इंसुलिन से
अपनी तीमारदारी शुरू कर दी है |
कर दो मेरा तबादला
मैं खुश हूँ व्यवस्थाओं में ना ढलने का यह इनाम पाकर |
वैसे भी कुछ दाग अच्छे होते हैं
और मुझपर तो ईमानदारी का दाग लगा है,
जरा इस दाग को मिटा कर देखो
हिम्मत है तो जरा ईमानदारी का तबादला करके दिखाओ |
मेरे बैठने की नई कुर्सी जिससे कभी मेरी ठीक से जान पहचान नहीं हो पाई |
इस नएपन में एक चीज हमेशा मौजूं रहती है,
व्यवस्था,जो मुझे हर पल विचलित करती रहती,
इशारों में मुझे समझाती,डराती,धमकाती,
कि कोशिश ना करो मुझे बदलने की
मैं तो उस मधुमक्खी के छत्ते की तरह हूँ
जो छेड़ने पर हमलावर हो जाती हैं
और ना छेड़ने पर शहद देती हैं |
पर मैं क्या करूँ
मुझे तो मधुमेह है,
मीठा तो जहर है मेरे लिए,
शायद इसलिए हर बार मैं व्यवस्थाओं को छेड़ देता हूँ ।
तिलमिला जाती हैं व्यवस्था की ये सारी मधुमक्खियाँ,
बेईमानी के डंक से लहूलुहान कर देना चाहती हैं |
पर मैंने भी ईमानदारी के इंसुलिन से
अपनी तीमारदारी शुरू कर दी है |
कर दो मेरा तबादला
मैं खुश हूँ व्यवस्थाओं में ना ढलने का यह इनाम पाकर |
वैसे भी कुछ दाग अच्छे होते हैं
और मुझपर तो ईमानदारी का दाग लगा है,
जरा इस दाग को मिटा कर देखो
हिम्मत है तो जरा ईमानदारी का तबादला करके दिखाओ |
Saturday, 11 April 2015
विकास की अदालत और पेड़ों की अर्जी
पहले हम झुंड में दिखा करते थे अब हमारी संख्या घटती जा रही है |
जंगल,गांव,क़स्बा,शहर हर जगह ये हमें आच्छादित करने पर तुले हैं |
Confuse हूँ और परेशान भी,कि कहाँ जाऊँ,किसे सुनाऊँ अपना हाले दिल |
इधर कुछ समय से उसकी चर्चा काफी बढ़ गई थी,
लोगों की जुबान से सुनता था कि वो दरियादिल है,
सबको समान भाव से देखता है |
हमने सोचा उसी की अदालत में अपनी फरियाद सुनाऊँ |
पर वो कहाँ मिलेगा ?गांवों में,शहरों में,महानगरों में,आखिर कहाँ ?
पहले हमने उसे गांव की पगडंडियों में तलाशा,
पर नतीजा सिफर,
फिर किसी ने बताया वो शहरों में मिलेगा
लेकिन उसकी सबसे बड़ी अदालत महानगरों में बैठती है,
गगनचुंबी अट्टालिकाओं,नियोन की लाइटों में अधनंगी मॉडलों के होर्डिंग्स के बीच |
मैं चल पड़ा अपने बचे खुचे कुनबे के साथ उसकी अदालत में फरियाद करने |
हमारे छोटे मोटे साथियों ने तो रस्ते में ही दम तोड़ दिया |
कुछ हाईवे पर रौंदे गए तो कुछ फ्लाईओवर पार करते हुए काल कलवित हो गए |
खैर हम आख़िरकार उसकी अदालत में पहुँच ही गए |
इधर उधर नजर दौड़ाई तो बड़ा ही विहंगम दृश्य दिखा,
जिसने आधुनिक मनुष्य की आँखों पर मनोहरी पर्दा डाल दिया था |
हम उस अदालत को समझने की कोशिश कर ही रहे थे,
तभी एक अट्टाहस सुनाई दिया,
रे मुर्ख,ये गगनचुंबी इमारतें,ये फ्लाईओवर,शॉपिंग माल्स,ये सब हमारे ही तो प्रतिरूप हैं |
अमीरी हमारी ब्रांड एम्बेसडर है | गरीबी से हम कोई ताल्लुक रखते नहीं |
हमें नफरत है पर्यावरण और उसके तुम जैसे अनुचरों से |
और इस तरह विकास की अदालत में हम पेड़ों की अर्जी वहीँ ख़ारिज हो गई |
मतलब साफ़ था कि अब विकास तो होगा पर हमारा नहीं |
जंगल,गांव,क़स्बा,शहर हर जगह ये हमें आच्छादित करने पर तुले हैं |
Confuse हूँ और परेशान भी,कि कहाँ जाऊँ,किसे सुनाऊँ अपना हाले दिल |
इधर कुछ समय से उसकी चर्चा काफी बढ़ गई थी,
लोगों की जुबान से सुनता था कि वो दरियादिल है,
सबको समान भाव से देखता है |
हमने सोचा उसी की अदालत में अपनी फरियाद सुनाऊँ |
पर वो कहाँ मिलेगा ?गांवों में,शहरों में,महानगरों में,आखिर कहाँ ?
पहले हमने उसे गांव की पगडंडियों में तलाशा,
पर नतीजा सिफर,
फिर किसी ने बताया वो शहरों में मिलेगा
लेकिन उसकी सबसे बड़ी अदालत महानगरों में बैठती है,
गगनचुंबी अट्टालिकाओं,नियोन की लाइटों में अधनंगी मॉडलों के होर्डिंग्स के बीच |
मैं चल पड़ा अपने बचे खुचे कुनबे के साथ उसकी अदालत में फरियाद करने |
हमारे छोटे मोटे साथियों ने तो रस्ते में ही दम तोड़ दिया |
कुछ हाईवे पर रौंदे गए तो कुछ फ्लाईओवर पार करते हुए काल कलवित हो गए |
खैर हम आख़िरकार उसकी अदालत में पहुँच ही गए |
इधर उधर नजर दौड़ाई तो बड़ा ही विहंगम दृश्य दिखा,
जिसने आधुनिक मनुष्य की आँखों पर मनोहरी पर्दा डाल दिया था |
हम उस अदालत को समझने की कोशिश कर ही रहे थे,
तभी एक अट्टाहस सुनाई दिया,
रे मुर्ख,ये गगनचुंबी इमारतें,ये फ्लाईओवर,शॉपिंग माल्स,ये सब हमारे ही तो प्रतिरूप हैं |
अमीरी हमारी ब्रांड एम्बेसडर है | गरीबी से हम कोई ताल्लुक रखते नहीं |
हमें नफरत है पर्यावरण और उसके तुम जैसे अनुचरों से |
और इस तरह विकास की अदालत में हम पेड़ों की अर्जी वहीँ ख़ारिज हो गई |
मतलब साफ़ था कि अब विकास तो होगा पर हमारा नहीं |
Sunday, 5 April 2015
शिव की जटा से निकली, मैं अभागी गंगा बोल रही हूँ |
शिव की जटा से निकली,भागीरथी के प्रयासों से इस धरती पर आई,
तुम मनुष्यों के पाप धोकर पतितपावनी कहलाई
मैं अभागी गंगा बोल रही हूँ |
ढूंढ़ती हूँ अपने अवशेषों पर पागलों की तरह अतीत की उफनती तरुणाई,
अफ़सोस हिमालय की तलछटीयों से लेकर बंगाल की खाड़ी तक
हर जगह निराशा दिखती है |
धर्म और कर्मकांडों के नाम पर तुमने जी भरकर मेरे साथ खिलवाड़ किया |
खुद की चिताओं को जलाकर तुम मेरी भी चिता जलाते रहे |
मेरी छाती को भेदकर तुमने उसपर बांध बनाया,
अपने घरों को रोशन किया,अपने खेतों को लहलहाया
पर मेरे आँगन में अँधेरा छा गया |
मैं चुप रही,सोचा कभी तो तुम्हारी भूख शांत होगी,
पर नहीं मैं शायद गलत थी
तुम्हारे अंदर तो कभी ना मिटने वाली भूख समाई हुई है |
तुम कभी मेरी देह को बनारस में छलनी करते तो कभी हरिद्वार में |
तुम पापियों ने मुझे इतना मैला कर दिया है,
कि अब मेरी आँखों से दो बूंद स्वच्छ आंसू भी नहीं गिरते |
जरा देखो अगर तुम्हारी आँखों में पश्चाताप की बूंदें बची हैं तो,
खुद को आधुनिक कहने वाले मनुष्यो कि
जीवनदायिनी गंगा तिल-तिल कर मृत्यु की ओर अग्रसर है |
पर मुझे कहीं तुम्हारे अंदर पश्चाताप नजर नहीं आता
सभ्यताओं के विलुप्तीकरण के साथ-साथ तुम मनुष्य भी असभ्य होते चले गए |
आज मेरी इस चीत्कार पर तुम आधुनिक मानव अट्टाहस लगा लो,
ये सोचकर कि जिसके किनारे ना जाने कितनी सभ्यताएं
पुष्पित पल्लवित होकर काल कलवित हुई,
जो तुम मनुष्यों को मोक्ष प्रदान करती थी आज तुमसे खुद मोक्ष की भीख मांग रही है |
पर आज मैं बहुत बेचैन हूँ,
मैं चाहती हूँ की तुम मनुष्यों के हाथों मेरा दाह संस्कार होने से पहले,
इतिहास के पन्नों में समाने से पहले ही
मैं वापस शिव की जटा में समा जाऊँ |
भले ही मुझपर वहां कुछ बंदिशें होंगी और मैं वहां उन्मुक्त नहीं रहूंगी
पर तुम पापियों के बीच इस धरा पर रहकर मैं अब पतितपावनी से पतिता नहीं कहलाना चाहती |
हंस लो कुछ समय की बात है
तब ना तो तुम मुझे काशी के तट पर पाओगे
ना ऋषिकेश की उफनती धारा में |
शिव की जटा से निकली,
और उसी में समा जाने को व्याकुल मैं गंगा बोल रही हूँ
तुम मनुष्यों के पाप धोकर पतितपावनी कहलाई
मैं अभागी गंगा बोल रही हूँ |
ढूंढ़ती हूँ अपने अवशेषों पर पागलों की तरह अतीत की उफनती तरुणाई,
अफ़सोस हिमालय की तलछटीयों से लेकर बंगाल की खाड़ी तक
हर जगह निराशा दिखती है |
धर्म और कर्मकांडों के नाम पर तुमने जी भरकर मेरे साथ खिलवाड़ किया |
खुद की चिताओं को जलाकर तुम मेरी भी चिता जलाते रहे |
मेरी छाती को भेदकर तुमने उसपर बांध बनाया,
अपने घरों को रोशन किया,अपने खेतों को लहलहाया
पर मेरे आँगन में अँधेरा छा गया |
मैं चुप रही,सोचा कभी तो तुम्हारी भूख शांत होगी,
पर नहीं मैं शायद गलत थी
तुम्हारे अंदर तो कभी ना मिटने वाली भूख समाई हुई है |
तुम कभी मेरी देह को बनारस में छलनी करते तो कभी हरिद्वार में |
तुम पापियों ने मुझे इतना मैला कर दिया है,
कि अब मेरी आँखों से दो बूंद स्वच्छ आंसू भी नहीं गिरते |
जरा देखो अगर तुम्हारी आँखों में पश्चाताप की बूंदें बची हैं तो,
खुद को आधुनिक कहने वाले मनुष्यो कि
जीवनदायिनी गंगा तिल-तिल कर मृत्यु की ओर अग्रसर है |
पर मुझे कहीं तुम्हारे अंदर पश्चाताप नजर नहीं आता
सभ्यताओं के विलुप्तीकरण के साथ-साथ तुम मनुष्य भी असभ्य होते चले गए |
आज मेरी इस चीत्कार पर तुम आधुनिक मानव अट्टाहस लगा लो,
ये सोचकर कि जिसके किनारे ना जाने कितनी सभ्यताएं
पुष्पित पल्लवित होकर काल कलवित हुई,
जो तुम मनुष्यों को मोक्ष प्रदान करती थी आज तुमसे खुद मोक्ष की भीख मांग रही है |
पर आज मैं बहुत बेचैन हूँ,
मैं चाहती हूँ की तुम मनुष्यों के हाथों मेरा दाह संस्कार होने से पहले,
इतिहास के पन्नों में समाने से पहले ही
मैं वापस शिव की जटा में समा जाऊँ |
भले ही मुझपर वहां कुछ बंदिशें होंगी और मैं वहां उन्मुक्त नहीं रहूंगी
पर तुम पापियों के बीच इस धरा पर रहकर मैं अब पतितपावनी से पतिता नहीं कहलाना चाहती |
हंस लो कुछ समय की बात है
तब ना तो तुम मुझे काशी के तट पर पाओगे
ना ऋषिकेश की उफनती धारा में |
शिव की जटा से निकली,
और उसी में समा जाने को व्याकुल मैं गंगा बोल रही हूँ
Friday, 3 April 2015
ज़िंदगी के कारवां में,मैं खर्च होता चला गया
सोचता हूँ कभी-कभी,
की क्या बदला है
मेरी ज़िंदगी में तुम्हारी दस्तक से |
कोशिश करता हूँ मूल्यांकन करूँ,
पर संबंधों का गणित
मानसिक रूप से उलझाए रखता है |
पर मैं तुम्हें क्यों दोष दूँ
इस उलझन के लिए,
क्योंकि जबसे संभाला है होश मैंने
तबसे मूल्यांकित ही हो रहा हूँ |
कभी संबंधों ने मूल्यांकन किया
तो कभी किस्मत ने |
दुनिया तो बहुत देखी मैंने
पर ज्यादा दुनियादारी नहीं सीख पाया,
व्यापारी भी नहीं हूँ
इसलिए रिश्तों का सौदा भी नहीं कर पाया |
ज़िंदगी के कारवां में
लोग मुझे खर्च करते चले गए |
तकलीफ नहीं होती थी मुझे खर्च होने में,
उम्मीद थी कि इस खर्च की कमी महसूस नहीं होगी |
खैर फिर ये सोचता हूँ
कि क्या बदला है मेरी जिंदगी में तुम्हारी दस्तक से |
नींद तो अभी भी उतनी ही आती है,
बस करवटों ने अपनी संख्या बढ़ा ली है |
बीते वक्त के साथ मैं कितना खर्च हुआ पता नहीं |
अब खर्च के दलदल से निकलना चाहता हूँ |
थाम लो मेरा हाथ
मुक्त कर दो मुझे मूल्यांकन के बही-खाते से |
अब तो कमबख्त दीवारें भी
मेरा मूल्यांकन करने लगी हैं,
कि तुम्हारी इस उम्र का जमा हासिल क्या है ?
मैं तो अब भी निरुत्तर हूँ,
तुम्हारे पास कोई जवाब हो तो बता दो |
की क्या बदला है
मेरी ज़िंदगी में तुम्हारी दस्तक से |
कोशिश करता हूँ मूल्यांकन करूँ,
पर संबंधों का गणित
मानसिक रूप से उलझाए रखता है |
पर मैं तुम्हें क्यों दोष दूँ
इस उलझन के लिए,
क्योंकि जबसे संभाला है होश मैंने
तबसे मूल्यांकित ही हो रहा हूँ |
कभी संबंधों ने मूल्यांकन किया
तो कभी किस्मत ने |
दुनिया तो बहुत देखी मैंने
पर ज्यादा दुनियादारी नहीं सीख पाया,
व्यापारी भी नहीं हूँ
इसलिए रिश्तों का सौदा भी नहीं कर पाया |
ज़िंदगी के कारवां में
लोग मुझे खर्च करते चले गए |
तकलीफ नहीं होती थी मुझे खर्च होने में,
उम्मीद थी कि इस खर्च की कमी महसूस नहीं होगी |
खैर फिर ये सोचता हूँ
कि क्या बदला है मेरी जिंदगी में तुम्हारी दस्तक से |
नींद तो अभी भी उतनी ही आती है,
बस करवटों ने अपनी संख्या बढ़ा ली है |
बीते वक्त के साथ मैं कितना खर्च हुआ पता नहीं |
अब खर्च के दलदल से निकलना चाहता हूँ |
थाम लो मेरा हाथ
मुक्त कर दो मुझे मूल्यांकन के बही-खाते से |
अब तो कमबख्त दीवारें भी
मेरा मूल्यांकन करने लगी हैं,
कि तुम्हारी इस उम्र का जमा हासिल क्या है ?
मैं तो अब भी निरुत्तर हूँ,
तुम्हारे पास कोई जवाब हो तो बता दो |
Saturday, 28 March 2015
जितनी जल्दी हो सके AAP काल कलवित हो जाओ
भूमिका - बौद्धिकों का कोई जनाधार नहीं होता,यह मैं काफी लंबे अरसे से सुनता आ रहा था | आज योगेंद्र यादव,प्रो आनंद कुमार आदि के साथ AAP की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में जैसा दुर्व्यवहार (और लोगों को हो सकता है यह व्यवहार लगे ) हुआ उसने यह साबित कर दिया की इस कथन में कितनी सच्चाई है |
पृष्ठभूमि - आम आदमी के सपनों को हकीकत में बदलने,स्वराज का नारा देने और लोकतंत्र का मुखौटा ओढ़कर,दिल्ली में स्थापित राजनीतिक दलों को मात देकर सत्ता पाने वाली पार्टी में जो कुछ भी हुआ और जो कालांतर में होगा वह अनोखी बात नहीं है | वैसे भी सत्ता को पाना और उससे जुड़े कर्तव्यों का निर्वहन दोनों अलग-अलग बात है | यह होगा सबको पता था ( कुछ अंधभक्तों को छोड़कर जो आप की उपज को एक महान परिघटना मान रहे थे ) लेकिन इस तरीके से होगा इसका इल्म तो आपके साधारण कार्यकर्ताओं को भी नहीं होगा ( सावधान,अरविंद केजरीवाल भी खुद को साधारण कार्यकर्ता ही कहते हैं ) |
मुद्दा - दरअसल इस पार्टी का गठन जिन मुद्दों,व्यक्तिगत केंद्रीकरण और बिना किसी वैचारिक आधार के हुआ था उसकी तार्किक परिणति तो इसी रूप में सामने आती | आपके पार्टी बनने के बाद इसमें अधिकांश ऐसे लोग शामिल हो गए जिनका,स्वराज,लोकतंत्र इत्यादि जैसे शब्दों में कोई यकीन नहीं था ( निश्चित रूप से इसमें योगेन्द्र यादव और प्रो आनंद कुमार नहीं हैं ) | आपके अंदर चल रही इस नूरा कुश्ती को खबरिया चैनलों का एक बड़ा तबका ऐसे दिखा रहा है जैसे यह विचारों और सिद्धांतों की लड़ाई हो | चैनलों को AAP से शायद इसलिए ज्यादा मोहब्बत है क्योंकि AAP में कई दलाल पत्रकार के रूप में शामिल हैं |
मेरा व्यक्तिगत तौर पर यह मानना है कि यह सारी कवायद दिल्ली की चार राज्यसभा सीटों को लेकर है | आखिर लुटियंस का बंगला और सरकारी दामाद बनना किसे अच्छा नहीं लगता | चूँकि निष्कासित बौद्धिक वर्ग अपने लिए आंतरिक समर्थन नहीं जुटा पाया,या यूँ कहें की उन्होंने उन सिद्धांतो से समझौता नहीं किया जिसके लिए उन्होंने आपका सपना देखा था | इसलिए उन्हें दलालों के बड़े वर्ग ने हाशिये पर डाल दिया |
आज दिल्ली की जनता को बड़ा अफ़सोस हो रहा होगा,की जिस झाड़ू को हमने गंदगी साफ़ करने के लिए सत्ता सौंपी थी उसमें खुद इतनी गंदगी है कि वह उनके सपनों पर ही झाड़ू फेर रहा है |
पुनश्च;- लार्ड कर्जन ने कांग्रेस पार्टी के बारे में कहा था यह पार्टी अपने पतन की ओर अग्रसर है और मेरी एकमात्र इच्छा है कि मैं इसके पतन में सहायक बनूँ | मैं लार्ड कर्जन तो नहीं हूँ लेकिन मेरी दिली इच्छा है कि जितनी जल्दी हो सके आप काल कलवित हो जाओ | लोगों को सांकेतिक स्वराज और लोकतंत्र का मुखौटा नहीं चाहिए |
पृष्ठभूमि - आम आदमी के सपनों को हकीकत में बदलने,स्वराज का नारा देने और लोकतंत्र का मुखौटा ओढ़कर,दिल्ली में स्थापित राजनीतिक दलों को मात देकर सत्ता पाने वाली पार्टी में जो कुछ भी हुआ और जो कालांतर में होगा वह अनोखी बात नहीं है | वैसे भी सत्ता को पाना और उससे जुड़े कर्तव्यों का निर्वहन दोनों अलग-अलग बात है | यह होगा सबको पता था ( कुछ अंधभक्तों को छोड़कर जो आप की उपज को एक महान परिघटना मान रहे थे ) लेकिन इस तरीके से होगा इसका इल्म तो आपके साधारण कार्यकर्ताओं को भी नहीं होगा ( सावधान,अरविंद केजरीवाल भी खुद को साधारण कार्यकर्ता ही कहते हैं ) |
मुद्दा - दरअसल इस पार्टी का गठन जिन मुद्दों,व्यक्तिगत केंद्रीकरण और बिना किसी वैचारिक आधार के हुआ था उसकी तार्किक परिणति तो इसी रूप में सामने आती | आपके पार्टी बनने के बाद इसमें अधिकांश ऐसे लोग शामिल हो गए जिनका,स्वराज,लोकतंत्र इत्यादि जैसे शब्दों में कोई यकीन नहीं था ( निश्चित रूप से इसमें योगेन्द्र यादव और प्रो आनंद कुमार नहीं हैं ) | आपके अंदर चल रही इस नूरा कुश्ती को खबरिया चैनलों का एक बड़ा तबका ऐसे दिखा रहा है जैसे यह विचारों और सिद्धांतों की लड़ाई हो | चैनलों को AAP से शायद इसलिए ज्यादा मोहब्बत है क्योंकि AAP में कई दलाल पत्रकार के रूप में शामिल हैं |
मेरा व्यक्तिगत तौर पर यह मानना है कि यह सारी कवायद दिल्ली की चार राज्यसभा सीटों को लेकर है | आखिर लुटियंस का बंगला और सरकारी दामाद बनना किसे अच्छा नहीं लगता | चूँकि निष्कासित बौद्धिक वर्ग अपने लिए आंतरिक समर्थन नहीं जुटा पाया,या यूँ कहें की उन्होंने उन सिद्धांतो से समझौता नहीं किया जिसके लिए उन्होंने आपका सपना देखा था | इसलिए उन्हें दलालों के बड़े वर्ग ने हाशिये पर डाल दिया |
आज दिल्ली की जनता को बड़ा अफ़सोस हो रहा होगा,की जिस झाड़ू को हमने गंदगी साफ़ करने के लिए सत्ता सौंपी थी उसमें खुद इतनी गंदगी है कि वह उनके सपनों पर ही झाड़ू फेर रहा है |
पुनश्च;- लार्ड कर्जन ने कांग्रेस पार्टी के बारे में कहा था यह पार्टी अपने पतन की ओर अग्रसर है और मेरी एकमात्र इच्छा है कि मैं इसके पतन में सहायक बनूँ | मैं लार्ड कर्जन तो नहीं हूँ लेकिन मेरी दिली इच्छा है कि जितनी जल्दी हो सके आप काल कलवित हो जाओ | लोगों को सांकेतिक स्वराज और लोकतंत्र का मुखौटा नहीं चाहिए |
Wednesday, 11 March 2015
आप के अरविंद आएँगे
आप के अरविंद आएँगे
पार्टी में लोकतंत्र बढ़ाएंगे,
जनता से फैसले करवाएंगे
भाजपा,कांग्रेस की राह पर नहीं जाएंगे
दिल्ली को आइडियल बनाएँगे,
कहीं भी सुरक्षा चक्र में नहीं जाएंगे,
सीसीटीवी कैमरे लगवाएंगे,
भ्रष्टाचार मिटाएंगे |
पर हुआ क्या ?
आप के अरविंद आ गए,
पार्टी का लोकतंत्र खा गए,
जनता से फैसले भूलकर
केवल मीडिया में छा गए
सुरक्षा चक्र में आ गए,
सीसीटीवी और भ्रष्टाचार को
भूलकर खुद को अंतर्कलह में उलझा गए
और पार्टी के नाम के अनुरूप ही एक
आम पार्टी बनकर
दिल्ली वालों के सपनों पर झाड़ू फिरा गए
पार्टी में लोकतंत्र बढ़ाएंगे,
जनता से फैसले करवाएंगे
भाजपा,कांग्रेस की राह पर नहीं जाएंगे
दिल्ली को आइडियल बनाएँगे,
कहीं भी सुरक्षा चक्र में नहीं जाएंगे,
सीसीटीवी कैमरे लगवाएंगे,
भ्रष्टाचार मिटाएंगे |
पर हुआ क्या ?
आप के अरविंद आ गए,
पार्टी का लोकतंत्र खा गए,
जनता से फैसले भूलकर
केवल मीडिया में छा गए
सुरक्षा चक्र में आ गए,
सीसीटीवी और भ्रष्टाचार को
भूलकर खुद को अंतर्कलह में उलझा गए
और पार्टी के नाम के अनुरूप ही एक
आम पार्टी बनकर
दिल्ली वालों के सपनों पर झाड़ू फिरा गए
Saturday, 14 February 2015
Valentine Day और प्रेम के बदलते मूल्य
भूमिका-आज जब दुनिया
भर में संत
वैलेंटाइन का जन्म
दिवस बड़े धूम
धाम से मनाया
जा रहा है
तो ऐसे में प्रेम के इस पावन अवसर पर इसके बदलते मूल्यों की पड़ताल
करना लाजमी जान
पड़ता है | प्रेम
ना तो दिखावे
की वस्तु है,और ना
ही यह आपके
छिपाने से छिप
सकता है | पर
क्या वास्तव में
ऐसा है ? वर्तमान
परिस्थितियों में तो
ऐसा प्रतीत नहीं
होता | हम जिस
दौर के प्रेम
को देख और
जी रहे
हैं उस दौर
के प्रेम और
इतिहास के पन्नों
में सिमटी प्रेम
कथाओं में जमीन
आसमान का अंतर
जान पड़ता है
|
प्रेम के ऐतिहासिक
आख्यान-
पहले प्रेम
अपने सर्वोत्तम रूप
में मौजूद था,जिसमें समर्पण,त्याग,नैतिकता,विश्वास जैसे
तत्वों का समावेश
था |उस वक्त
प्रेम सुलभ नहीं
दुर्लभ था,सहर्ष
नहीं होता था
लेकिन एक बार
हो गया तो
टूटन की गुंजाइश
ना के बराबर
थी ।आज के
अधिकांश संबंध जुड़ने के
दिन से ही
थोड़े-थोड़े टूटने
शुरू हो जाते
हैं | प्रेमिका को
पाने के लिए
प्रेमी की
दीवानगी या इसके
उलट कई प्रतिमान
मौजूद हैं जो
आज कल के
प्रेम करने वालों
को बहुत रोमांचित
करते हैं | ये
अलग बात है
कि हम उन
प्रतिमानों को आत्मसात
नहीं करते | यहाँ
सवाल यह भी
उठता है कि
आज हम किस
प्रेम को आदर्श
के रूप में
स्वीकार करें ? कृष्ण के
प्रेम को,ना
ना उसके प्रेम
में गंभीरता नहीं
थी | पृथ्वीराज चौहान
के प्रेम को,ना वो
भी नहीं क्योंकि
संयोगिता के चक्कर
में उसने अपना
राज मोहम्मद गोरी
के हाथों गँवा
दिया,और मुझे
लगता है कि
आज की युवा
पीढ़ी पृथ्वीराज जैसी
गलती नहीं कर
सकती | फिर अकबर
के प्रेम को,लेकिन अकबर ने
किससे प्रेम किया
था ? जोधा से,अरे नहीं भाई
वो प्रेम नहीं
अकबर की रणनीतिक
मज़बूरी थी |शाहजहाँ का प्रेम ?नहीं वो प्रेम नहीं,वरन प्रेम का विलासितापूर्ण,निरंकुश और संवेदनहीन प्रदर्शन था क्योंकि जिस समय वह ताजमहल बनवा रहा था उस वक्त मुग़ल साम्राज्य में भीषण अकाल पड़ा था | यहाँ मैं सिर्फ
पुरुषों के प्रेम
की उपमाएं ही
दे रहा हूँ
कृपया महिलाएं इसे
गलत अर्थ में
ना लें | अगर सच कहूँ तो प्रेम का कोई रोल मॉडल या Ideal Couple नहीं हो सकता |ऐसा करना प्रेम जैसे खुले आसमान को बेतुकी कोशिशों से बांधने के समान होगा |
प्रेम और क्रिकेट-
अगर हम क्रिकेट
से प्रेम की
तुलना करें तो
प्रेम का स्वरुप
पहले टेस्ट क्रिकेट
की तरह होता
था,कोई जल्दीबाजी
नहीं आराम से
अपनी-अपनी पारियां
खेलिये |परंतु आजकल के
प्रेम ने तो
अब 20-20 को
भी मात दे
दी है | दरअसल
पहले के प्रेम
में Competition नहीं
था | बल्लेबाज केवल
बल्लेबाजी पर ध्यान
केंद्रित करके टीम
में अपनी जगह
पक्की करता था|आजकल ऐसा
नहीं है प्रतिस्पर्धा
बहुत है आपको
Allrounder की तरह Perform करना पड़ता
है |
अगर हम दूसरे
शब्दों में कहें
तो पहले का
प्रेम,प्रेमचंद के
उपन्यास की तरह
था जिसमें आप तल्लीन
होकर पात्र में
डूब जाते थे
जितनी गहराई में
उतरो उतना ही
आनंद |अब का
प्रेम,चेतन भगत
के नावेल की
तरह हो गया
है पढ़ते समय
Dont be emotional पढ़ो और किताब
को भूल जाओ
|
वैसे आजकल प्रेम
करने के लिए
भावनाओं की नहीं
प्रदर्शन की जरुरत
होती है,पैसा,गाड़ी,देह
सब कुछ प्रदर्शित
कीजिये तभी आनंदातिरेक
में जाएंगे | पायल
की झंकार नहीं
अब WhatsApp के Tune पर प्रेम
का मधुर संगीत
सुनाई देता है
|
इतिश्री- प्रेम अगर प्रतीकों
का मोहताज हो
जाए तो समझिये
प्रेम के मूल्यों
में क्षरण हो
रहा है | जितने
प्रेम संबंध बन
रहे हैं,उसी
गति से प्रेम
संबंधों में विच्छेद
भी हो रहा
है | जानू,सोना,बाबू,स्वीट
हार्ट अनेकों संबोधनों
ने जन्म लिया
लेकिन फिर भी
हर्ट होने और
करने के आंकड़ों
में रोजाना वृद्धि
हो रही | जिस
तरह महानता के
कुछ शाश्वत प्रतिमान
होते हैं उसी
तरह प्रेम भी
कुछ मूल्यों पर
सदियों टिका रहा
है | परंतु आजकल
प्रेम के प्रदर्शन
को देख कर
लगता है कि
इसके मूल्य भी
दरक रहे हैं | कुछ है जो
छूटता जा रहा
है | जरुरी नहीं
की हाथों में
हाथ डाले कनॉट
प्लेस के जोड़े
का प्रेम उतना
मजबूत हो जितना
लक्ष्मण और उर्मिला
की विरह का
प्रेम था |आज
के ज़माने का
प्रेम सिर्फ धूल
उडाता है स्तर
नहीं उठाता| अच्छा
है Valentine Day मनाइये लेकिन सिर्फ
इसी दिन के
भरोसे प्रेम जैसे
बड़े और मूल्यवान
शब्द को मत
छोड़िये | प्रेम कीजिये,पर उससे पहले,विश्वास,बलिदान और समर्पण के भावों को जागृत कीजिये