Thursday, 7 July 2016

रवीश के अकबर को पत्र का मेरा जवाब

अप्रिय
         रवीश कुमार अभी थोड़ी देर पहले ही मुझे उसी सोशल मीडिया पर जिसकी वजह से आप जैसे पत्रकार खुद को देश का जनमत समझने लगे एम जे अकबर को संबोधित आपका पत्र मिला | हालाँकि वह मेरे नाम नहीं था और मुझे यह भी नहीं पता कि अकबर साहब आपके द्वारा हेट से सरोबार लव लेटर का जवाब कब देंगे,लेकिन उस पत्र में ऐसी बहुत सी बातें थी जिसका जवाब देना मुझ जैसे पत्रकारिता के एक भूतपूर्व विद्यार्थी और सुधि पाठक होने के नाते जरुरी लगा | सबसे पहले मैं आपको बता दूँ कि मैं उनलोगों में से हूँ जो आपको बिना किसी राग.द्वेष के दलाल कहते हैं |  मैं यह नहीं कहूंगा की आपकी माँ मेरी माँ समान है (अगर आप सही मायने में माँ का अर्थ केवल भारत माँ समझते हैं ) फिर भी जानकारी के लिए बता दूँ कि मैंने कभी आपकी माँ के लिए सोशल मीडिया पर शब्दों से मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया | आप चाहें तो गूगल कर सकते हैं |
                 रवीश मुझे ना तो यह जानने में दिलचस्पी है और शायद मैं कभी यह जान भी नहीं पाऊंगा कि आप पत्रकार के वेष में रहते हुए एक विशेष विचारधारा के प्रवक्ता बनने के बाद क्या सोचते हैं ? जब आप प्राइम टाइम में या जहां कहीं भी आपको मौका और मंच मिलता है एक विचारधारा को तवज्जो देते हुए दूसरी विचारधारा का मान मर्दन करते हुए पत्रकारिता के मूल्यों को बेआबरू करते हैं तो कैसा लगता है ?
                                                  मैं इस अप्रत्यक्ष रूप से मुझ जैसों को संबोधित पत्र का जवाब तल्खी नहीं बल्कि बिलकुल शांत भाव से लिख रहा हूँ | आपको यह शिकायत है कि पिछले तीन सालों से सोशल मीडिया पर आपसे बहुत अनसोशल व्यवहार किया जा रहा है | गाली गलौज,विशेषणों से संबोधन पर क्या ये अचानक शुरू हुआ कि आपके एकपक्षीय विचारों को सोशल मीडिया पर बाढ़ के पानी की तरह डुबो देने की कोशिश की जाने लगी | ट्विटर पर आपको एक खास विचारधारा के वैचारिक चिड़ियों ने अपने शब्द भेदी बाणों से लहूलुहान कर मैदान छोड़ने पर मजबूर कर दिया | अचानक तो बच्चा भी पैदा नहीं होता रवीश उसमें भी 9 महीने लग जाते हैं | यानि यह एक सतत प्रक्रिया जो आपके द्वारा क्रियान्वयित की जा रही थी की तार्किक परिणति है |
                                                                                                           मैंने आपकी बहुत सारी रिपोर्टिंग देखी है और जब मैं जामिया मैं पत्रकारिता का कोर्स कर रहा था तो आपकी अच्छी और निष्पक्ष रिपोर्टिंग के बारे में लोगों से चर्चा भी करता था पर विडंबना देखिये कि जैसे-जैसे आपका पत्रकारिता के सच्चे मूल्यों से मोहभंग या भटकाव शुरू हुआ वैसे ही मुझे भी पत्रकार से दलाल में रूपांतरित होते रवीश कुमार से विरक्ति होनी शुरू हो गई | आप कहते हैं आप दलाल नहीं हैं | दलाली क्या सिर्फ कोठे पर ही होती है ? वो दलाली तो एक के शारीरिक भूख और दूसरे की आर्थिक मज़बूरी की आवश्यक बुराई या तार्किक परिणति है | वो सामान्य लोक हैं किसी स्तंभ का मजबूत आधार नहीं | दलाली उनकी मज़बूरी है |
                                                        क्या आपकी दलाली या वैचारिक खुन्नस का तिलिस्म तब टूट जाता गर मोदी जी अर्नब के बदले आपको साक्षात्कार देते ? आपको खुद के बारे में इतना भ्रम क्यों और कैसे हो गया कि सरकार आपसे चिढ़ने लगी है | सरकार तो आपके माई बाप प्रणव राय से नहीं चिढ़ रही, जिनसे अगर सरकार चिढ़ना चाहे तो रातों रात एन डी टी वी जिसे लोग कुछ सही मायनों में रंडी टी वी भी कहते हैं का बोरिया बिस्तर बंधवा देगी | बिल्कुल मंगल के खून के लेमन सोडे की तरह ठर्र से फाइल खुलेगी और फर्र से पी जाएगी | रवीश इस सरकार के पास करने को बहुत कुछ है | वैसे इतना तो आप भी मानेंगे ना कि मोदी सरकार ने लुटियंस से सत्ता की दलाली करने वालों को उखाड़ फेंका है | चूँकि आप लुटियंस जोन से बाहर हैं इसलिए बड़े आराम से दलाली कर पा रहे हैं | 
                                                  आप खुद दिल पे हाथ रखकर बताओ ना आपकी रिपोर्टिंग से क्या वैचारिक बदबू नहीं आती | ऐसा लगता है मानो भाजपा सरकार ने रंडी टी वी से उधार लेकर अपना चुनाव प्रचार किया हो और जीतने के बाद पैसा देने से मुकर गई हो | घृणा,विद्वेष,झूठ,फरेब जितनी चीजें डालनी हो वो इस सरकार के खिलाफ खबर बनाते और पढ़ते समय डाल देते हैं | मुझे लगता है जिस तरह उल्लू दिन में नहीं देख पाता उसी तरह आप भी कांग्रेस और विपक्ष में कोई बुराई नहीं देख पाते | लेकिन उल्लू की देखने की समस्या तो केवल दिन में ना देख पाने की है आप तो चारो पहर सूरदास बने रहते हैं | चलो कुछ देर के लिए यह मान भी लिया की कुछ लोग ऐसे हैं जिनकी वजह से आपको ट्विटर छोड़ना पड़ा लेकिन क्या वो बेवजह ऐसे हैं | आपके पास तो दलाली और विद्वेष फ़ैलाने के लिए रंडी टीवी है उनके पास क्या है ? वो बेचारे तो तो केवल न्यूटन के तीसरे नियम का पालन करते हैं | 
                                    रवीश निश्चित रूप कुछ पत्रकार और चैनल सरकार के घोषित प्रवक्ता हैं और वो अपनी वैचारिक बिरादरी में पूजे भी जाते हैं पर उनका एजेंडा तो बिलकुल स्पष्ट दिखता है वो छधम पत्रकारिता नहीं करते | रोहित सदाना,रजत शर्मा या सुधीर चौधरी रोज यह राग नहीं अलापते की सोशल मीडिया पर मुझे गलियां मिल रही हैं | क्या आपको लगता है कि उन्हें दलाल या उनकी माताओं को विशेषणों से नहीं नवाजा जाता होगा | प्यार,नफरत,दलाली जो करना है खुल कर करो ना भाई | ये कैसी शादी निभा रहे कि एक तरफ बीबी करवाचौथ रख रही और दूसरी तरफ आप कहीं और पींगें लड़ा रहे | इससे तो अच्छा है संबंध विच्छेद कर दो | अगर रवीश कुमार एक स्वघोषित दलाल बरखा दत्त को महिला सशक्तिकरण का प्रतीक मानता है तो उसी रवीश को स्मृति ईरानी में यह प्रतीक क्यों नहीं दिखती है ? 
                                            जनरल वी के सिंह ने प्रेस्टिट्यूड’ विशेषण का इस्तेमाल सारे पत्रकारों के लिए नहीं आप जैसे कुछ चुनिंदा पत्रकारों के लिए ही किया था | मुझे ताज्जुब इस बात का है कि आपलोगों ने इस विशेषण को दिल से लगा लिया अगर प्रेस्टिट्यूड’ नहीं हो तो दिल में इतनी कसक नहीं उठनी चाहिए थी ना | या इसलिए उठी क्योंकि भाजपा के किसी मंत्री ने ऐसा कह दिया | क्या मायावती,अरविन्द केजरीवाल,असदुद्दीन ओवैसी,लालू यादव जैसे महान धर्मनिरपेक्षता वादी इस विशेषण का प्रयोग करते तो भी इतना ही बुरा लगता ? बिलकुल नहीं,क्योंकि इनके कर्म,इनकी राजनीती इनकी वाणी का ओज तो आप जैसों के लिए प्रेरणा का श्रोत है | समुद्र मंथन से निकले अमृत तो यही हैं बाकी सारे भाजपाई और संघ वाले तो विष व्याप्त हैं | रवीश,मैं ये तो नहीं कहूंगा कि आज के युवाओं के लिए आजकल रवीश कुमार बनना आसान है या एम जे अकबर लेकिन इतना जरूर है कि अकबर ने अकबर बनने के लिए कभी वैचारिक विष वमन नहीं किया | 
          मुझे लगता है आप खुद को सोशल मीडिया पीड़ित और नैतिकता और पत्रकारिता के ऊँचे मूल्यों का रहनुमा दिखाकर उस मुस्लिम पत्रकार एम जे अकबर पर निशाना साध रहे जो अब भाजपा सरकार में मंत्री हैं | यह बात आप काफी दिनों तक पचा नहीं पाएंगे कि एक मुस्लिम पत्रकार भाजपा में जाकर मंत्री कैसे बन गया ? मैं यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि गर अकबर साहब कांग्रेस सरकार में मंत्री बनते तो रवीश कुमार वैसा ही मौन धारण कर लेता जैसा सम्पूर्ण प्रधानमंत्रित्व काल में मनमोहन सिंह ने किया था |
  पुनश्च
आप पत्र लिखने में अच्छी वैचारिक स्याही खर्च करते हैं | पर यह स्याही तब क्यों सूख जाती है जब आशुतोष भरी जवानी में पत्रकारिता को त्यागकर आप से ब्याह रचा लेते हैं | तब आपकी कलम को क्या हो जाता है जब बरखा 2जी में संलिप्त पाई जाती हैं | मैं जानता हूँ आपकी स्याही तब भी सूख जाएगी जब राजदीप सरदेसाई आप का दामन थामेंगे | आप लिखते रहो,विष उगलते रहो अभी तो सिर्फ ट्विटर से विलुप्त हुए हो अगर यही हाल रहा तो किसी दिन पत्रकारिता के इतिहास के कूड़ेदान में भी जगह नहीं मिलेगी |
             

Sunday, 3 July 2016

हिंदी बोलने पर माउंटबेटन इन्हें काले पानी की सजा दे देंगे


गत शुक्रवार को दिल्ली का मौसम अरविन्द केजरीवाल की राजनीति की तरह अपना मिजाज बदल रहा था |सुबह धूप,फिर थोड़ी देर के बाद अचानक बादल,फिर हल्की बूंदा-बूंदी |खैर मैं इस मौसम के लिए बिना किसी को जिम्मेदार ठहराए घर पर अपने काम में व्यस्त था | तभी मेरी एक मित्र ने फोन किया और कहा कि जागरण फिल्म फेस्टिवल जाओगे ? मैंने कहा यार हमारे यहाँ फिल्म फेस्टिवल और पुरस्कारों में ऐसा क्या होता है जो मैं अपना समय बर्बाद करूँ | उसने कहा इस पर बाद में बहस कर लेना,वहां नसीरुद्दीन साहब आ रहे हैं हो सकता है वो एक पत्रिका के लिए साक्षात्कार दे दें तुम चूँकि व्यवस्था और व्यक्ति से बहुत सवाल पूछते हो सो साथ चलोगे तो अच्छा रहेगा | मैंने कहा चलो चलते हैं | फिर हम चल पड़े 7 वें जागरण फिल्म महोत्सव की ओर |
                                                          चूँकि मैं देश के सबसे बड़े हिंदी समाचार पत्र के समारोह में जा रहा था तो रास्ते भर मेरे मन में हिंदी के प्रति बहुत सारे सवाल उमड़ रहे थे,कि हम हिंदी भाषी लोग अक्सर अंग्रेजी और अंग्रेजों को कोसते हैं | अंग्रेजी हमसे क्यों आगे है ? विदेशी भाषा को हम क्यों इतनी तवज्जो देते हैं,क्यों करीब 80 करोड़ हिंदी बोलने,समझने और खाने वाले लोगों के सामने अक्सर अंग्रेजी परोसी जाती है | क्या अंग्रेजी के बिना देश का भविष्य नहीं है | आखिर कौन जिम्मेदार है इसके लिए | वगैरह-वगैरह
                                                                      सीरी फोर्ट ऑडिटोरियम पहुंचकर पता चला कि नसीरुद्दीन साहब जो कि इस महोत्सव के मुख्य अतिथि थे वो हॉल नं 3 में हैं हम वहां पहुंचे तो देखा खचाखच भरे हाल में नसीर साहेब एक स्टेज पर (जहां हिंदी में बड़े-बड़े अक्षरों में सातवां जागरण फिल्म महोत्सव लिखा था) एक शख्स (मुझे उस वक्त उसका नाम नहीं पता था ) द्वारा अंग्रेजी में पूछे जा रहे सवालों का अंग्रेजी में ही जवाब दे रहे थे | यह सिलसिला करीब एक घंटे तक चला | हिंदी समाचार पत्र के समारोह के इस अंग्रेजी कार्यक्रम के बाद अब बारी थी इस महोत्सव में केतन मेहता द्वारा निर्देशित फिल्म टोबा टेक सिंह के प्रदर्शन की | उस भरे हुए हाल में भी उद्घोषक,जागरण समूह के प्रबंध निदेशक संजय गुप्ता,सुधीर मिश्रा,केतन मेहता सबने अंग्रेजी में ही अपनी-अपनी बात रखी | और सबसे बड़ी बात इन महानुभावों में से किसी भी व्यक्ति की जुबां से गलती से भी हिंदी का एक शब्द ना निकला | ऐसा लग रहा था मानो हिंदी बोलने पर लार्ड माउंटबेटन इन्हें काले पानी की सजा दे देंगे | 
     मैकाले के मानस पुत्र क्यों दिनों दिन दिनकर की विरासत को लील रहे हैं | जब हिंदी बोलने,समझने और उसी की कमाई खाकर लोग अंग्रेजी की उलटी करेंगे तो बेचारी हिंदी कहाँ से सशक्त होगी | हिंदी के सबसे बड़े दुश्मन तो हिंदी वाले ही हैं | घर लौटते हुए मुझे दुष्यंत कुमार की वो लाइन याद आ रही थीं "कौन कहता है कि आसमां में सुराख़ नहीं होता एक पत्थर को तबियत से उछालो तो यारो |
     लगता है आसमां में सुराख़ करने के लिए फिर दुष्यंत कुमार को पैदा होना होगा | 


               
                                                                           

Thursday, 30 June 2016

लेकिन मैं यह अवार्ड नहीं लौटाऊंगा

नमस्कार मैं रवीश कुमार,प्राइम टाइम में आज हम देश में बेहद तेजी से बढ़ती असहिष्णुता पर चर्चा करेंगे,हम आपको यह बताएंगे कि मोदी सरकार के सत्ता में आने (जिसे रोकने के लिए मैंने दिन-रात एक कर दिया था ) के बाद किस तरह मीडिया की आवाज को दबाने की कोशिश की जा रही है | हम जैसे सीलमपुरी और कापसहेड़ा बॉर्डर के आसपास रहने वाले लोगों की गरीबी दिखाकर वैचारिक रूप से दरिद्र हो जाने वाले पत्रकारों के लिए आज के माहौल में काम करना कितना मुश्किल हो गया है | कैसे इस सरकार के आते ही आमिर खान की बेचारी पत्नी पाकिस्तान जाने की बात करने लगती है | कैसे यह सरकार रॉबर्ट वाड्रा जैसे शरीफ दिखने वाले लोगों के पीछे हाथ धोकर पड़ जाती है | कैसे दादरी में गाय का मांस  मीडिया के लिए लंबे समय तक टीआरपी का जुगाड़ कर पाता  है | आज देश के हालात 1975 के आपातकाल से भी ख़राब हो गए हैं | साथ ही इस बात पर भी नजर डालेंगे कि पुरस्कार लेने और लौटाने के क्या योग्यता और पैमाने होने चाहिए | वैसे मैं आपको बता दूँ कि कल मुझे एनटी अवार्ड्स में बेस्ट हिंदी एंकर का अवार्ड मिला है और मैं इसे लौटाऊंगा नहीं | क्योंकि इसके लिए मैं दो वर्षों से कड़ी मेहनत कर रहा हूँ |
                    ये रवीश कुमार के उस प्रोग्राम ( प्राइम टाइम ) का इंट्रो था जिसके लिए इस शख्स को हिन्दी के बेस्ट एंकर का अवॉर्ड दिया गया। कल पुरस्कार लेते हुए बेशर्मी से मुस्कुराते हुए रवीश कुमार के लिए क्या अब देश में असहिष्णुता ख़त्म हो गई ? क्या अब मोदी सरकार से इसे डर नहीं लगता | दादरी का शोक क्या अब ख़त्म हो गया | क्या अब मीडिया की आवाज को दबाने की कोशिश नहीं हो रही | पुरस्कार वापसी की चीत्कार अब बंद क्यों हो गई ?
            अगर मोदी सरकार मीडिया या उससे सम्बंधित चीजों को नियंत्रित करती या करने की कोशिश करती तो NDTV अब तक बंद हो चुका होता और प्रणव राय सलाखों के पीछे होते क्योंकि इस चैनल पर करीब 2500 करोड़ के हवाला का आरोप है | और कल एनटी अवार्ड्स में उस चैनल (NDTV) को सर्वाधिक अवार्ड मिले जो मोदी जी को पानी पी-पी कर कोसता है |
                       अब यह आपलोग तय कर लीजिये कि वह शख्स कितना विश्वसनीय हो सकता है जो देश की परिस्थितियों की नकारात्मक छवि पेश कर पुरस्कार वापसी अभियान चलाता हो पर खुद पुरस्कार लेते समय बड़ी निर्लज्जता और बेशर्मी से मुस्कुराता हो |
                                               
                                                                     
                                                                            

Tuesday, 28 June 2016

मोदी जी ने अपना पहला साक्षात्कार एक पत्रकार को दिया दलाल को नहीं

अकबर के नवरत्नों के बारे में तो आप सब बखूबी जानते होंगे और अगर नहीं जानते हों तो गूगल कर लीजिएगा | अगर कुछ देर के लिए मीडिया को अकबर मान लें तो बरखा दत्त,रवीश कुमार,राजदीप सरदेसाई,पुण्य प्रसून वाजपेयी,सागरिका घोष,करण थापर,राहुल कँवल निधि राजदान,देवांग उस मीडिया के स्वघोषित नवरत्न हैं | (फर्क सिर्फ इतना है कि अकबर के नवरत्न ताउम्र अपने विचार,बुद्धि और कौशल से मुग़ल साम्राज्य की प्रतिष्ठा बढ़ाते रहे जबकि ये नवरत्न अपने स्वार्थो के लिए पत्रकारिता के पेशे का मान मर्दन कर रहे | ) ये सब लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के कुछ ऐसे आत्ममुग्ध चरित्र हैं जिन्हें लगता है कि भारतीय पत्रकारिता इन्हीं के इर्द गिर्द घूमती है और इसे पुष्पित-पल्लवित करने में इन्होंने महती भूमिका निभाई है | निष्पक्ष,निर्भीक,बेबाक पत्रकारिता के बेदाग चेहरे | अगर वाकई ऐसा है तो कल नरेंद्र मोदी जी को सत्ता के शीर्ष पर पहुँचने के बाद अपने प्रथम बहुप्रतीक्षित साक्षात्कार के लिए इन्हीं नवरत्न,निष्पक्ष चरित्रों में से किसी एक को चुनना चाहिए था | तो क्या अर्नब गोस्वामी का चयन गलत था ? मोदी जी Nation wants to know कि आपने अपने पहले साक्षात्कार के लिए अर्नब को ही क्यों चुना ? 
                                    अब जरा सोचिये अगर कल मोदी जी के साक्षात्कार का मौका इनमें से किसी को मिला होता तो प्रश्न कैसे होते ? मोदी जी का साक्षात्कार इनमें से कोई ले और गुजरात दंगों के बारे में बात ना करे तो ये तो इन नवरत्नों की निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता के साथ तो गद्दारी होगी ना,तो शुरुआत गुजरात से ही तो होती
1. सर क्या आपको गुजरात दंगों पर अफ़सोस है ? 2.क्या आपने राजधर्म का पालन किया था ? 3.विजय माल्या को आपने क्यों लंदन भाग जाने दिया ? 4.ललित मोदी कब तक वापस आएँगे ? 5.मोदी जी आप राम मंदिर कब बनाएँगे ? 6.आप पाकिस्तान पर कब हमला करेंगे ? 7.आप इफ्तार पार्टी में कब जाएंगे ? 8.अच्छा ये बताइए काला धन कब वापस लाएंगे ? 9.रॉबर्ट वाड्रा कब जेल जाएंगे ? 10.एनएसजी की सदस्यता भारत को कब दिलाएंगे ? 11.बुलेट ट्रैन कब चलाएंगे ? 12.साध्वी प्रज्ञा क्या हिंदू आतंकवाद का उभरता चेहरा हैं ?
                                                                          चूँकि अर्नब के सवालों की फेहरिस्त में ऐसे सवाल नहीं थे जो इन नवरत्नों के हिसाब से पत्रकारिता के उच्च मानदंडों को छूते हैं तो जाहिर सी बात है इन्हें यह साक्षात्कार बिलकुल नहीं भाया | दरअसल  इन पत्रकारों ने अपनी दलाली (बरखा दत्त की दलाली के बारे में तो पूरा देश जानता है ) वैचारिक दलाली,टीआरपी पिपासा से पत्रकारिता के पेशे को इतना गंदा कर दिया है जहां सामान्य जन सरोकारों की चीजें इनके लिए मायने नहीं रखती |
                                       इनमें से कुछ को हमेशा बहुसंख्यकों के आगे अल्पसंख्यकों का दर्द सालता है | ये दादरी देखते समय शिव जी की तरह तीनों नेत्र खोल लेते हैं और मालदा पर सूरदास बन जाते हैं | इन्हें कांग्रेस के निकम्मे युवराज में भारत का भविष्य दिखता है वहीं मोदी जी को ये देश के लिए खतरा मानते हैं | NSG की सदस्यता ना मिलने को ये मोदी जी की व्यक्तिगत विफलता मानते हैं जबकि MTCR की सदस्यता पर इन्हें सांप सूंघ जाता है |
शुक्र है मोदी जी ने अपना पहला साक्षात्कार एक पत्रकार को दिया किसी ऐसे दलाल को नहीं जो पत्रकारिता के चौथे स्तंभ को दीमक की तरह चाट कर खोखला रहा है | 
पुनश्च
इस साक्षात्कार के बारे में कांग्रेस की प्रतिक्रिया पर कुछ भी लिखना वक्त जाया करना होगा


           

Wednesday, 20 January 2016

वो मेट्रो वाली बच्ची

आप राजीव चौक मेट्रो स्टेशन पर जितनी बार और समय के जिस भी पहर में जाएँगे एक बार निश्चित रूप से देश की बढ़ती आबादी को गरियाएंगे | हर वक्त भीड़ की अफरा तफरी,ऐसा लगता है मानो लोगों को जंग के मैदान में जाने की जल्दबाजी हो | खैर मेट्रो में रोजाना सफर करते हुए अब ये सारी चीजें मेरे लिए न तो नई है और न ही परेशान करती है |
            आज शाम कौशांबी से राजीव चौक उतरकर नीचे जहांगीर पुरी की तरफ जाने वाली वाली मेट्रो का इंतजार कर रहा था | मेट्रो आई लेकिन वो विश्वविद्यालय तक ही जा रही थी | आश्चर्यजनक रूप से इसमें भीड़ थोड़ी कम थी,सो मैंने सोचा चलो इसी में निकल लेते हैं,आगे बदल लेंगे | संजोगवस सीट भी मिल गई | मैं अपने बैग से रोजाना की तरह न्यूज़ पेपर निकालने ही वाला था कि मेरी नजर सामने वाली सीट पर पड़ी | एक 9-10 साल की बच्ची बैठी थी | उसके बाल बिखरे-बिखरे से थे,तुड़े-मुड़े कपड़े,ठंड में सिकुड़ी हुई लेकिन चेहरे पर शांत भाव और हंसमुख सी दिख रही थी | 
                           मेट्रो जैसे ही नई दिल्ली से खुली वो दोनों हाथों से अपने हवाई चप्पल जो बिल्कुल घिसा सा किसी तरह उसके पैरों में पड़ा कराह रहा था उसे खोलने की कोशिश कर रही थी | शायद उसे पैर में चोट लगी थी हल्का खून भी रिस रहा था | मैं एक टक उस बच्ची को देख रहा था | डिजिटल इंडिया,सहिष्णुता असहिष्णुता के शोर और जन धन जैसी योजनाओं से अंजान उस मासूम का सारा ध्यान सिर्फ इस बात पर था कि चप्पल खोलते समय कहीं टूट न जाए,बहुत आहिस्ता-आहिस्ता वो कोशिश कर रही थी लेकिन किस्मत भी तो साली गरीबों को दगा दे जाती है | और वही हुआ जिसका उसे और मुझे भी डर था उस बेचारी की चप्पल टूट गई | उस वक्त उसके लिए इससे बड़ी मुसीबत और कुछ नहीं हो सकती थी | बिल्कुल रुआंसा हो गया था उसका चेहरा | वो इधर-उधर देखने लगी,उसकी आँखों की बेबसी,छटपटाहट सब कुछ बयां कर रही थी | मैं अपनी सीट से उठा और उसके पास जाकर उससे पूछा तुम्हें कहाँ जाना है | तब तक उसके दो सीट बगल वाली लड़की ने कहा ये प्रताप नगर जाएगी इसके साथ शायद इसके पापा हैं उसने ऊँगली से सामने की तरफ इशारा किया मैंने देखा वो थोड़ा विक्षिप्त सा अधेड़ उम्र का शख्स था | मैंने फिर बच्ची की तरफ मुखातिब होते हुए पूछा कुछ खाओगी ? वो मेरा सवाल सुनकर अपने चप्पल की ओर देखने लगी तभी मेट्रो में रोजाना की तरह उद्घोषणा हुई दिल्ली मेट्रो में खानपान,मद्धपान और ध्रूमपान निषेध है | उफ्फ्फ क्या विडंबना है यार | मैंने अपना पर्स निकाला और उस बच्ची के हाथ में 100 का नोट पकड़ाते हुए कहा लो कुछ खा लेना | उसने मेरी तरफ देखते हुए सिर्फ Thank You बोला | तब तक कश्मीरी गेट आ गया और वो बच्ची अपने पापा का हाथ पकड़ते हुए बाहर निकल गई | और मैं इस सोच के साथ सफर में आगे बढ़ने लगा कि वो कुछ खाएगी या अपने लिए चप्पल खरीदेगी | 

Sunday, 17 January 2016

पुलिस और गरीब बच्चों की सेवा,ओय तेरी

मुझे अकेलापन बहुत सकून देता है, हालाँकि इसके बहुत सारे फायदे हैं तो कुछ नुकसान भी है | अगर आप रात में देर से सोए हैं और सुबह-सुबह Cook,Bell  बजाए तो आप Delhi Belly Movie के आलसी मित्रों से उम्मीद न कर खुद ही दरवाजा खोलने की जहमत उठाते हैं | और दिल्ली की Cook हर सुबह आते ही सवाल दागेगी क्या बनेगा भैया ? अरे यार रोज एक ही सवाल पूछती हो | कुछ बना दो | बस तेल कम डालना सब्जी में | भैया अब क्या पानी में खाना बनाऊं | दिल्ली की कूकनियों (महिला कुक को यहाँ कूकनी से संबोधित किया जाता है ) | को लगता है कि अगर सब्जी में तेल नहीं डाला तो मानो पाकिस्तान अटैक कर देगा | खाना मुझे है न,तुम Boil बना दो ( आपलोगों की जानकारी के लिए बता दूँ,Boil या एकदम नाम मात्र का तेल मसाला खाने के ये फायदे हैं कि उम्र कभी आपसे आगे नहीं जाएगी,वो एक अच्छे अनुचर की तरह हमेशा आपके पीछे-पीछे रहेगी ) बस ज्यादा तेल नहीं होना चाहिए | उनींदी आँखों से सुबह का ये वार्तालाप पूरा कर मैं अपने बिस्तर पर आ गया | तक़रीबन आधे घंटे के बाद फिर Cook की आवाज ने मेरी शाही नींद में खलल डालते हुए कहा भैया खाना बन गया मैं जा रही हूँ | ह्म्म्म्म्म ठीक है | उसे विदा कर मैं फिर बिस्तर की ओर उन्मुख हुआ कि चलो अब कोई विघ्न नहीं आएगी | बस नींद मुझे अपने आगोश में लेने ही वाली थी की फिर Bell बजी ओ बहन के अब कौन आ गया | दरवाजा खोला देखा एक खाकी वर्दी वाला रजिस्टर लिए खड़ा था | मैंने कहा हें,ये किस काम से आया है सुबह-सुबह |न तो मैंने किसी ढोंगी बाबा की मिमिक्री की,न मेरी पोस्ट से किसी की भावनाएं आहत हुई | चलो इतनी तसल्ली हो गई की बंदा गिरफ्तार- विरफ्तार करने नहीं आया है |  मैंने पूछा बताइये क्या काम है,उसने रजिस्टर मेरे आगे करते हुए बोला ये 26 January  के लिए है,बस आप यहाँ Signature कर दीजिये,अच्छा ठीक है | Signature करते समय मेरी नजर उसके अगले कॉलम पर पड़ी जिसमें मुझसे पहले कुछ लोगों के Signature दर्ज थे साथ ही Signature के बगल में 100,200,500 लिखा था | मैं उससे कुछ पूछता उससे पहले ही उसने कहा आप कितने लोग हो ? मैंने कहा एक | फिर वो बोला हम लोग 26 जनवरी को गरीब बच्चों की सहायता के लिए एक प्रोग्राम कर रहे हैं,उसके लिए कुछ सहायता राशि चाहिए | मैंने और आपमें से जिसने भी दिल्ली या भारत भर की पुलिस की कार्यपद्धति देखी है उसके हिसाब से तो ये हैरान करने वाली बात थी | पुलिस और सहायता वो भी गरीब बच्चों की | ओय तेरी | मैंने सोचा चलो  Signature तक तो ठीक है यार,क्योंकि साला 26 जनवरी 15 अगस्त जैसे दिनों को आम भारतीयों पर खतरा कुछ ज्यादा ही बढ़ जाता है,शायद पुलिस वाले एहतियातन ये कर रहे होंगे | पर ये पैसे वाली बात मुझे हजम नहीं हुई | उस बंदे ने खाकी वर्दी के ऊपर जैकेट पहन रखी थी | मैंने कहा जरा अपना बैज दिखाओ |  नाम था उमा शंकर शर्मा | अब मैं,आप से तुम पर आ गया था | फिर पूछा अपना आई कार्ड दिखाओ उसने आई कार्ड निकाला, मध्य प्रदेश पुलिस सेवा मंडल | मेरा पारा सुबह-सुबह सातवें आसमान पर चढ़ गया | साले हरामी के पिल्ले MP पुलिस वहां से दिल्ली आकर समाज सेवा कबसे करने लगी | तुम्हारा बॉस कौन है | उसने एक पर्ची निकाली उस पर किसी जावेद खान का नाम था |मैंने कहा ये कौन है ? कहाँ का S.P, D.S.P  है ? नहीं ये हमारे संगठन के मुखिया हैं | मतलब भौंसड़ी के तुम फर्जी पुलिस वाले हो | तब तक मैंने सुबह-सुबह अपनी ठंडी हाथों से एक करारा तमाचा उसके गाल पर रशीद कर दिया | मुझे याद भी नहीं की मेरे इन कोमल और सहिष्णु हाथों ने आखिरी बार कब असहिष्णुता दिखाई थी | (यकीन मानिये मैं बहुत सहिष्णु हूँ ) बहनचोद पुलिस की वर्दी पहन कर और बच्चों के नाम पर ये धंधा करते हो | रुको अभी दिल्ली पुलिस को फोन करता हूँ 100 पर | मैंने फोन हाथ में लिया 100 No डायल किया,हेलो दिल्ली पुलिस कंट्रोल रूम,तब तक वो बंदा सीढ़ियां उतरने लगा | चलो इसके लिए इतना सबक काफी है | हेलो आवाज नहीं आ रही है | मैंने फोन काटा और नींद से क्षमा मांगी की आज फिर मैं तुम्हें मुकम्मल जहां तक नहीं पहुंचा पाया 

Saturday, 9 January 2016

और तुम उन्हें लाहौर का मरहम लगाओ |


वो जवानों का सीना गोलियों से छलनी करेंगे
और तुम कसाब को बिरयानी खिलाओ | 
वो हथियारों का जखीरा भेजेंगे,
तुम उन्हें सबूत सौंपते जाओ |
वो आतंकियों की शहादत पर गर्व करेंगे
और तुम अपने जवानों को शहीद का दर्जा देकर खुश हो जाओ  |
वो दिल्ली का दिल दहलाएंगे
और तुम इस्लामाबाद को दोस्ती का पैगाम भिजवाओ  | 
वो चीन से अपनी पींगें बढ़ाएंगे
और तुम अमेरिका के सामने मातम मनाओ |
वो नफरत की आग जलाएंगे
और तुम उसपर शांति का मुलम्मा चढ़ाओ  |
वो तुम्हें कारगिल का जख्म दें
और तुम उन्हें लाहौर का मरहम लगाओ | 
वो तुम्हारी बहन,माओं को विधवा करेंगे
और तुम राहत के संगीत के लिए शोर मचाओ | 
वो हैवानियत का नंगा नाच दिखाएं
और तुम उन्हें इंसानियत का पाठ पढ़ाओ |
मैं ये नहीं कहता कि मिटा दो उसे दुनिया के नक़्शे कदम से 
पर इस अदने पाकिस्तान को उसकी औकात तो बताओ