Thursday, 31 August 2017

राम रहीम जैसे बाबाओं को समाज में स्थापित कौन कर रहा है ?

38 मौतें,सैकड़ों घायल,करोड़ों की संपत्ति का नुकसान,आम जन को भारी परेशानी,21 वीं सदी के आधुनिकता की बयार में बह रहे देश की विदेशों में थू-थू,सरकार की फजीहत,न्यायपालिका का चाबुक और अंततः कुकर्मी बाबा को जेल | यह सारा घटनाक्रम महज 3 दिनों के अंदर हुआ | इससे पहले भी बहुत से बाबाओं की पोल खुली थी और उसमें जानें गईं थीं | और ऐसा भी नहीं है कि ऐसे बाबाओं के कारनामों के पर्दाफाश की यह अंतिम फिल्म थी,आगे भी इनकी फ़िल्मी दास्ताँ देश के सामने आएंगी | लेकिन सवाल उठता है कि एक ऐसा देश जो आधुनिकता की दहलीज पर दस्तक दे रहा हो,सूचना प्राद्यौगिकी में विश्व की अगुवाई कर रहा हो,एक ऐसे देश में जहाँ हिन्दुओं की बहुदेव वादी प्रथा में 33 करोड़ देवी देवता हैं,मुसलमानों और ईसाईयों के एकेश्वरवाद में पैगम्बर और ईसा हैं ऐसे बाबाओं का उदय कैसे हो गया हुआ ? 
                        यह तो सर्वविदित है कि राजनीतिक दलों का अंतिम लक्ष्य सत्ता की प्राप्ति होती है,वो अपने हिसाब से चुनावी गुणा गणित के लिए ऐसे बाबाओं का समर्थन लेते हैं और लेते रहेंगे | लेकिन मेरे विचार से ऐसे बाबाओं के उदय में जिसने सबसे ज्यादा योगदान दिया वो है हमारा मीडिया | ऐसा देश जो अभी-अभी घोर गरीबी और भुखमरी की दहलीज से बाहर निकला हो उसके पास मनोरंजन के बहुत न्यूनतम साधन हैं,जिसमें सबसे मुख्य टीवी है | 80 के दशक में जब भारत में टेलीविज़न आया लगभग उसी समय रामायण और महाभारत का प्रसारण भी हुआ जिसके पात्रों को लोग भगवान की तरह पूजने लगे | धीरे--धीरे ऐसे धारावाहिकों की जगह भूत प्रेत और सास बहु की साजिश जैसे सीरियलों ने ले ली | इसी के साथ-साथ निजी समाचार चैनलों ने दस्तक दी जैसे-जैसे समाचार चैनलों की भीड़ बढ़ती गई उनके बीच टीआरपी के अंधी दौड़ शुरू हुई |
                                                                        हर कीमत पर खुद को नंबर वन दिखाने की होड़ | इसी के सामानांतर ऐसे बाबा जो अपनी कुटिया तक सीमित थे चैनलों ने उन्हें और उनके ऐसे करतबों को दिखाना शुरू किया जिसने जनता के खासकर गरीब और बेरोजगार जनता के दिलो दिमाग पर गहरी छाप छोड़ी |फिर जब भीड़ जुटनी शुरू हुई तो बाबाओं ने धर्म और विश्वास की अच्छी पैकजिंग कर अपनी मार्केटिंग शुरू की |मीडिया ने ऐसे बाबाओं को घर-घर पहुँचाया और बाबाओं ने गरीबों के चढ़ावे से मीडिया की झोली भरी |
                                                         एक समय जब ये चैनल,भूत,प्रेत सांप बिच्छू अंधविश्वास को अपने प्राइम टाइम में प्रमुखता से दिखाने पर लोगों के निशाने पर आए तो इन्होने यह कहकर अपना बचाव किया कि भारतीय मीडिया अभी शैशवावस्था में है और उसे परिपक्व होने में थोड़ा समय लगेगा | समय के साथ साथ ये परिपक्व तो हुए लेकिन इस परिपक्वता के साथ साथ इन्होंने समाज में ऐसे बाबाओं को स्थापित कर दिया दिया जो एक प्रगतिशील और आधुनिक समाज के लिए स्वयं सबसे बड़ा खतरा थे |
                                                                     जरा याद कीजिये इंदिरा गाँधी के ज़माने में तांत्रिक धीरेन्द्र ब्रह्मचारी बहुत शक्तिशाली थे,फिर नरसिम्हा राव के समय चंद्रास्वामी भी उभरे लेकिन इनके आभामंडल से कुछ एक राजनीतिक वर्ग ही प्रभावित हुआ आम लोग नहीं,जरा फर्ज कीजिये अगर उस वक्त ये टीआरपी प्रेमी चैनल होते तो ऐसे बाबाओं का साम्राज्य और प्रभाव कितना विशाल होता | जो बाबा के कट्टर भक्त थे उनकी श्रद्धा अब भी नहीं डिगी है,जो उसके आलोचक थे वो भी उसी तरह हैं,अगर बाबा को लेकर किसी का नजरिया बदला है तो वो है मीडिया | हमारे टीवी चैनल अपनी सुविधा और फायदे के हिसाब से खुद को मोड़ लेते हैं जब जैसी बयार चली वो उसी दिशा में बह गए | वही मीडिया जो कल तक ऐसे बाबाओं की खबरें दिखाकर,उसके प्रवचनों,फिल्मों को दिखाकर अपनी टीआरपी बढ़ाने में व्यस्त था ने अब सीधे-सीधे 360 डिग्री का यू टर्न मारा है |आज जो चैनल अपने प्राइम टाइम में बाबा के काले कारनामों की पोल खोल रहे उसने कभी इन बाबाओं की सच्चाई जानने या उसपर तथ्यपरक,खोजपरक खबरें दिखाने की जहमत क्यों नहीं उठाई |
                                                                1972 को अमरीकी पत्रकारिता के इतिहास में एक मील का पत्थर वर्ष कहा जा सकता है क्योंकि इसी साल वाशिंगटन पोस्ट और न्यूयार्क टाइम्स के 3 साहसी पत्रकारों ने प्रसिद्ध वाटरगेट कांड का पर्दाफाश किया था जिसे लेकर अंततः रिचर्ड निक्सन को राष्ट्रपति पद छोड़ना पड़ा था | हमारे यहाँ के चैनलों में से किसी ने भी आज तक ऐसी पत्रकारिता के लिए नजीर नहीं पेश की जो समाज और सत्ता में उथल पुथल मचा दे |
    जब बच्चा शैशवावस्था में होता है तो उस वक्त उसे जो चीजें सिखाई जाती हैं आगे वह उसी का अनुकरण करता है | लोकतंत्र के बाकी तीन स्तंभ परिपक्व हो चुके हैं उन्हें बदलना या उनसे जिम्मेदारी भरे भाव की अपेक्षा करना खुद को भुलावे में रखना है | ( अपवादों को छोड़ दें ) लेकिन यह शिशु रूपी चौथा स्तंभ अभी भी समाज को बहुत कुछ दे सकता है | 

Sunday, 18 June 2017

देश क्रिकेट के अलावा मांगे मोर

ना शर्मा पाक को शर्मा पाए,
ना धवन,शिखर को छू पाए |
कोहली का विराट स्वरुप कहीं दिखा नहीं,
युवी भी युवराज की तरह ना खेल पाए |
धोनी अनहोनी से चूके,
केदार भी काम ना आए |
जडेजा ने रायता फैलाया,
खुद भी ना टिके और
पंड्या को रन आउट करवाया |
आश्विन की फिरकी बिखरी-बिखरी सी नजर आई,
भुवी की रफ़्तार गिल्लियां ना बिखेर पाईं |
बुमराह के तो क्या कहने,
वो आज खुद ही गुमराह दिखे |
कुछ नो बॉल पर लगाते लगाम और
टॉस जीतकर,
पहले आप पहले आप का ना सुनाते फरमान,
तो आज शायद
गुलजार होती हिन्दुस्तानियों की शाम |
मगर ये हो ना सका |
खैर बहुत हुआ क्रिकेट का मान-सम्मान,
देश केवल एक खेल से नहीं बनता महान |
अब बहुत हुआ क्रिकेट का शोर,
देश क्रिकेट के अलावा मांगे मोर 

Saturday, 27 May 2017

भारत रत्न सचिन के सामाजिक सरोकार

जब किसी व्यक्ति को पुरस्कार मिलता है तो उसके सामाजिक सरोकार और जिम्मेदारियां और बढ़ जाती हैं | और पुरस्कार जब भारत रत्न जैसा हो और प्राप्तकर्ता सचिन तेंदुलकर हो तब तो क्या कहने | अमूमन यह पुरस्कार लोगों को जीवन की सांध्य बेला में या मरणोपरांत मिलता है | लेकिन सचिन इसके अपवाद हैं | 2013 में क्रिकेट के सभी प्रारूपों से सन्यास लेने के कुछ ही महीनों बाद यूपीए सरकार ने 40 वर्षीय सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न सचिन तेंदुलकर बना दिया | क्रिकेट के भगवान ने रत्न धारण कर लिया,भक्तगण हर्षित पुलकित हो उठे,कहने लगे यह सम्मान सचिन का नहीं भारत रत्न का है | ऐसा लगा मानो सचिन को भारत रत्न इस देश की सबसे युगांतकारी घटना है | हालाँकि एक तबका ऐसा भी था जिसे लगा कि सचिन को यह पुरस्कार जल्दबाजी में और नितांत राजनीतिक फैसले के तहत दिया गया,और इस बात में दम भी था |
यूपीए 2014 में खुद को जमींदोज होने से बचाने के लिए तमाम तरह की कोशिशें कर रहा था | उसे लगा की गर क्रिकेट का भगवान पंजा थाम ले और आगामी चुनाव में पंजे के लिए प्रचार करे तो इसका अच्छा खासा फायदा पार्टी को मिलेगा | लेकिन भगवान तो दूरदर्शी होते हैं उन्होंने सिर्फ रत्न थामकर पंजे को झटक दिया,और कांग्रेस मन मसोसकर रह गई,उसके बाद जो हुआ वह इतिहास है | 
                                                 खैर अब आते हैं सचिन के सामाजिक सरोकारों पर | सचिन के कट्टर भक्तों को भी सचिन द्वारा किया गया ऐसा कोई कार्य शायद ही दीगर हो जो देश की आम समस्या से जुड़ा हो | देश में कोई भी प्राकृतिक आपदा आए,सैनिक सीमा पर जान गंवाए या किसान आत्महत्या करे कभी इस भारत रत्न की ना तो जुबां से कुछ निकलता है और न जेब से (एक आध अपवाद छोड़ दें ) | क्या भगवान ख़ामोशी का यह आवरण इसलिए ओढ़े रहते हैं ताकि जुबान खुलने पर कहीं कोई विवाद ना उत्पन्न हो जाए और भगवान के हाथ से कोई ब्रांड इंडोर्समेंट की डील ना खत्म हो जाए | भगवान सिर्फ मंद मंद मुस्कुराते हुए अपनी तिजोरी भर रहे |    जरा सचिन द्वारा एंडोर्स किए जा रहे विज्ञापनों पर गौर फरमाइए पेप्सी,कोला,बुस्ट,टायर,बिस्कुट,सीमेंट,जूता,कैमरा,फोन मतलब मधुशाला को छोड़कर जो भी भगवान के पास आया भगवान ने उसका प्रचार किया | और हमारी खोखली मीडिया में यह प्रचार हुआ कि भगवान किसी ऐसी चीज का प्रचार नहीं करते जो समाज और शरीर के लिए नुकसानदेह हो | बहुत खूब |
                                                                         यूँ तो परोपकार और सामाजिक जिम्मेदारी ऐसे विषय हैं जिसके लिए किसी पर दबाव नहीं डाला जा सकता,लेकिन एक ऐसे निम्न मध्यवर्गीय परिवार से निकला शख्स जिसने थोड़ा अभाव झेला हो और जिसकी सफलता किसी परिकथा जैसी हो तो ऐसे में समाज के लिए उस शख्स की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है | 
कांग्रेस ने 2012 में भगवान को राज्यसभा का सदस्य मनोनीत कर दिया | लोगों को लगा कि भगवान कम से कम खेल से जुड़े मुद्दों पर बतौर सांसद कुछ योगदान देंगे | पर भगवान की राज्यसभा में उपस्थिति ईद के चाँद वाले मुहावरे को भी मात दे गई | वायु सेना ने सचिन को ग्रुप कैप्टन की मानक उपाधि दी | शायद यह सोचकर कि सचिन युवाओं को वायु सेना में आने के लिए प्रेरित करेंगे,लेकिन सचिन यहाँ भी सांकेतिक चीजों से आगे ना बढ़ पाए |
    देश को ऐसे भारत रत्न से क्या फायदा जो कभी उपहार में मिली फेरारी पर टैक्स में छूट मांगने के लिए,कभी रक्षा मंत्री से मिलकर रक्षा मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में अपने आशियाने की मंजूरी के लिए कभी बीसीसीआई से अपनी फिल्म बनाने के लिए मुफ्त में फुटेज मांगने के लिए चर्चा में रहता है लेकिन आज तक न तो कभी संसद और ना ही संसद के बाहर देश की किसी भी समस्या के निदान के लिए कभी कोई कदम उठाता हो,या जुबान खोलता हो |
     सचिन ने क्रिकेट को धर्म बनाया और लोगों ने सचिन को उस धर्म का देवता बना दिया | पर क्या हमारे देश में धर्म,धर्म गुरुओं और धर्म के नाम पर किए जा रहे तमाम तरह के पाखंडों की कमी थी जो एक और धर्म आ गया | दरअसल देश को जरुरत है कर्म की और ऐसे कर्मठ योगियों की जो अपने कर्म से देश समाज में सार्थक बदलाव के वाहक बन सकें | अफ़सोस भारत रत्न सचिन सिर्फ अपने कर्म में केंद्रित हो गए |
     पुनश्चः सचिन की बायोपिक कल रिलीज़ हुई है,और जैसी की उम्मीद थी महाराष्ट्र सरकार ने इसे टैक्स फ्री कर दिया है | उम्मीद की जानी चाहिए कि सचिन इस फिल्म की कमाई का एक हिस्सा महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित क्षेत्रों में खर्च करेंगे | कालांतर में देश,सचिन को इस बात के लिए याद नहीं रखेगा कि इस देवता ने अपने लिए क्या किया | अगर सचिन को सही मायनों में रत्न बनना है तो अब भी समय है,शुरुआत कीजिये चमक बिखेरिये |
                                          

Saturday, 21 January 2017

कांग्रेस के पतन के निशान ढूंढना मुश्किल नहीं बेहद आसान है

जरा कांग्रेस की दशा और दुर्दशा देखिये | अखिलेश ने पहले कांग्रेस को 140 सीटें देने का वादा किया था | इससे Relax होकर पप्पू विदेश चले गए वैसे देश में रहकर भी क्या उखाड़ लेते | फिर जैसे ही अखिलेश को संपूर्ण साइकिल मिली वो 120 सीटों पर आ गए,पप्पू बोले Its Ok. अब अखिलेश 100 सीटों पर भी आनाकानी कर रहे | कांग्रेस शायद 80 पर भी मान जाएगी लेकिन नेताजी से राजनीतिक साइकिल छीनकर और सपा के अधिकांश नेताओं का समर्थन पाकर अनुभवी,मजबूत अखिलेश शायद यह समझ चुके हैं कि कांग्रेस को स्वादिष्ट खाना तो चाहिए लेकिन उसके पास एक अदद चूल्हा तक नहीं है | कुछ बर्तन हैं जो इधर उधर बिखरे पड़े हैं,कुछ बिना पेंदी के भी लोटे हैं तो खाने का सारा भार अखिलेश अपने कंधों पर क्यों उठाने लगे |
                                                                 पप्पू के पार्टी की समस्या ये है कि उसके पास अकेले चुनाव लड़ने के लिए 403 क्या 200 उम्मीदवार भी ढंग के नहीं हैं | क्योंकि 2014 से ही कांग्रेसी अपने पप्पू के सहारे सारी ऊर्जा मोदी जी की खामियां निकालने में लगा रहे | 127 साल पुरानी पार्टी उस पप्पू के सहारे भवसागर पार करने में लगी है जिसे तैरना ही नहीं आता | वो कभी-कभी तैरने की कोशिश करता भी है तो किनारे-किनारे और बेचारा थककर विदेश चला जाता है अपनी थकान मिटाने |
                                                                 हर चुनाव की तरह 10 जनपथ के चाटुकारों ने इस बार भी शालीन शीला और नाम के बब्बर राज बब्बर को बलि के बकरे के रूप में ढूंढ लिया है | मदाम को हमेशा सच से दूर रखते हुए पार्टी के पतन में सहायक बन रहे ये वो कांग्रेसी हैं,जिन्हें पप्पू में कांग्रेस का भविष्य नजर आता है | शायद इनकी भी मज़बूरी होगी क्योंकि जिन चाटुकारों के पास ना तो अपना आधार है और ना जनाधार उन्हें इंदिरा के पोते में ही अपना आधार नजर आएगा ना | सच बोलेंगे तो तुरंत 10 जनपथ इनके स्वतंत्र पथ को अग्निपथ बना देंगे | सब शरद पवार और ममता बनर्जी की तरह दूरदृष्टि और अपने आधार वाले थोड़े ना होते हैं |
                                                                    दरअसल अब कांग्रेस यह मान चुकी है कि वो अकेले दम पर कहीं भी चुनाव नहीं जीत सकती और दूसरे उसका ध्यान खुद जीतने से ज्यादा भाजपा और मोदी जी को हराने में लगा है तो ऐसे में परिणाम भी उसी तरह आएँगे ना | UP चुनाव परिणाम में ना तो पंजे के हाथ कुछ आने वाला है और ना ही कुछ दांव पर लगा है | 127 वर्षीय कांग्रेस के पतन के निशान ढूंढना मुश्किल नहीं बेहद आसान है | पतन के यही सब तो निशान हैं |हे कांग्रेसियों ढूंढो

Friday, 20 January 2017

सलमान,संजय दत्त,अदालत और आम इंसान

जिनके पास सबूत नहीं होते क्या वो बेकसूर नहीं होते जज साहब ? यह हिंदी सिनेमा का महज एक डायलॉग है लेकिन इसके पीछे एक बेबस,लाचार आम आदमी की हमारी न्यायिक व्यवस्था से गुहार और उसकी चीत्कार भी है | बहरहाल 18 साल तक एक मुकदमा चला,सैकड़ों गवाह पेश हुए,तारीख दर तारीख कार्यवाही चलती रही और इस मुकदमें का फैसला जज साहब ने 7 मिनट में सुनाकर सलमान को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया | तो क्या कोई यह उम्मीद पाले बैठा था कि सुल्तान,माई लार्ड की नजरों में दोषी ठहराए जाएंगे और अदालत से सीधे जेल जाएंगे ? और उन काले हिरणों की आत्मा को शांति मिलेगी | यह ना तो होना था और न हुआ | हमारे देश में कोई अदालती आदेश पर टिप्पणी नहीं करता क्योंकि ऐसा करने से न्याय की देवी रुष्ट हो जाती हैं और फिर टिप्पणी करने वाले पर अवमानना नामक कानून का कहर टूटता है |(मैं भी यहाँ किसी अदालती आदेश पर टिका टिप्पणी नहीं कर रहा और ना मेरा इरादा इसकी अवमानना करने का है | ) लेकिन ऐसा ना होने का अंतहीन सिलसिला कबतक चलता रहेगा ? जिनपर सबूत जुटाने की जिम्मेदारी थी वो तक़रीबन दो दशक तक क्या करते रहे ?
            चलिए यहाँ तो बात एक जानवर की थी जो गलती से एक नादान इंसान के हाथों मारा गया | फर्ज कीजिये अगर उन काले हिरणों की जगह कोई इंसान भी होता तो भी क्या अदालती फैसला यही आता | बिलकुल यही आता | हां फैसले के बदलने की गुंजाइश तब होती जब पीड़ित भी दबंग की तरह एक टाईगर होता |
                                                क्या हमारी न्यायिक व्यवस्था यह मानती है कि बड़े लोग निहायत ही मासूम होते हैं | अगर ऐसा नहीं है तो फिर क्यों इन बड़े लोगों से जो पैदा तो इसी मिटटी में होते हैं लेकिन यहाँ के नियम कायदे कानून से बिलकुल अंजान | कभी उनके हाथ से बंदूक अपने आप चल जाती है,कभी उनके पास गलती से कोई AK47 रख देता है | तो कभी उनकी कार की नीचे गरीब गुरबे खुद आकर मुक्ति पाने की कोशिश करने लगते हैं और फिर बेवजह उन बड़े लोगों को अपना बहुमूल्य वक्त जिसका मूल्य अक्सर इंसानी जान से ज्यादा होता है,सर्दी गर्मी बरसात में न्याय के कटघरे में खड़े होकर जाया करना पड़ता है | और ऐसा तमाशा हम सलमान के हिट एंड रन केस में देख भी चुके हैं जिसमें सलमान को पांच मिनट में बेल मिल गई,ये अलग बात है कि इस पांच मिनट की कीमत करोड़ों में थी,जिसको देने की औकात सलमान जैसे लोगों में ही हो सकती है | (इसमें गलती राज्य सरकार की भी थी जो अपना पक्ष मजबूती से नहीं रख पाई )
                                                   बहरहाल यह बहस,चिंतन और विमर्श का विषय हो सकता है कि हमारी न्यायिक व्यवस्था में अगर,वकील जेठमलानी,कपिल सिब्बल,हरीश साल्वे जैसे बेहद मासूम और भोले भाले मुवक्किल को पैसों के बल पर तथ्यों को तोड़ मरोड़कर अपने सलाखों से बचा ले जाने वाले होते हैं तो फिर इस व्यवस्था में वैसे जज क्यों नहीं हैं (इसे न्यायाधीशों की अवमानना ना समझा जाए ) जो इस तोड़ का काट निकाल कर दोषियों को वहां पहुंचाएं जहाँ उनकी जगह है |वरना ऐसे लोग फैसले आने के बाद बेशर्मी से मीडिया के सामने यह मुस्कुराते हुए कहते हैं कि मुझे न्यायपालिका पर विश्वास था और वो सही साबित हुआ |
                                                   दरअसल ऐसे लोगों का विश्वास न्यायपालिका पर नहीं वरन उसमें उनकी निहित हजारों खामियों में होता है,और दुर्भाग्यवश ऐसी खामियां सिर्फ बड़े लोगों के बड़े वकीलों को दिखती हैं | ये मासूम बड़े लोग बड़े गंभीर अपराधों को अंजाम देकर समाज में सर ऊँचा कर इज्जत की जिंदगी जीते हैं |
                                                                 ज्यादा अरसा नहीं हुआ जब वर्तमान मुख्य न्यायाधीश के पूर्ववर्ती टी एस ठाकुर कई मर्तबे रुंधे गले से मोदी जी से ये गुहार लगा रहे थे कि जजों की नियुक्ति पर कार्यपालिका कुंडली मारकर बैठी है | वो अमेरिका के जजों के बारे में बता रहे थे कि वहाँ एक जज साल में केवल 80 से 90 मुकदमों की सुनवाई करता है जबकि भारत में औसतन यह संख्या 2500 से 3000 के बीच होती है | और प्रत्येक जज भारी तनाव और दबाव में काम करता है | लेकिन क्या माई लार्ड से मैं यह जानने की जुर्रत कर सकता हूँ कि अगर अमेरिका वाली आदर्श स्थिति यहाँ भी हो जाए तो ऐसे फैसलों पर क्या और कितना असर पड़ेगा | संजय दत्त का नायाब उदाहरण भी देश के सामने हैं,इसी देश में जहाँ छोटे,गरीब गुरबे छोटे-मोटे अपराध में नियत समय से ज्यादा भी जेल में रहने को मजबूर होते हैं वहीँ संजय दत्त ऐसे गंभीर अपराध में बार-बार जन्म दिन से लेकर बीमारी के बहाने पैरोल पर रिहा होकर उस समाज को ठेंगा दिखाते हैं जिनके लिए ऐसा सोच पाना भी अपराध है |
                           सलमान का फैसला देर से आया सलमान के लिए दुरुस्त आया,वकीलों ने करोड़ों कमाए मीडिया ने टीआरपी बटोरी,लेकिन इस फैसले से क्या न्यायपालिका की  साख पर आंच नहीं आई ?  माई लार्ड दिन को रात और सर्दी को बरसात बताकर आखिर कब तक न्याय की देवी के आँखों पर बंधी पट्टी का बड़े लोगों द्वारा फायदा उठाया जाएगा | और आखिर कब तक गरीब,मजबूर,कमजोर ही न्याय के लिए मंदिर का घंटा बजाते रहेंगे और प्रसाद अमूमन,अमीर,मजबूत पाते रहेंगे ?
नोट - (इस लेख का उद्देश्य किसी भी अदालती फैसले से असहमति जताना या न्यायालय की अवमानना करना नहीं है | मैं केवल इतना चाहता हूँ इन फैसलों पर एक गंभीर और सार्थक बहस हो ताकि एक आम आदमी भी न्याय की देवी के कटघरे में उतना ही महफूज महसूस करे जितना एक अमीर आदमी करता है )
                              

Sunday, 8 January 2017

ओमपुरी,एक शानदार प्रतिभा,जिनकी हमने कद्र नहीं की

एक शानदार कलाकार जब ताउम्र अपने अंदर की प्रतिभा को दिखाने के लिए मौके का इंतजार करते-करते चिर निद्रा में लीन हो जाए तो इस विडंबना को कला के कद्रदानों पर करारा तमाचा कहा जाना चाहिए | ओम पुरी उन्हीं बदनसीब जहीन कलाकारों में से एक थे जिसकी क़द्र बॉलीवुड ने नहीं की | वजह क्योंकि वो परदे पर केवल अपने किरदार को जीना जानते थे | मायानगरी में उन्हें हमेशा दोयम दर्जे और छोटे-मोटे काम शायद इसलिए मिलते रहे क्योंकि उन्हें ना तो शाहरुख की तरह ओवरएक्टिंग आती थी ना वो सलमान की तरह शरीर दिखा सकते थे | और उससे भी बड़ी वजह उनपर एकाध को छोड़कर,मायानगरी के दिग्गज निर्देशकों ने भरोसा नहीं जताया | ऐसा नहीं है कि उन्हें फिल्में नहीं मिलती थी,उन्हें बहुत सारी व्यवसायिक फिल्मों में काम मिला लेकिन फिल्मों की पटकथा उनकी प्रतिभा को देखकर शायद ही कभी लिखी गई | शायद वो स्विट्ज़रलैंड की हसीन वादियों में कैमरे को शूट नहीं करते थे | लेकिन खुदा ने उन्हें जो सूरत  बक्शी थी इसमें उनकी क्या गलती थी |
ओमपुरी साहब शायद भूल गए थे कि मायानगरी में गोरी चमड़ी और कमनीय काया की माया ही चलती है या फिर आपका कोई गॉडफादर हो | जरा सोचिये अगर डेनजेल वाशिंगटन,मॉर्गन फ्रीमैन जैसे महान कलाकार बॉलीवुड में अपने लिए संभावनाएं तलाशते तो आज वो किस गुमनामी या संघर्ष में जी रहे होते |
                                                                   गलती शायद ओम पुरी की भी थी क्योंकि जब ओम शांति ओम,रा वन,हैप्पी न्यू ईयर,बॉडीगार्ड,रेडी जैसी वाहियात फिल्में 100 करोड़ी क्लब में शामिल होनी शुरू हो गई तभी उन्हें समझ जाना चाहिए था कि हम कला नहीं किसी और चीज का सम्मान करते हैं | कुछ समय पहले ही ओम पूरी साहब ने कहा था कि अगर मुझे कुछ दिनों और बॉलीवुड में काम ना मिला तो मुझे रिटायर होना पड़ेगा,यह उनका आक्रोश नहीं उनकी बेबस बयानी थी |  संघर्ष करते-करते उनकी आस्था डगमगा गई थी | वरना ओमपुरी जैसे कलाकार को मलिका शेरावत के साथ डर्टी पॉलिटिक्स करनी पड़े,यह तो हद की पराकाष्ठा थी | 
                                                                          ओमपुरी साहब यह संदेश छोड़कर गए कि मायानगरी में अगर आप सिर्फ शानदार अभिनय के दम पर अपना मुकाम बनाना चाहते हैं तो ताउम्र ऐसे ही संघर्ष करते रहेंगे | एक्टिंग के लिए आपके अंदर वो सारी प्रतिभाएं होनी चाहिए जिसका एक्टिंग से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है | और जिनके अंदर ये सारी प्रतिभाएं हैं वो आज सुपरस्टार बने इतरा रहे हैं |