Tuesday, 16 June 2020

ब्रेकिंग न्यूज़ दिखाने की होड़ में,बेशर्म होती पत्रकारिता

बात 2006 की है,प्रमोद महाजन के भाई ने उन्हें गोली मार दी थी और वो अस्पताल में भर्ती थे | मुझे जहाँ तक याद है,एक चैनल के एंकर ने अस्पताल के बाहर खड़े रिपोर्टर से पूछा था कि प्रमोद महाजन को कितने पर्सेंट Injury है ? रिपोर्टर को जवाब देते नहीं बन रहा था कि वो सामान्य ज्ञान को सार्वजनिक अवकाश पर भेजकर ऐंकरिंग करने वाली एंकर को क्या जवाब दे क्योंकि गोली लगने में इंजुरी तो नहीं होती है |
                                                      खैर वो 2006 का दौर था और ये 2020 है | देश मनमोहन से मोदी के दौर में आ चुका है | इस अंतराल में हमारा मीडिया कितना बदला है ? क्या वो परिपक़्व हो गया ? क्या वो इंजुरी और गोली लगने के फर्क को समझने लगा है ? इसकी बानगी गाहे बगाहे चैनल वाले खुद ही देते रहते हैं |
                                                               युवा प्रतिभाशाली अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत पर एक चैनल की एंकर फंदे का रंग बता रही थी और नीचे टिकर चल रहा था पटना का लड़का मुंबई में कैसे हुआ हिट विकेट | ऐसे कैसे हिट विकेट हो गए सुशांत ? चैनल और उसके पत्रकार ऐसी बेशर्मियों की नुमाइश करते रहते हैं | संवेदना,शर्म हया को धता बताते हुए जब सब कुछ टीआरपी से मूल्यांकित होने लगे तो ऐसे दौर में पत्रकार और पत्रकारिता से किसी ऊँचे मानदंडों की उम्मीद करना बेमानी है | पेड न्यूज़,पीत पत्रकारिता आदि के आरोपों के बावजूद प्रिंट मीडिया अभी इस तरह की बेशर्म और अंधी दौड़ से कमोबेश मुक्त हैं | पर चैनल टीआरपी की इस अंधी दौड़ में इतना गिर चुके हैं कि जहाँ से आगे सिर्फ मुर्दे के मुँह में माइक लगाकर ये पूछना बाकी रह गया है कि बताइये मरते वक्त आपको कैसा लगा ?



                                            हमारा विशाल लोकतांत्रिक मुल्क,मूल्य वाक् स्वतंत्रता को ज्यादा तवज्जो देता है शायद इसलिए इनलोगों पर कोई करवाई नहीं होती |  पश्चिमी देशों में पत्रकारों,चैनलों की ऐसी शर्मनाक रिपोर्टिंग पर तुरंत कारवाई होती है | पर हमारे यहाँ बहुत सी ढपोरशंखी संस्थाओं की तरह न्यूज़ चैनलों की भी एक स्व नियमन संस्था है News Broadcasters Association, जो साल में एक बार कुम्भकर्णी नींद से जागकर एक आध चैनल को नोटिस भेज देता है बस |
                          टीआरपी के लिए घुटने भर पानी में जाकर बाईट लेने वाले,चुल्लू भर पानी में डूबकर मर जाने वाले ऐसे चैनल और पत्रकारों को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहना हमारे गौरवशाली लोकतंत्र का अपमान ही है |
                                         हमारे यहाँ के चैनल नारद मुनि की तरह दुनिया भर के दुःख दर्द को अपने अधकचरे ज्ञान में लपेट कर चटकारे लगाते हुए दिखाकर खुद को पत्रकारिता की अग्नि में अपने मूल्यों और ईमानदारी की आहुति देने का स्वांग रचते हैं,लेकिन इनके अपने संस्थानों में जो कर्म,कुकर्म काण्ड होते हैं उनपर ये आँख मूंद लेते हैं | कोरोना काल में सैकड़ों पत्रकारों को नौकरी से निकाल दिया गया पर क्या मजाल कि इसपर किसी चैनल ने दंगल किया हो देश की सबसे बड़ी बहस में इस मुद्दे को जगह दी हो या फिर विरोध में टेलीविज़न स्क्रीन काला किया हो | दरअसल ऐसा करने पर इनके निर्लज्ज माई बाप इन्हें तुरंत अलविदा कह देंगे दूसरे पत्रकारिता के इस हम्माम में सभी नंगे हैं |
          सोशल मीडिया पर ये भले आपस में लड़ें,झगड़ें एक दूसरे को आइना दिखाएं पर जब बात चैनल की और ऐसे मुद्दों की आती है तो सब चुप हो जाते हैं क्योंकि सबको पता है कि वो वैचारिक रूप से निर्वस्त्र हैं | दूसरे किसी संस्थानों में कर्मचारियों पर हुए अन्याय,महिला उत्पीड़न पर ये उनके तब तक सबसे बड़े रहनुमा बनकर खबर चलाते दिखाते हैं जब तक कि उससे बड़ी कोई खबर इन्हें न मिल जाए |
                                                           पुराने ज़माने में नवाब मुर्गे की लड़ाइयां देखा करते थे,लोग ताली बजाते,उनका मनोरंजन होता | आज रोज शाम कुछ चैनलों पर सबसे बड़ी बहस के नाम पर लोगों को लड़ाया जाता है |  एंकर और चैनलों के लिए,संवेदना,संयम,मूल्य,नैतिकता जैसी चीजें कोई मायने नहीं रखती | अब सब कुछ लाइव,एक्सक्लूसिव,ब्रेकिंग,सबसे तेज,सबसे निष्पक्ष, जैसी भौंडी चीजों पर आकर टिक गया है | क्या हिंदी और क्या अंग्रेजी सब एक से हो गए हैं | अब जन सरोकार की पत्रकारिता तो दिवास्वप्न से लगती है | प्रभाष जोशी,मृणाल पांडे,एस पी सिंह,जैसे सच्चे पत्रकार तो अब लालटेन लेकर ढूंढने से भी नहीं मिलेंगे |

                                                             जब देश में टीवी पत्रकारिता नई नई थी चैनल कम थे प्रतिस्पर्धा कम थी | तब ये सांप बिच्छू,तंत्र मंत्र,राखी सावंत,योग,भोग,रोग जैसी ख़बरों को दिखाकर लोगों  मनोरंजन करते थे | इन पर कई बार नकेल कसने की कोशिश भी हुई पर इनका तर्क था कि अभी हम शैशवावस्था में हैं हमें परिपक़्व होने में समय लगेगा,हम अपना नियमन स्वयं करेंगे | पर समय बीतने के साथ नतीजा सिफर रहा |  जल्द ही इन्होंने यह साबित कर दिया कि क्यों टीवी को बुद्धू बक्सा कहा जाता है | असल में इन्होंने खुद को चीयर लीडर (महिला,पुरुष दोनों ) की तरह बना लिया है | जैसे मैच में चौके,छक्के पर चीयर लीडर उछलती,कूदती मनोरंजन करती है और सामान्य मैच में शांत खड़ी | उसी तरह किसी बड़ी खबर के आने पर सारे चैनल टूट पड़ते हैं |
                                                            कोई भी संस्था स्थापित होती है,पुष्पित पल्लवित होती है,परिपक़्व होती है,उसका स्वर्णिम काल होता है | पर हमारे यहाँ समाचार चैनल आए,धीरे धीरे इनकी भीड़ बढ़ी और सबसे तेज दिखने,दिखाने की होड़ में ये खुद के साथ साथ पत्रकारिता को भी विकृत करते चले गए | अब इनकी विश्वसनीयता वहाँ पहुँच चुकी है जहाँ से सब कुछ अंधकारमय दिखता है | शुक्र है इनकी हस्ती,पस्ती लिजलिजे पन को सोशल मीडिया ने थोड़ा आईना दिखाने का काम किया है |
 यह विडंबना ही है इतने बड़े विशाल लोकतंत्र ने आजादी के बाद कुछेक काल खंड को छोड़कर कभी पत्रकारिता का स्वर्णिम युग नहीं देखा | अब जबकि चैनल,पत्रकार,पत्रकारिता के मूल्यों से दूर जा रहे,लोग भी टीवी देखने से कतरा रहे | आगे हो सकता है कोई मसीहा आए जो स्वर्णिम कल दिखाए पर अभी तो,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, 

Saturday, 13 June 2020

फिल्म समीक्षा, गुलाबो सिताबो

उम्मीदों का बोझ बहुत भारी होता है | और जब आपने विकी डोनर,पिंक,पिकू,मद्रास कैफे जैसी उम्दा फिल्में देखी हों तो शुजीत सरकार जैसे मंझे हुए निर्देशक से ऐसी उम्मीदें बेमानी भी नहीं हैं | सोने पर सुहागा ये कि इन उम्मीदों के खेवनहार,महानायक अमिताभ और वर्तमान हिंदी सिनेमा के बेहतरीन अभिनेताओं में से एक आयुष्मान खुराना हों तो लॉक डाउन में उम्मीदें और बढ़ जाती हैं | पर अफ़सोस गुलाबो सिताबो उन उम्मीदों पर खरा नहीं उतरती जिसका लोग बेसब्री से इन्तजार कर रहे थे |
एक बेहद लिच्चड़ मकान मालिक,मिर्जा का किरदार शायद अमिताभ से अच्छा कोई नहीं निभा सकता था | बांके के किरदार के साथ आयुष्मान ने पुरी तरह न्याय किया है | बेगम का किरदार निभाते हुए फ़ारुख़ जफ्फार,जोहरा सहगल की याद दिलाती हैं | हालाँकि जफ्फार ने लगभग ऐसा ही किरदार 2019 में नवाजुद्दीन की रीलीज हुई फिल्म फोटोग्राफर में निभाया था | बृजेन्द्र काला उर्फ़ क्रिस्टोफर और विजय राज उर्फ़ ज्ञानेश भी अपने किरदारों में जमे हैं | पर इन सबके बावजूद समस्या ये है कि फिल्म बहुत धीमी गति से रेंगती है | बिलकुल अभिषेक बच्चन के करियर की तरह ( हालाँकि वो तो अब लगभग समाप्त ही हो चुका है | ) फिल्म का पहला भाग तो खंडहर हवेली के किराएदारों के रोजमर्रा की आम जिंदगी सा नीरस लगता है | बस बीच बीच में मिर्जा अपनी लिच्चड़पन से फिल्म को थोड़ा बचाते हैं |


                 शूजित सरकार की पिछली सारी फिल्में विषय केंद्रित थीं | सशक्त कहानी शुरू से अंत तक आपको बांधे हुए रखती थीं | पर गुलाबी सिताबो ऐसी नहीं है | मकान मालिक और किराएदार के बीच नोकझोंक पर बनी फिल्म में किसी को तब तक कोई दिलचस्पी नहीं हो सकती है जब तक कि उसमें कुछ ऐसा न हो जो दर्शकों को बाँध सके | दूसरी बात यह समझ से परे है कि इस फिल्म का नाम गुलाबो सिताबो क्यों रखा गया ? थोड़े बहुत समकालीन विषयों जैसे,पुरानी इमारतों पर गिद्ध दृष्टि लगाए बिल्डर,सरकारी नौकरी पाने के लिए एक लड़की के किसी भी हद तक जाने के ताने बाने को समेटे शुजीत सरकार चूक जाते हैं | गाने ऐसे हैं जो समझ नहीं आते | पुरी फिल्म में सिर्फ एक सरप्राइज पैकेज को छोड़कर ( जब 95 साल की बेगम,मिर्जा को छोड़कर रातों रात अपने पुराने प्रेमी के पास चली जाती हैं ) के अलावा आगे क्या होने वाला है लगभग पता होता है |

         फिल्म का दूसरा भाग थोड़ा तेजी से चलता है | मिर्जा अपनी बेगम के मरने का इंतजार करते हवेली अपने नाम करवाने के लिए बहुत तिकड़में अपनाते हैं और दूसरी तरफ बांके एक मजबूर लेकिन ढीढ किराएदार की तरह हवेली में जमे रहने के लिए तमाम जद्दोजेहद करते दिखते हैं | अपनी पिछली फिल्मों की तरह शुजीत ने महिला कलाकारों को पूरा मौका दिया है | कुछ दूसरे निर्देशक इनसे सीख सकते हैं कि फिल्म में महिलाऐं सिर्फ बदन दिखाने,आइटम सांग या शो पीस के लिए नहीं होती हैं |
                                            बहरहाल इस फिल्म से निर्माता निर्देशक को कोई फायदा हो न हो लेकिन भाई भतीजावाद से भरे बॉलीवुड में अगर कोई कला का सही पारखी हो तो उसकी नजर गुड्डो का किरदार निभाने वाली सृष्टि श्रीवास्तव पर जरूर पड़ेगी | अमिताभ जैसे दिग्गज अभिनेता के सामने आँखों में आँखे डालकर संवाद करना इस लड़की के सुनहरे भविष्य की तस्वीर पेश करता है |
                             खैर जिस तरह,मिर्जा,अपनी बेगम के मरने का इंतजार करते और बांके,मिर्जा के मरने का इंतजार करते हुए बहुत धैर्य से करीब पौने दो घंटे निकाल देते हैं वैसे ही आपको पूरी फिल्म एक बार में देखने के लिए काफी धैर्य चाहिए | अच्छी बात ये है कि आपके पास धैर्य तोड़ने का विकल्प है क्योंकि आप फिल्म मोबाइल पर देख रहे मल्टीप्लेक्स में नहीं | अगर रेटिंग की बात की जाय तो इसे पांच में से ढाई |
पुनश्चः
फिल्म उस वक्त ओटीटी प्लेटफार्म पर रिलीज़ हुई है जब देश भर में लाखों लोग अपनी नौकरी गंवाने के बाद किराया चुकाने में भी असमर्थ हो गए हैं | सभी किराएदार बांके की तरह ढीढ नहीं होते और न ही सभी मकान मालिक मिर्जा की तरह लिच्चड़ लेकिन मजबूर | और हाँ फौजिया जैसी लड़कियों की कमी नहीं है जो शादी करने के लिए लड़के का दिल नहीं बल्कि पॉकेट देखती हैं |