Sunday, 30 August 2020

सुशांत,मीडिया और टीआरपी का भौंडा खेल

 कितना सच कितना झूठ 

रोज दिखा रहे हैं ये अहम सबूत, 

हर रोज हो रहा नया खुलासा 

टीआरपी के लिए हो रहा सब तमाशा | 

लोकतंत्र का चौथा स्तंभ 

सब कह रहे खुद को नंबर वन 

एक दूसरे पर लगा रहे लांछन | 

सब बन रहे सुशांत के परिवार के हितैषी 

बाकी ख़बरों की ऐसी की तैसी | 

ब्रेकिंग न्यूज़ में बढ़ रहे व्यूज 

देखने वाले हो रहे कंफ्यूज | 

कभी आरोपी को मंच दिया जा रहा 

तो कहीं परिवार की निजता को रौंदा जा रहा | 

सुबह से शाम,हर चैनल पर छाया सुशांत | 

एक कह रहा पूछता है भारत 

दूसरा दंगल चला रिया है 

कहीं देश की सबसे बड़ी बहस के नाम पर 

गंध फैलाया जा रिया है | 

क्या सच में इन्हें हैं न्याय की परवाह ? 

कुछ लोग कह रहे 

रिया ये तुने क्या किया ? 

ये कहते हैं सुशांत को दिलाएंगे न्याय 

चला रखी है इन्होंने मुहिम 

कहानी में हर रोज आता नया ट्विस्ट 

बातचीत की रोज निकल रही नई लिस्ट | 

चाहते हैं सब कि सुशांत को मिले न्याय 

पर क्या मीडिया नहीं कर रहा अन्याय ? 

बाढ़ से लाखों की आबादी है परेशान 

जान माल का हो रहा नुक्सान 

पर इनकी तो टीआरपी में बसती है जान | 

आज गर आ जाए इससे बड़ी कोई ख़बर 

ये रातों रात हो जाएंगे इस ख़बर से बेख़बर | 

सुशांत को न्याय दिलाने की इनकी तथाकथित मुहिम 

तुरंत पड़ जाएगी मद्धिम | 

खैर वो जब तक जिया 

शान और शांति से जिया | 

क़त्ल किसने किया या उसने आत्महत्या की 

इसे बहस का मुद्दा न बनाओ 

टीवी स्टूडियो में,

बेवजह मजमा न लगवाओ | 


गर दिलाना है उसे न्याय 

तो बंद करो ये न्याय के नाम पर टीआरपी का भौंडा तमाशा 

कंगना,चूड़ी न खनकाओ 

मीडिया ट्रायल न करवाओ 

तभी बंधेगी न्याय की आशा !!!! 


Tuesday, 16 June 2020

ब्रेकिंग न्यूज़ दिखाने की होड़ में,बेशर्म होती पत्रकारिता

बात 2006 की है,प्रमोद महाजन के भाई ने उन्हें गोली मार दी थी और वो अस्पताल में भर्ती थे | मुझे जहाँ तक याद है,एक चैनल के एंकर ने अस्पताल के बाहर खड़े रिपोर्टर से पूछा था कि प्रमोद महाजन को कितने पर्सेंट Injury है ? रिपोर्टर को जवाब देते नहीं बन रहा था कि वो सामान्य ज्ञान को सार्वजनिक अवकाश पर भेजकर ऐंकरिंग करने वाली एंकर को क्या जवाब दे क्योंकि गोली लगने में इंजुरी तो नहीं होती है |
                                                      खैर वो 2006 का दौर था और ये 2020 है | देश मनमोहन से मोदी के दौर में आ चुका है | इस अंतराल में हमारा मीडिया कितना बदला है ? क्या वो परिपक़्व हो गया ? क्या वो इंजुरी और गोली लगने के फर्क को समझने लगा है ? इसकी बानगी गाहे बगाहे चैनल वाले खुद ही देते रहते हैं |
                                                               युवा प्रतिभाशाली अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत पर एक चैनल की एंकर फंदे का रंग बता रही थी और नीचे टिकर चल रहा था पटना का लड़का मुंबई में कैसे हुआ हिट विकेट | ऐसे कैसे हिट विकेट हो गए सुशांत ? चैनल और उसके पत्रकार ऐसी बेशर्मियों की नुमाइश करते रहते हैं | संवेदना,शर्म हया को धता बताते हुए जब सब कुछ टीआरपी से मूल्यांकित होने लगे तो ऐसे दौर में पत्रकार और पत्रकारिता से किसी ऊँचे मानदंडों की उम्मीद करना बेमानी है | पेड न्यूज़,पीत पत्रकारिता आदि के आरोपों के बावजूद प्रिंट मीडिया अभी इस तरह की बेशर्म और अंधी दौड़ से कमोबेश मुक्त हैं | पर चैनल टीआरपी की इस अंधी दौड़ में इतना गिर चुके हैं कि जहाँ से आगे सिर्फ मुर्दे के मुँह में माइक लगाकर ये पूछना बाकी रह गया है कि बताइये मरते वक्त आपको कैसा लगा ?



                                            हमारा विशाल लोकतांत्रिक मुल्क,मूल्य वाक् स्वतंत्रता को ज्यादा तवज्जो देता है शायद इसलिए इनलोगों पर कोई करवाई नहीं होती |  पश्चिमी देशों में पत्रकारों,चैनलों की ऐसी शर्मनाक रिपोर्टिंग पर तुरंत कारवाई होती है | पर हमारे यहाँ बहुत सी ढपोरशंखी संस्थाओं की तरह न्यूज़ चैनलों की भी एक स्व नियमन संस्था है News Broadcasters Association, जो साल में एक बार कुम्भकर्णी नींद से जागकर एक आध चैनल को नोटिस भेज देता है बस |
                          टीआरपी के लिए घुटने भर पानी में जाकर बाईट लेने वाले,चुल्लू भर पानी में डूबकर मर जाने वाले ऐसे चैनल और पत्रकारों को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहना हमारे गौरवशाली लोकतंत्र का अपमान ही है |
                                         हमारे यहाँ के चैनल नारद मुनि की तरह दुनिया भर के दुःख दर्द को अपने अधकचरे ज्ञान में लपेट कर चटकारे लगाते हुए दिखाकर खुद को पत्रकारिता की अग्नि में अपने मूल्यों और ईमानदारी की आहुति देने का स्वांग रचते हैं,लेकिन इनके अपने संस्थानों में जो कर्म,कुकर्म काण्ड होते हैं उनपर ये आँख मूंद लेते हैं | कोरोना काल में सैकड़ों पत्रकारों को नौकरी से निकाल दिया गया पर क्या मजाल कि इसपर किसी चैनल ने दंगल किया हो देश की सबसे बड़ी बहस में इस मुद्दे को जगह दी हो या फिर विरोध में टेलीविज़न स्क्रीन काला किया हो | दरअसल ऐसा करने पर इनके निर्लज्ज माई बाप इन्हें तुरंत अलविदा कह देंगे दूसरे पत्रकारिता के इस हम्माम में सभी नंगे हैं |
          सोशल मीडिया पर ये भले आपस में लड़ें,झगड़ें एक दूसरे को आइना दिखाएं पर जब बात चैनल की और ऐसे मुद्दों की आती है तो सब चुप हो जाते हैं क्योंकि सबको पता है कि वो वैचारिक रूप से निर्वस्त्र हैं | दूसरे किसी संस्थानों में कर्मचारियों पर हुए अन्याय,महिला उत्पीड़न पर ये उनके तब तक सबसे बड़े रहनुमा बनकर खबर चलाते दिखाते हैं जब तक कि उससे बड़ी कोई खबर इन्हें न मिल जाए |
                                                           पुराने ज़माने में नवाब मुर्गे की लड़ाइयां देखा करते थे,लोग ताली बजाते,उनका मनोरंजन होता | आज रोज शाम कुछ चैनलों पर सबसे बड़ी बहस के नाम पर लोगों को लड़ाया जाता है |  एंकर और चैनलों के लिए,संवेदना,संयम,मूल्य,नैतिकता जैसी चीजें कोई मायने नहीं रखती | अब सब कुछ लाइव,एक्सक्लूसिव,ब्रेकिंग,सबसे तेज,सबसे निष्पक्ष, जैसी भौंडी चीजों पर आकर टिक गया है | क्या हिंदी और क्या अंग्रेजी सब एक से हो गए हैं | अब जन सरोकार की पत्रकारिता तो दिवास्वप्न से लगती है | प्रभाष जोशी,मृणाल पांडे,एस पी सिंह,जैसे सच्चे पत्रकार तो अब लालटेन लेकर ढूंढने से भी नहीं मिलेंगे |

                                                             जब देश में टीवी पत्रकारिता नई नई थी चैनल कम थे प्रतिस्पर्धा कम थी | तब ये सांप बिच्छू,तंत्र मंत्र,राखी सावंत,योग,भोग,रोग जैसी ख़बरों को दिखाकर लोगों  मनोरंजन करते थे | इन पर कई बार नकेल कसने की कोशिश भी हुई पर इनका तर्क था कि अभी हम शैशवावस्था में हैं हमें परिपक़्व होने में समय लगेगा,हम अपना नियमन स्वयं करेंगे | पर समय बीतने के साथ नतीजा सिफर रहा |  जल्द ही इन्होंने यह साबित कर दिया कि क्यों टीवी को बुद्धू बक्सा कहा जाता है | असल में इन्होंने खुद को चीयर लीडर (महिला,पुरुष दोनों ) की तरह बना लिया है | जैसे मैच में चौके,छक्के पर चीयर लीडर उछलती,कूदती मनोरंजन करती है और सामान्य मैच में शांत खड़ी | उसी तरह किसी बड़ी खबर के आने पर सारे चैनल टूट पड़ते हैं |
                                                            कोई भी संस्था स्थापित होती है,पुष्पित पल्लवित होती है,परिपक़्व होती है,उसका स्वर्णिम काल होता है | पर हमारे यहाँ समाचार चैनल आए,धीरे धीरे इनकी भीड़ बढ़ी और सबसे तेज दिखने,दिखाने की होड़ में ये खुद के साथ साथ पत्रकारिता को भी विकृत करते चले गए | अब इनकी विश्वसनीयता वहाँ पहुँच चुकी है जहाँ से सब कुछ अंधकारमय दिखता है | शुक्र है इनकी हस्ती,पस्ती लिजलिजे पन को सोशल मीडिया ने थोड़ा आईना दिखाने का काम किया है |
 यह विडंबना ही है इतने बड़े विशाल लोकतंत्र ने आजादी के बाद कुछेक काल खंड को छोड़कर कभी पत्रकारिता का स्वर्णिम युग नहीं देखा | अब जबकि चैनल,पत्रकार,पत्रकारिता के मूल्यों से दूर जा रहे,लोग भी टीवी देखने से कतरा रहे | आगे हो सकता है कोई मसीहा आए जो स्वर्णिम कल दिखाए पर अभी तो,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, 

Saturday, 13 June 2020

फिल्म समीक्षा, गुलाबो सिताबो

उम्मीदों का बोझ बहुत भारी होता है | और जब आपने विकी डोनर,पिंक,पिकू,मद्रास कैफे जैसी उम्दा फिल्में देखी हों तो शुजीत सरकार जैसे मंझे हुए निर्देशक से ऐसी उम्मीदें बेमानी भी नहीं हैं | सोने पर सुहागा ये कि इन उम्मीदों के खेवनहार,महानायक अमिताभ और वर्तमान हिंदी सिनेमा के बेहतरीन अभिनेताओं में से एक आयुष्मान खुराना हों तो लॉक डाउन में उम्मीदें और बढ़ जाती हैं | पर अफ़सोस गुलाबो सिताबो उन उम्मीदों पर खरा नहीं उतरती जिसका लोग बेसब्री से इन्तजार कर रहे थे |
एक बेहद लिच्चड़ मकान मालिक,मिर्जा का किरदार शायद अमिताभ से अच्छा कोई नहीं निभा सकता था | बांके के किरदार के साथ आयुष्मान ने पुरी तरह न्याय किया है | बेगम का किरदार निभाते हुए फ़ारुख़ जफ्फार,जोहरा सहगल की याद दिलाती हैं | हालाँकि जफ्फार ने लगभग ऐसा ही किरदार 2019 में नवाजुद्दीन की रीलीज हुई फिल्म फोटोग्राफर में निभाया था | बृजेन्द्र काला उर्फ़ क्रिस्टोफर और विजय राज उर्फ़ ज्ञानेश भी अपने किरदारों में जमे हैं | पर इन सबके बावजूद समस्या ये है कि फिल्म बहुत धीमी गति से रेंगती है | बिलकुल अभिषेक बच्चन के करियर की तरह ( हालाँकि वो तो अब लगभग समाप्त ही हो चुका है | ) फिल्म का पहला भाग तो खंडहर हवेली के किराएदारों के रोजमर्रा की आम जिंदगी सा नीरस लगता है | बस बीच बीच में मिर्जा अपनी लिच्चड़पन से फिल्म को थोड़ा बचाते हैं |


                 शूजित सरकार की पिछली सारी फिल्में विषय केंद्रित थीं | सशक्त कहानी शुरू से अंत तक आपको बांधे हुए रखती थीं | पर गुलाबी सिताबो ऐसी नहीं है | मकान मालिक और किराएदार के बीच नोकझोंक पर बनी फिल्म में किसी को तब तक कोई दिलचस्पी नहीं हो सकती है जब तक कि उसमें कुछ ऐसा न हो जो दर्शकों को बाँध सके | दूसरी बात यह समझ से परे है कि इस फिल्म का नाम गुलाबो सिताबो क्यों रखा गया ? थोड़े बहुत समकालीन विषयों जैसे,पुरानी इमारतों पर गिद्ध दृष्टि लगाए बिल्डर,सरकारी नौकरी पाने के लिए एक लड़की के किसी भी हद तक जाने के ताने बाने को समेटे शुजीत सरकार चूक जाते हैं | गाने ऐसे हैं जो समझ नहीं आते | पुरी फिल्म में सिर्फ एक सरप्राइज पैकेज को छोड़कर ( जब 95 साल की बेगम,मिर्जा को छोड़कर रातों रात अपने पुराने प्रेमी के पास चली जाती हैं ) के अलावा आगे क्या होने वाला है लगभग पता होता है |

         फिल्म का दूसरा भाग थोड़ा तेजी से चलता है | मिर्जा अपनी बेगम के मरने का इंतजार करते हवेली अपने नाम करवाने के लिए बहुत तिकड़में अपनाते हैं और दूसरी तरफ बांके एक मजबूर लेकिन ढीढ किराएदार की तरह हवेली में जमे रहने के लिए तमाम जद्दोजेहद करते दिखते हैं | अपनी पिछली फिल्मों की तरह शुजीत ने महिला कलाकारों को पूरा मौका दिया है | कुछ दूसरे निर्देशक इनसे सीख सकते हैं कि फिल्म में महिलाऐं सिर्फ बदन दिखाने,आइटम सांग या शो पीस के लिए नहीं होती हैं |
                                            बहरहाल इस फिल्म से निर्माता निर्देशक को कोई फायदा हो न हो लेकिन भाई भतीजावाद से भरे बॉलीवुड में अगर कोई कला का सही पारखी हो तो उसकी नजर गुड्डो का किरदार निभाने वाली सृष्टि श्रीवास्तव पर जरूर पड़ेगी | अमिताभ जैसे दिग्गज अभिनेता के सामने आँखों में आँखे डालकर संवाद करना इस लड़की के सुनहरे भविष्य की तस्वीर पेश करता है |
                             खैर जिस तरह,मिर्जा,अपनी बेगम के मरने का इंतजार करते और बांके,मिर्जा के मरने का इंतजार करते हुए बहुत धैर्य से करीब पौने दो घंटे निकाल देते हैं वैसे ही आपको पूरी फिल्म एक बार में देखने के लिए काफी धैर्य चाहिए | अच्छी बात ये है कि आपके पास धैर्य तोड़ने का विकल्प है क्योंकि आप फिल्म मोबाइल पर देख रहे मल्टीप्लेक्स में नहीं | अगर रेटिंग की बात की जाय तो इसे पांच में से ढाई |
पुनश्चः
फिल्म उस वक्त ओटीटी प्लेटफार्म पर रिलीज़ हुई है जब देश भर में लाखों लोग अपनी नौकरी गंवाने के बाद किराया चुकाने में भी असमर्थ हो गए हैं | सभी किराएदार बांके की तरह ढीढ नहीं होते और न ही सभी मकान मालिक मिर्जा की तरह लिच्चड़ लेकिन मजबूर | और हाँ फौजिया जैसी लड़कियों की कमी नहीं है जो शादी करने के लिए लड़के का दिल नहीं बल्कि पॉकेट देखती हैं | 

Sunday, 17 May 2020

मजदूर

रोटी तुम्हें गांव से शहर की ओर ले गई थी
अब वही तुम्हें
शहरों से गांव की ओर खींच रही है
मुल्क के लिए अभी यह मुद्दा है
लाख टके का सवाल है
हर तरफ मचा बवाल है |
सेंक रहे सब तुम्हारी रोटी पर अपनी अपनी रोटी
सुना रहे एक दूसरे को खरी खोटी
सुबह शाम करते तुम्हारी चिंता
एक दूसरे की करते निंदा |
तुम्हारे पांव में पड़ते छाले
पटरी पर हैं पड़े निवाले
मीडिया के तुम राज दुलारे |
आसमान के नीचे रहकर


न जाने कितनों के लिए बनाए तुमने आशियाने
मुसीबत की इस घड़ी में कोई नहीं दे रहा तुम्हें सर छुपाने
पर होता गर अभी चुनाव
बिछाए जाते तुम्हारे लिए पलक पांवड़े
नहीं करनी पड़ती तुम्हें टिकटों के लिए मारामारी
सब आते तुम्हें रिझाने
क्यों गए थे बाहर कमाने
अब नहीं होगा पलायन
गर सरकार में आ गए हम
बात तुम्हारे वोटों की होती
तुम्हें लोकतंत्र का फरिश्ता बताया जाता
पर तुम्हारी बदकिस्मती
अभी कहीं नहीं हो रहे चुनाव
अभी बात वोट की नहीं
तुम्हारे पेट की है
वोट तो उनका होता
पर पेट तो तुम्हारा है
भगवान भरोसे आए थे
भगवान का ही सहारा है |

Monday, 20 April 2020

कुछ नहीं रवीश भाई,बस पालघर में दो तीन साधुओं की लिंचिंग हुई

अनुराग की चरस लॉक डाउन 1 में ही ख़त्म हो गई थी | कुछ दिन तक दारु के स्टॉक से काम चला फिर वो भी खत्म | आजकल गार्ड से बीड़ी,खैनी मांगकर काम चला रहा | रात को ठीक से सो नहीं पा रहा,नींद नहीं आती,आती भी है तो सपने में बॉम्बे वेलवेट,रमण राघव के डरावने सीन दिखते हैं और वो उठ जाता है | दिन में सोने की कोशिश कर रहा था | अभी हल्की सी झपकी आई ही थी कि मोबाइल बजा,अरे रविश भाई कैसे हैं ? बस ठीक हूँ अनुराग,वही संविधान,लोकतंत्र,धर्मनिरपेक्षता बचाने में दिन रात लगा हूँ | नहीं-नहीं रवीश भाई आप शानदार काम कर रहे हैं | अच्छा अनुराग ये रात पालघर में कुछ हुआ था क्या ? पालघर ? भाई वैसे ज्यादा तो मुझे कुछ पता नहीं बस उड़ती खबर सुनी थी कि दो,तीन साधुओं की लिंचिंग हुई है | अच्छा,अच्छा,अरे मुझे लगा कुछ बड़ा हुआ है | नहीं भाई बड़ा क्या होगा अभी,सब शांति ही है,मेरा तो दोनों तरफ का मसाला ख़तम हो गया है | ह्म्म्मम्म,वैसे रवीश भाई आप तो इतने बड़े पत्रकार हैं आपके पास कोई खबर नहीं पहुँची ? अरे कहाँ अनुराग तुम तो जानते हो कि हमारे चैनल के उपर देश बचाने की कितनी बड़ी जिम्मेदारी है,हमलोग आजकल सिंगल सोर्स को बचाने में जी जान से जुटे हैं,इसलिए ऐसे छोटी ख़बरें हमारे सोर्स की नजरों में आते भी नहीं और वो बताते भी नहीं | ये अलग बात है कि देश बचाते बचाते हम रसातल में जा रहे | और वैसे तुम तो जानते हो 2014 में ही मुझे मेजर हर्ट अटैक आया था | उसमें मैं तो बच तो गया लेकिन मेरी दाहिने तरफ की यादाश्त कमजोर हो गई,हाँ लेफ्ट वाला अभी एकदम ठीक है | यूँ कहो कि अभी लेफ्ट 2014 के अटैक के बाद कुछ ज्यादा ही सक्रिय रहता है | ओहहह |अच्छार रविश भाई,कन्हैया की कॉल आ रही है,अच्छा ठीक है तुम बात करलो |


      कन्हैया कैसे हो ? बस भाई सब खैरियत है अल्लाह रहम रखे,अच्छा अनुराग भाई मेरे पास शेहला का फ़ोन आया था वो पूछ रही थी पालघर में कुछ ऐसा तो नहीं हुआ जिससे देश संकट में आ गया हो ? अरे नहीं पगले छोटी मोटी घटनाएं तो होती रहती हैं,हाँ अनुराग भाई इतना बड़ा मुल्क है कितनी खोज खबर ली जाय | बस अपना संविधान,लोकतंत्र सुरक्षित रहे | वो आरफा कह रही थी कल ट्विटर पे कि कैसा चल रहा है आपका लॉक डाउन,मैंने कहा बहन बस मुंबई में उद्धव जी सब शानदार तरीके से कंट्रोल कर रहे कोई दिक्कत नहीं है | अनुराग भाई इ स्वरा का फ़ोन आ रहा है,उ बेगूसराय में मनुवादी लोग एगो नीची जाति वाले को प्रेम प्रसंग में मार दिया न शायद इसी के बारे में पूछ रही होगी | अच्छा ठीक है कन्हैया अभी हम मोदी को ट्विटर पे इस घटना के लिए लताड़ते हैं,इतनी बड़ी बात हो गई और इ लोग कुछ बोले नहीं |
                                        कन्हैया मैं दो तीन दिन से बेगूसराय वाली घटना की वजह से सो नहीं पाई,क्या हो रहा है इस देश में | मैं सोच रही थी तुमसे बात करूँ लेकिन जबसे लॉक डाउन शुरू हुआ है मेरी वर्चुअल पार्टियां ख़तम ही नहीं हो रहीं | नहीं हम इ मुद्दा ट्विटर पे उठाए थे स्वरा,इसको अंजाम तक पहुंचा के रहेंगे |
जैसे जैसे रात गहरी हो रही सब अपने वैचारिक पालने में आराम फरमाने को जा रहे | देश सुरक्षित है,साधु संत मरते रहेंगे,ऐसी कौन से आफत आ गई | बहुत सी ख़बरें हैं इस देश में दिखाने को |
                                     पुनश्चः -- रवीश भाई आरफा बोल रही हूँ,हाँ आरफा अस्सलाम वालेकुम,वालेकुम अस्सलाम रविश भाई.अल्लाह ताला आपको,दीन,ईमान की खिदमत के लिए भारत रत्न से नवाजे | शुक्रिया आरफा | अच्छा रविश भाई आपने मौलाना साद को डिफेंड करने का पुरा प्लान तैयार कर लिया है न ? हाँ आरफा,मैं तो उसी दिन से इस काम पे लगा हूँ जिस दिन निजामुद्दीन वाली घटना सामने आई | वाह बहुत बढ़िया रवीश भाई | इधर आरफा तेजस्वी सूर्या के बहाने मोदी सरकार पर हमला बोलने गई उधर रवीश काली चादर तान कर सोने की तैयारी में लग गया,टीवी स्क्रीन किसी और बात पर काली होगी अभी तो सब शांति शांति है | 

Thursday, 9 April 2020

कुत्ते और इंसान

यूँ वह घर के बाहर मंडराता
पहरेदारी करता
वफादारी का प्रतीक
पर उसका इंसानों को छू जाना अपवित्र समझा जाता था
सीमाएं तय थीं उसके लिए
दरवाजे के बाहर
फिर
उसके गले में पट्टा लगा
वो मुख्य द्वार के अंदर आया
बहुत समय तक यूँ ही चलता रहा
न उसके लिए इंसान ने सीमाएं बदली 
न अपना मन 

समय का पहिया घूमा
इंसान इंसान से ऊबने लगा
एक दूसरे से कटने लगा
भरोसा कम होने लगा
फिर उसके दिन फिरे
उसके अच्छे अच्छे नाम रखे जाने लगे
उसे उसकी जाति से सम्बोधित करना असभ्य माना जाने लगा 
उसके लिए सीमाएं तोड़ी जाने लगीं
मुख्य द्वार से डाइनिंग हॉल ,
बड़े घरों का आउट हाउस भी उसके लिए कम्फ़र्टेबल नहीं रहा
क्योंकि उसका स्टेटस अब इसकी इजाजत नहीं देता
अब वो बेड रूम में आ गया
कुछ जगहों पर घरों में इंसान एक और वो दो रहने लगे
हां उसकी रखवाली के लिए शिफ्टों में चार लोग रखे जाने लगे
देखिये समय का चक्र
अब इंसान उसकी रखवाली करने लगे
पॉश इलाकों में तो जगह जगह उसके लिए क्लिनिक और डॉक्टर नजर आने लगे
अब मर्सीडीज़ में मालकिन की गोद में बैठकर शहर घूमता 
अपने स्टेटस पर गर्व करता
इंसानों को हिकारत भरी नजरों से देखने लगा
यह परिवर्तन समझना कठिन है कि
क्या मनुष्य सभ्य होकर,कुत्तों की ज्यादा क़द्र करने लगा या
एप्पल मेन,मैंगो पीपल को जानवरों से भी बदतर समझने लगा ? 

Sunday, 29 March 2020

घरों में रहो न बस 21 दिनों की तो बात है

जिंदगियां खास हैं
अवाम को ये अहसास है,
कोरोना का खतरा मंडरा रहा सबके आसपास है,
घरों में रहो न
बस 21 दिनों की तो बात है |
करो वो काम
जो समयाभाव में पेंडिंग पड़े थे
खोलो किताबों की अलमारियां
झाड़ो धूल 
बिताओ कुछ वक्त अपनों के साथ
जो बहुत खास हैं
घरों में रहो न
बस 21 दिनों की तो बात है |


ये मत सोचो कि तुम कैद हो चारदीवारी में
सोचो कि तुम महफूज हो
कोरोना की पहुँच से दूर हो
जरा देखो
अमेरिका,इंग्लैंड,इटली,स्पेन
जैसे धनाढ्य मुल्कों के हालात
इसलिए
घरों में रहो न
बस 21 दिनों की तो है बात |
अगर यही सोचकर
तुम निकलोगे सड़कों पर
तोड़ोगे लॉक डाउन की बेड़ियाँ
कि मुझे कुछ नहीं होगा
तो बिगड़ेंगे बहुत हालात
गर कोरोना से बाहर हो गई मुलाकात
तो सोचो कितनों की जान पर बन आएगी बात
घरों में रहो न
बस 21 दिनों की तो है ये बात  |
क्यूँ मचल रहे हो इतना घर से निकलने को ?
याद है तुम्हें
इसी फेसबुक,ट्विटर,व्हाट्सअप,इंस्टा
की वजह से पति पत्नियों के बीच होते थे झगड़े
सुनने पड़ते थे ताने
बॉस के सामने तुम बनाते थे बहाने
तब समय नहीं था तुम्हारे पास
अब ये सब पास है
घरों में रहो न
बस 21 दिनों की तो बात है |
समय ले रहा तुम्हारे धैर्य की प्रतीक्षा
किसी को चौबीसों घंटे नहीं होती है
घर पर रहने की इच्छा
पर समझो इस महामारी की गंभीरता
जो अमीर,गरीब किसी को नहीं छोड़ता
दिखाओ थोड़ा संयम
घर से बाहर न रखो कदम
संभालो अपने जज्बात
इसलिए
घरों में रहो न
बस 21 दिनों की तो है ये बात |
जैसे ही ख़त्म होगा लॉक डाउन
फिर होगा वही
सड़कों पर गाड़ियों का शोर
ट्रैफिक जाम
प्रदूषण,घुटन
आपाधापी, समय परऑफिस पहुँचने की टेंशन
बस वर्तमान को स्वीकार करो न
वरना भविष्य नहीं देखने देगा कोरोना
इसलिए कहता हूँ
बस 21 दिनों की बात है
घर पर रहो न |
गिरे देश की विकास दर,
चाहे सेंसेक्स पहुंचे रसातल
मुद्रास्फीति छुए आसमान
तुम इसकी चिंता करो न
सरकार सब संभाल लेगी
तुम बस खुद को संभालना
हिम्मत मत हारना
बस 21 दिनों की बात है
घर पर रहो न |
शिकायत रहती थी तुम्हें
कि वक्त नहीं है मेरे पास
अब तो वक्त ही वक्त है
तो रहो न घर में
बस 21 दिनों की तो बात है |

Tuesday, 21 January 2020

भीष्म का द्वन्द

भीष्म तुम्हारा त्याग बड़ा महान था
तुमने सत्यवती को दिया वचन निभाया

शपथ ली थी तुमने
अविवाहित रहने की
आजीवन हस्तिनापुर के संरक्षक बने रहने की
अम्बा पर रीझकर भी तुम अपने शपथ पर कायम रहे



देवव्रत से भीष्म,भीष्म से भीष्म पितामह
कुरु वंश के महा प्रतापी पितामह
तुम्हारे प्रताप ने क्या क्या देखा

भरी सभा में द्रौपदी का चीरहरण
पांडवों की सत्ता से बेदखली
दुर्योधन का दुःसाहस
दुःशासन की निर्लज्जता
कर्ण का दर्प
धृतराष्ट्र का पुत्र मोह

सब तुम्हारे सामने हुआ
पर तुम अपने शपथ से डिगे नहीं

पर ये दुविधा क्यों थी भीष्म
तुम्हारी इच्छाएँ,तुम्हारी कामना तुम्हारा चिंतन
इन सबके विपरीत क्यों रहा तुम्हारा कर्म

आजीवन वैरागी होकर भी हस्तिनापुर की गृहस्थी ढोते रहे
जिनसे प्रेम किया उनको ठुकराया
शरीर कौरवों के साथ और मन पांडवों के साथ
तुम्हारा जीवन तो द्वंदों का पुंज रहा भीष्म

उस द्वन्द में अधर्म फलता-फूलता रहा 
युद्ध भूमि में भी गांडीव पर प्रत्यंचा चढ़ाते हुए
तुम सशंकित रहे

तुमने धर्म का साथ दिया,अधर्म का या सत्यवती को दिया वचन निभाया ?
सच तो यह है कि तुम न तो धर्म के साथ रह पाए
न अधर्म और अधर्मियों का नाश कर पाए

जिस कुरु वंश को बचाने के लिए तुम जीवन भर द्वंदात्मक रहे
तुम्हारे जाने के बाद वो भी तो नहीं रहा
धर्म,शपथ और द्वन्द की बेड़ियों में जकड़े ही तुम मृत्यु को प्राप्त हुए

विडंबना देखो भीष्म कि तुम्हारा अंत न पुरुष ने किया न महिला ने
मृत्युशैया पर भी तुम द्वंद्व में रहे।।