Thursday, 14 February 2019

प्रेम चाहता हर कोई है,पर देना कोई नहीं चाहता

आज इंसान के पास वो तमाम आधुनिक सुख-सुविधाएँ मौजूद हैं,जिनकी किसी युग में कोई कामना कर सकता हो | इंसान अंतरिक्ष पर पहुंचा,चाँद पर कदम रखे,एवरेस्ट की ऊंचाइयों को छुआ,इन तमाम ऊंचाइयों को छूने और सुख सुविधाओं के रहते हुए भी लोग खुश नहीं हैं,हर कोई अधूरा महसूस कर रहा,हर तरफ कटुता,वैमनस्य,लोभ लालच,युद्ध | असल में आज सब कुछ होते हुए भी दुनिया में प्रेम कम पड़ रहा है,जो आज हर किसी की जरूरत है,जो पाना हर कोई चाहता है लेकिन देना कोई नहीं चाहता | 


प्रेम है क्या ?
यहाँ प्रेम के संबंध में शिव-पार्वती का एक बड़ा रोचक संवाद है
पार्वती शिव को गुरु मानकर एक शिष्या की तरह शिव से पूछती है,हे महादेव प्रेम क्या है ?
शिव:- सती के रूप में अपने प्राण त्याग जब तुम दूर चली गयी थी मेरा जीवन,संसार,मेरा दायित्व,सब निरर्थक और निराधार हो गया | हम दोनों के मिलन हेतु इस समस्त ब्रह्माण्ड का हर संभव प्रयास करना,षड्यंत्र रचना,इसका कारण हमारा असीम प्रेम ही तो है | तुम्हारा पार्वती के रूप में पुनः जन्म लेकर मेरे एकाकीपन और मुझे मेरे वैराग्य से बाहर निकालने पर विवश करना,और मेरा विवश हो जाना यह प्रेम ही तो है |
तुम जब मुझे चौसर में पराजित करती हो तो भी विजय मेरी ही होती है, क्योंकि उस समय तुम्हारे मुख पर आई प्रसन्नता मुझे मेरे दायित्व की पूर्णता का आभास कराती है | तुम्हें सुखी देख कर मुझे सुख का जो आभास होता है यही तो प्रेम है पार्वती |
                कुछ लोग अपने सपनों से प्रेम करते हैं,कुछ विचारों से,कुछ लोग शरीर के प्रेम को ही प्रेम कहते हैं |
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि प्रेम कभी शारीरिक नहीं हो सकता,हाँ यह उसकी बहुत छोटी सी तार्किक परिणति जरूर हो सकती है लेकिन इसे प्रेम नहीं कहा जा सकता | दरअसल प्रेम का सच्चा अर्थ पिघलने से है,खुद को मिटा देने से है | आपको अधिक प्रेम देना सीखना पड़ेगा,इस बात की परवाह या अपेक्षा किए बिना कि सामने से आपको क्या मिला है या मिलेगा | मतलब यह कि इस अवस्था में आने के लिए आपको राजाओं की तरह व्यवहार करना पड़ेगा,भिखारियों की तरह नहीं | क्योंकि अगर आप भिखारी बन प्रेम करेंगे तो आपका मन हमेशा सामने वाले से कुछ अपेक्षा करेगा क्योंकि आपकी अवस्था कुछ देने की नहीं है,इसलिए प्रेम करने उसे जीने और निभाने के लिए आपको राजाओं की तरह हमेशा उन्मुक्त भाव से देने को तत्पर रहना पड़ेगा |
दरअसल प्रेम विधा की तरह है,जिसे आप जितना बाँटेंगे उतना ही यह अंदर भरता जाएगा,यह सतत प्रक्रिया आपके अंदर जीवन पर्यन्त चल सकती है और तमाम त्याग करते हुए भी आप खुद को आनंदित और धनी महसूस करेंगे | अगर आपने प्रेम करते समय इस बात कि चिंता की कि कहीं यह घट तो नहीं जाएगा,तो समझिये आप प्रेम की पहली सीढ़ी चढ़ने में ही असफल हो गए,क्योंकि प्रेम मात्रा नहीं है यह गुणवत्ता है,जिसे आप जितना देंगे यह आपके अंदर उतना ही बढ़ेगा और रोक लेंगे तो स्वतः ही घट जाएगा | इस बात की प्रतीक्षा ना करें कि कोई आएगा और आपसे प्रेम मांगेगा,बस आप इसे बांटते चलें |
                                                     इस दुनिया में केवल प्रेम ही ऐसी चीज है जिसके लिए कोई पात्रता नहीं होती | गरीब हो अमीर हो,नादान हो बुद्धिमान,जवान हो वृद्ध हो,हिंदू हो मुसलमान हो,कहीं कोई पात्रता नहीं किसी योग्यता की जरुरत नहीं |
                 प्रेम धीमी आंच पर पकने वाला पकवान है | और जैसा कि सब जानते हैं कि धीमी आंच पर पका हुआ खाना बहुत जायकेदार होता है | लेकिन आधुनिक युग की समस्या दूसरी है | आज हर किसी को जल्दी है,प्रेम करने की,पाने की और चीजें जरा भी इधर उधर हुई नहीं कि दूसरे प्रेम में पड़ जाने की |
                                                            जहाँ बहुत अपेक्षाएं और उम्मीद है वहाँ प्रेम कभी दीर्घायु नहीं हो सकता,प्रेम को दीर्घायु बनाने के लिए आपको अपने अंदर की अपेक्षाओं को मारना पड़ेगा और इसे मारकर जो आप प्राप्त करेंगे वो अद्भुत होगा |
                  आजकल हर कोई अपनी मानसिक सुरक्षा की खोज में लगा हुआ है,सुख-सुविधा,साथ के लिए हर इंसान दूसरे पर निर्भर हो रहा | क्योंकि तकनीक की इस आधुनिक दुनिया में भी हर इंसान गहराई तक अकेला है,इसलिए तवज्जो पाने,प्रेम पाने,सहारा पाने को बेचैन रहता है | लेकिन समस्या ये है कि इस प्रक्रिया में हर कोई एक दूसरे पर हावी होने की फ़िराक में लगा है | फिर प्रेम कहाँ है ? तुम और मैं तथा हम और वे |
तो प्रेम का बड़ा मूल और शाश्वत भाव यह है कि प्रेम पाने के लिए बिना कोई उम्मीद पाले प्रेम दीजिए,बांटिए और हर क्षण,हर घड़ी उसे महसूस कीजिये,इसे अपनी ताकत बनाइए और इसी ताकत,ऊर्जा से प्रेम को जिएं |

4 comments:

  1. लेखन के प्रति आपका प्रेम सराहनीय ही नहीं बल्कि अनुकरणीय भी है। 🙏

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