Saturday, 28 December 2019

नागरिकता कानून,मोदी की धनुष से देशहित में निकला तीर है,वापस नहीं होगा

क्या नाम है तुम्हारा ? उसने थोड़ा रूककर कहा "ममता" मैंने आगे बिना उससे कुछ पूछे कहा कल से खाना बनाने आ जाना, वो अगले 10,15 दिनों तक आती रही,पुरे काम के दौरान ममता एक आध शब्द बोलती थी,आने के बाद भैया क्या बनाना है और बनने के बाद भैया मैं जा रही हूँ |एक दिन उसने कहा भैया मैं दो तीन दिन तक नहीं आ पाऊँगी | उस वक्त शायद ईद थी ,मुझे इस बात का जरा भी इल्म नहीं हुआ कि ममता ईद मनाती होगी | वैसे मुझे ईद,बकरीद,दिवाली या क्रिसमस से कोई समस्या नहीं थी लेकिन ममता का इस वक्त छुट्टी लेना मुझे थोड़ा खटका | वो जब लौट कर आई तो मैंने थोड़ी सख्ती से उससे पूछा तुम्हारा नाम क्या है ? उसने नजर नीचे करते हुए कहा बताया तो भैया ममता,अच्छा ठीक है एक काम करो घर जाओ और कोई पहचान पत्र वगैरह लेकर आओ | ममता या मेहरुनिसा या जो भी उसका नाम हो लौटकर नहीं आई | बाद में पता चला कि वो जहाँ रहती थी वो अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों का ठिकाना था जिसपर पुलिस ने दबिश दी थी |
चलिए अब इस मुद्दे को आगे बढ़ाते हैं


2014 से एक समुदाय डरा हुआ महसूस कर रहा और उस डर को हवा कांग्रेस की अगुवाई में वो पार्टियां दे रहीं जिन्हें खुद अपने अस्तित्व खोने का डर है | हालात कुछ यूँ थे कि रात के अँधेरे में गर किसी ने एक पत्थर भी फेंका तो इन्हें लगता था कि देश की कानून व्यवस्था ठीक नहीं है | इन्हें सपने में भी लोकतंत्र और संविधान खतरे में नजर आता था | यह सिलसिला मई 2019 तक बदस्तूर जारी रहा,डरने वालों ने जी भर कर सरकार को कोसा,विरोध प्रदर्शन,यानि जितनी इनके बस में थी वो सब किया ताकि जनता डरकर 2019 में इन्हें स्वीकार न करे नतीजा आया तो जनता ने डरने वालों को और डरा दिया अब क्या किया जाय ?
                                                           जिन्होंने सरकार को वोट और जिसने नहीं दिया उसे भाजपा का एजेंडा अच्छी तरह पता था कि,राम मंदिर,धारा 370,समान नागरिक संहिता,तीन तलाक,नागरिकता कानून और एनआरसी इस सरकार के एजेंडे में प्रमुखता से शामिल हैं और एक प्रचंड बहुमत ने डर के अफवाह को दरकिनार कर हस्तिनापुर का सिंहासन मोदी जी को सौंप दिया |
                                               राम मंदिर का मुद्दा कोर्ट ने सुलझाया,370 के मायाजाल को सरकार की मजबूती ने एक झटके में तोड़ सुविधापरस्त,मौकापरस्त और पाकपरस्त लोगों के हाथ से तोते उड़ा दिए | यानि नेहरू के लम्हों की खता को सदियों ने झेला और इस सरकार ने उससे निजात दिलाई | स्वाभाविक रूप से अब नागरिकता बिल (अब कानून ) का ही नंबर था और इसपर जो विरोध हो रहा है वो बहुत अप्रत्याशित नहीं है | सड़कों पर गाँधी की फोटो लिए,बसों,कारों में आग लगाते,पुलिस वालों को निशाना बनाते लोग जिन्हें मोदी सरकार का अंधविरोध करने वाली ताकतें हवा दे रही हैं | जरा फर्ज कीजिये अगर ये फैसला सरकार का न होकर कोर्ट का होता तो क्या होता ?  यकीन मानिये जिन्होंने अबतक हजारों करोड़ की सरकारी संपत्ति का नुकसान किया है उन्होंने इस कानून का एक पैराग्राफ भी नहीं पढ़ा होगा | जिसमें स्पष्ट रूप से यह कहा गया है कि जो इस देश के वैध नागरिक हैं चाहे वो किसी भी जाति,धर्म के हों उन्हें डरने या चिंतित होने की कोई जरुरत नहीं है | इस कानून में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि
-----पड़ोसी देशों के अल्पसंख्यकों को आसानी से भारत की नागरिकता मिल पाएगी. नागरिकता हासिल करने के लिए उन्हें यहां कम से कम 6 साल बिताने होंगे. पहले नागरिकता हासिल करने के लिए कम से कम 11 साल बिताने का पैमाना तय था.
-----पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश और आस-पास के देशों के हिंदू, ईसाई, सिख, पारसी, जैन और बौद्ध धर्म के वो लोग जिन्होंने 31 दिसंबर 2014 की निर्णायक तारीख तक भारत में प्रवेश कर लिया था. वे सभी भारत की नागरिकता के लिए आवेदन कर सकेंगे.
----- ओसीआई कार्ड धारक यदि नियमों का उल्लंघन करते हैं तो केंद्र के पास उनका कार्ड रद्द करने का अधिकार होगा. बता दें कि ओसीआई कार्ड स्थायी रूप से विदेश में बसे भारतीयों को दिए जाने वाला कार्ड है | इस कानून में केवल मुस्लिम समुदाय को बाहर रखने पर जो हाय तौबा और हंगामा मचा रहे वो दरअसल अपनी राजनीतिक जमीन को बचाने की जद्दोजहद में लगे हैं जो मुसलमानों को अपना वोट बैंक समझते हैं | मुल्क बर्बाद हो जाय लेकिन इनका वोट बैंक सही सलामत रहना चाहिए |
                  कुछ साल पहले ब्रिटिश संसद के सदस्य लार्ड मेघनाद देसाई ने कहा था कि जब हम अगले पचीस साल में भारत और चीन को देखेंगे तो चीन,अमेरिका को पछाड़कर एक विश्व शक्ति बन चुका होगा और भारत एक विशाल लोकतंत्र | देसाई का यह कथन हमारे मुल्क के लिजलिजेपन और सिर्फ दम्भी लोकतंत्र का दम भरने पर एक व्यंग्य के साथ साथ चेतावनी भी थी | एक मजबूत मुल्क बनने के लिए मजबुत और कठोर फैसले लेने पड़ते हैं और यह काम हर सरकार अपनी अपनी सोच,दूरदर्शिता और विचारधारा के हिसाब से करती है | नागरिकता कानून उसी मजबूती और विचारधारा की एक अगली मजबूत कड़ी है |
                                                     देश में सबसे ज्यादा अवैध अप्रवासी बंगाल में रह रहे जो पहले कम्युनिस्टों के वोट बैंक थे,और एक रिपोर्ट के अनुसार बांग्लादेश के करीब 82 % अवैध अप्रवासी बंगाल में रह रहे हैं उसके बाद,त्रिपुरा और असम का नंबर आता है | बंगाल में ममता बनर्जी द्वारा इस कानून का किया जा रहा विरोध,न तो व्यक्तिवाद से जुड़ा है,न मानवतावाद न यह शुद्ध रूप से वोट बैंकवाद से जुड़ा है | जिसे ममता अपनी जागीर समझती हैं | यही हाल देश की अन्य विपक्षी पार्टियों का है | जो इस कानून के विरोध में अपनी खोई हुई जमीन पाने की कोशिश कर रहे |
                     एक डर और दुष्प्रचार की मोदी सरकार देश की गंगा जामुनी संस्कृति को मिटाने पर तुली है,बहुसंख्यक,अल्पसंख्यक पर भारी पड़ जाएंगे | तो जरा गजवा ए हिन्द का इतिहास और हिंदुओं का इतिहास देख लें | कभी भी हिन्दुओं ने किसी धर्म को दबाने या उसके प्रचार प्रसार को रोकने की कोशिश नहीं की जबकि इस्लाम के उदय के बाद और खासकर दिल्ली सल्तनत की स्थापना के बाद औरंगजेब के समय तक जब तक शासक और शासित के धर्म अलग-अलग थे,उनकी संस्कृति,बोली,वेश भूषा अलग अलग थी इन आक्रांताओं ने हिन्दुओं को प्रताड़ित करने और जबरन उनका धर्मांतरण करने की हर संभव कोशिश की | जब इस्लाम का उदय हुआ तो हमारे यहाँ ( संपूर्ण उत्तर भारत ) हर्षवर्धन का शासन था जिसने महान गुप्त साम्राज्य के बाद बौद्ध धर्म के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई | यानी खुद के धर्म से इतर एक अलग धर्म के विस्तार में सहायता प्रदान की |  इस कानून से न तो इस्लाम को कोई खतरा है और न मुसलमानों को,खतरा है तो केवल उन्हें जो इन्हें डराकर राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बचाए रखना चाहते हैं |
 वैसे 2014 से जो लोग मोदी जी की राजनीति देख रहे और वो जो देख कर भी अनजाने बन रहे उन्हें इतना जरूर पता होगा कि ये मोदी की धनुष से निकला तीर है जो वापस नहीं होगा अब इस धनुष पर समान नागरिक संहिता,और जनसंख्या कानून की प्रत्यंचा चढ़ेगी ,इंतजार कीजिए |
                                                                 

Wednesday, 25 December 2019

विपक्ष की किलेबंदी तोड़ने के लिए भाजपा को पराक्रमी मुख्यमंत्रियों की जरुरत है

झारखण्ड के चुनाव परिणाम कमोबेश उसी एग्जिट पोल के मुताबिक आए जिस एग्जिट पोल को विपक्ष पिछले कुछ विधान सभा चुनावों से पहले तक ख़ारिज करता रहा था | बकौल विपक्ष और मीडिया द्वारा सुशोभित चाणक्य (अमित शाह ) नीति फेल हो गई,भाजपा 65 पार नहीं पहुँच सकी | जेएमएम की अगुवाई वाले विपक्ष ने ऐसी किसी संख्या को पार करने के दावे नहीं किए थे सो उसे सिर्फ 41 पार करना था जो उसने आसानी से कर लिया | बहुत दिनों बाद भारतीय राजनीति में ऐसा देखने को मिला जिसमें पार्टी के एक तजुर्बेकार वरिष्ठ नेता ने अपनी ही पार्टी के घमंडी और नकारे मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री मोदी के सहारे दोबारा मुख्यमंत्री बनने का सपना संजोने वाले को बतौर निर्दलीय उम्मीदवार चारों खाने चित कर दिया |



                                         महाराष्ट्र में शिव सेना के 180 डिग्री वैचारिक यू टर्न लेने के बाद पराक्रमी भाजपा के सामने पस्त विपक्ष को एक और राज्य में संजीवनी मिल गई | इन चुनाव परिणामों के सन्देश बहुत दूरगामी होंगे या केंद्र पर इसका कोई असर पड़ेगा इसकी दूर दूर तक कोई संभावना नहीं दिख रही है,लेकिन 2017 में देश के 70 % भू भाग पर राज करने वाली भाजपा आज अगर 32 % पर आ गई तो इसके कारणों की पड़ताल करना लाजमी जान पड़ता है |
                   कामयाब और करिश्माई मोदी उसी भाजपा में पले,बढ़े,तपे हैं जिसमें,रघुबर दास,मनोहर लाल,रमण सिंह,शिवराज सिंह,देवेंद्र फड़नवीस,वसुंधरा राजे जैसे नाकामयाब पूर्व मुख्यमंत्री (खट्टर को छोड़कर ) पले बढ़े हैं | नाकामयाब इसलिए भी क्योंकि राज्य और केंद्र में जब एक ही पार्टी की सरकार हो तो राज्य सरकार को केंद्र से भरपूर फंड मिलने में कोई दिक्कत नहीं होती बशर्ते आपको पता हो कि हमें कहाँ कैसे और किन जनकल्याणकारी योजनाओं में पैसा लगाना है और उसका लाभ जनता तक पहुँचाना है | इसके बाद भी अगर आप अपने बूते चुनाव नहीं जीता पाते तो इसे नाकामयाबी ही कही जाएगी |
                                             केंद्र में 2014 में सत्तासीन होने के बाद मोदी जी ने अपना एजेंडा तय कर लिया और उसपर मजबूती से आगे बढ़े और इस एजेंडे को मई 2019 में जनता की प्रचंड स्वीकार्यता भी मिली | लेकिन भाजपा के मुख्यमंत्रियों ने अपने पांच साल के लिए कोई एजेंडा तय नहीं किया | वो सत्ता में आए पांच साल रहे और चले गए,इनमें न तो दूरदर्शिता थी और न ही वो ओज लिहाजा विपक्ष तो विपक्ष प्रशासन भी इनपर हावी हो गया नतीजतन जनता इनसे कटती गई |
दूसरा - अगर अमित शाह के कामकाज को देखें तो यह स्पष्ट है कि 2024 में मोदी जी उनको अपने उत्तराधिकारी के तौर पर आगे बढ़ा रहे और इस बात पर कहीं कोई मतभेद भी नजर नहीं आता | सरकार और संगठन के बीच जो शानदार समन्वय केंद्र स्तर पर दिखा उसका लेश मात्र भी राज्यों में दृष्टिगोचर नहीं हुआ,जो संगठन में थे वो बेमन से काम करते हुए सरकार में आने के मंसूबे पाले हुए थे और जो सरकार में थे वो इनके पर कतरने में व्यस्त रहे वरना कोई कारण नहीं था कि केंद्र और राज्य दोनों में सत्तासीन होते हुए भी राज्यों में एक एक कर सत्ता भाजपा के हाथ से फिसल रही | राज्य स्तरीय नेतृत्व ने अपने तले कोई दूसरा नेता नहीं पनपने दिया |
तीसरा - मोदी एक हैं और ऐसा भी नहीं है कि मोदी नहीं चाहते कि भाजपा में और मोदी पैदा हों लेकिन यह हो नहीं पाया है | दरअसल मोदी का मतलब दृढ़ता,पराक्रम,ओजस्वी,ईमानदार,वैचारिक समर्पण है जो भाजपा के किसी भी मुख्यमंत्री में दूर दूर तक नजर नहीं आता | कुछ पर भ्रस्टाचार के आरोप लगे,कुछ पर परिवारवाद के तो ऐसे में सिर्फ मोदी नाम के सहारे दोबारा गद्दी प्राप्त करना बेहद दूरह कार्य है वो तब जब विपक्ष बिना किसी वैचारिक एकता के सिर्फ भाजपा विरोध के नाम पर एक गठबंधन के तले आ जाएं |
चौथा - यह जरुरी नहीं कि जो मुद्दे देश के लिए जरुरी हों वो राज्यों में भी जनता को प्रभावित करेंगे,खासकर झारखण्ड जैसे अमीर ससाधनों वाले गरीब राज्य में | यक़ीनन 370,तीन तलाक,राम मंदिर,नागरिकता कानून मोदी सरकार के साहसिक और क्रन्तिकारी फैसले हैं लेकिन जिस राज्य में अधिकांश जनता दो वक्त की रोटी के लिए संघर्षरत हो वहाँ ऐसी क्रांतियों के बल पर वोट की उम्मीद करना बेमानी है |
                                                      दरअसल कोई भी साम्राज्य या अर्थव्यवस्था जब अपने चरम बिंदु पर पहुँचती है तो फिर एक सीमा के बाद धीरे धीरे उसका अवसान होने लगता है | तो क्या भाजपा के उत्थान का समय अब समाप्त हो गया ?  2014 से भाजपा ने जिस राजनीतिक और वैचारिक साम्राज्य विस्तार की नींव रखी तो इस क्रम में केंद्र में दोबारा सत्तासीन होने के अलावा त्रिपुरा,असम और बंगाल जैसे राज्यों में अपना राजनीतिक परचम लहराया जो कुछ समय पहले तक अकल्पनीय प्रतीत होता था | कश्मीर से कन्याकुमारी तक कमल खिलाने के बाद उसे यथावत रखना एक बड़ी चुनौती है,चूँकि भाजपा में कांग्रेस की तरह चारण और एक परिवार के प्रति चापलुसिया व्यवस्था नहीं है इसलिए कोई भी अदना सा कार्यकर्ता अपनी मेहनत से शीर्ष पद पर पहुंच सकता है,लेकिन अब जिस तरह से विपक्ष भाजपा के खिलाफ लामबंद हो रहा है उसमें पार्टी को यह देखना होगा कि ऐसे लोगों के हाथ में कमान दी जाय जो न सिर्फ भाजपा के वैचारिक खेवनहार हों बल्कि शासन प्रशासन में दूरदर्शी,ईमानदार और परिवारवाद के मोह से भी दूर रहें |
                                                    पुनश्चः
हालिया तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को हरियाणा में 31 सीट,महाराष्ट्र में 44 और झारखण्ड में 16 सीटें मिली हैं जबकि भाजपा को अकेले महाराष्ट्र में 105 सीटें मिली हैं | कांग्रेस किस बात पर खुश हो रही पता नहीं | एक समय था जब कांग्रेस चुनाव रूपी शादी में दूल्हा या दुल्हन हुआ करती थी अब वो सिर्फ घोड़ी बनकर खुश है तो इसे 130 साल पुरानी पार्टी के लिए दुर्भाग्य ही कहा जाय |


                                                                                        

Saturday, 5 October 2019

कौन लौटाएगा मगध का प्राचीन वैभव ? कोई चन्द्रगुप्त नहीं दिख रहा

मगध पानी पानी हो गया है
जनता त्राहि त्राहि कर रही है
मगध की राजगद्दी पर सुशासन बाबू विराजे हैं



चटुकारियों,दरबारियों से घिरे
सबकी आँखों का पानी सूख गया है
हाथों में तीर लिए,लालटेन की बुझ चुकी रौशनी पर निशाना लगाते हुए
बुद्ध की तरह मंद मंद मुस्कान लिए
मध्यम मार्ग का आवरण ओढ़े
15 वर्षों से कुंडली जमाए |
बुद्ध ने तो ज्ञान प्राप्ति के लिए गृह त्याग किया था,
सुशासन बाबू ने तो लगता है शर्म का त्याग कर दिया है |
धनानंद की तरह सत्ता से चिपके
दलितों को महादलित,मुसलमानों को पसमांदा और पिछड़ों को अति पिछड़ा बनाते
मधुशाला पर पाबंदी लगा कर जनता का ध्यान असली मुद्दों से भटकाते
कभी नालंदा,तक्षशिला का वैभव देख चुका विश्व,
आज यहाँ के टॉपरों को संदेह की दृष्टि से देखता है
मगध के स्वास्थ्य के तो क्या कहने हैं,
स्वयं जीवक,धन्वन्तरि,चरक यहाँ के चिकित्सालयों की व्यस्वस्था देख शर्म से पानी पानी हो जाते
ओह अतीत के गौरवशाली भग्नावशेषों पर वर्तमान का कुशासन कितना भारी पड़ा
कितनी उम्मीदों आशाओं के साथ मगध ने लालटेन युग को त्याग सुशासन बाबू को चुना था
मगर मगध का विकास रथ वहीं का वहीं रुका है
कहाँ है चाणक्य ? कौन संभालेगा मगध को ?
कौन मिटाएगा अँधियारा
कौन मुक्ति दिलाएगा,धनानंद के कुशासन से ?
कौन लौटाएगा मगध का प्राचीन वैभव
दूर दूर तक कोई चन्द्रगुप्त नहीं दिख रहा,,,,,,,,,,


Sunday, 22 September 2019

बरगद

बरगद

बरगद सदियों से खड़ा था वहाँ,
सभ्यताओं,संस्कृतियों का मूक वाहक

मनुष्य के विकास क्रम का साक्षी
हर ऋतु में अविचल

महिलाएं,बूढ़े बरगद को पूजतीं
अपने पतियों की लम्बी आयु की दुआ मांगती
दादी,नानी की कहानियों में भी अक्सर उसका जिक्र आता

न जाने कितने तूफान झेले उसने
लोग उसकी छांव तले
उसके आस पास,पले,बढ़े
शाखाओं पर झूला झूले
गिरे,धूल धूसरित हुए

वक़्त की आंच में सब गाढ़ा हुआ



छोटे बड़े बन गए
समझदार और सभ्य भी
आधुनिकता उनमें और वो आधुनिकता में घुल गए,

पूजा खत्म हुई और बचपन भी
दादी-नानी के साथ उनकी कहानी भी

लेकिन बरगद अब भी अपनी ठसक लिए बेतरतीब सा जड़वत है
लंबा, चौड़ा, सीना ताने, मदमस्त, बेमेल सा आधुनिकता में बाधक


फिर एक दिन सभ्यता ने असभ्यता को ख़त्म करने की ठानी

सदियां एक दिन में ख़त्म
विध्वंस सृजन पर भारी पड़ा

सभ्यता की इमारत बड़ी हो चुकी है
अब बालकनी से पौधे झांकते हैं
उन्हीं में से एक छोटा बरगद भी
एक और सदी के इंतजार में।।

Monday, 9 September 2019

मिडिल क्लास

कार्ल मार्क्स ने कहा था,
Let the masses rule not the classes
हमें नहीं पता हमारी क्लास का उद्भव कब हुआ ?
हम कहाँ से आए?
प्राचीन वर्ण व्यवस्था में भी हमारा जिक्र नहीं,
हाँ इतना हमें पता है कि
हम इस देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं,


यानि मध्य भाग,Middle Class
शीर्ष का हमें पता नहीं,शायद हम शीर्ष के लिए बने ही नहीं |
हम नैतिकता के वाहक हैं,संस्कृति के रक्षक,
सभ्यताओं के पालनहार,
हम बाजार के लिए ग्राहक हैं,
वैश्वीकरण के खेवनहार,
महीने की 30\31 तारीख को करते तनख्वाह का बेसब्री से इंतजार |
बीबी की ख्वाहिशें,
बच्चों की स्कूल फीस,
बूढ़े माँ बाप की दवाई,
15 तारीख आते-आते निकल जाती है Middle Class की रुलाई
छुट्टियों के लिए मसूरी नैनीताल ही हमारा स्विट्ज़रलैंड है
आखिर हम क्या हैं ?
ख्वाहिशों,उम्मीदों,अरमानों,जिम्मेदारियों का बोझ ढोते
त्रिशंकु की तरह न हम आसमान छू सकते,न जमीन पर गिर सकते हैं
पता नहीं किस व्यवस्था ने हमें श्राप दिया है
मिडिल क्लास कब खुलके जिया है ?
हम शासित होने को अभिशप्त हैं,
कर्म से शासित,व्यवस्था से शासित,नियम कानून कायदों से शासित |
एंटिला की नींव बनना ही हमारी नियति है,क्योंकि शीर्ष तो हमारे लिए है ही नहीं |
बजट की घोषणा,सरकारी नीतियां,मंदी की मार,मानसून का इंतजार |
सब मिडिल क्लास के लिए है यार
भेड़ बकरियों की तरह व्यवस्था की मार झेलते,
न इधर के न उधर के
एक अदद आशियाने की तलाश में,
हम मार्क्सवाद,समाजवाद के सजग प्रहरी,
पूंजीवाद के डंडे से हाँके जाते
अस्पताल में वेटिंग,ट्रेन बस मेट्रो में धक्के खाते
सुबह से शाम,शाम से रात और फिर रात से सुबह
मार्क्स के कथन के सच होने के इंतजार में ,,,
हम मिडिल क्लास 

Sunday, 8 September 2019

मैं रवीश कुमार यह अवार्ड नहीं लौटाऊंगा

नमस्कार मैं रवीश कुमार,आज मैं बेहद खुश हूँ कि आखिरकार देश न सही विदेश ने मेरी असाधारण पत्रकार होने की पहचान पर मोहर लगाया और मुझे रमण मैग्ससे अवार्ड दिया | असाधारण इसलिए क्योंकि साधारण पत्रकार सिर्फ खबर दिखाते और चलाते हैं लेकिन मैं खबर के पीछे,जनमत बनाता हूँ और अपना राजनीतिक वैचारिक एजेंडा भी चलाता हूँ |


                          इस देश में तो वैसे भी अब अवार्डों की विश्वसनीयता रही नहीं | जिसे देखिये वही अवार्ड पा जा रहा है,पाने वालों में अधिकांश वो लोग हैं जो इस देश के पुष्पित पल्लवित लोकतंत्र में खुद को सुरक्षित महसूस कर रहे हैं ,लेकिन एक दूसरा तबका ऐसा है और मुझे लगता है कि इसी बुद्धिजीवी तबके की वजह से देश में आज लोकतंत्र जिंदा है | ये वो लोग हैं,जिन्हें संविधान में आस्था है,और जब इनकी लिजलिजी और सुविधाजनक आस्था टूटती है तो इ लोग सहिष्णुता की खोल में असहिष्णु हो जाते हैं | और वैसे भी जितने लोगों को अवार्ड मिल रहे हैं उससे ज्यादा लोग लौटा रहे हैं |
                        इस देश में लोकतंत्र और संविधान खतरे में है,जिसका जिक्र और जिसकी चिंता मैं अपने प्राइम टाइम में पिछले 5,6 वर्षों से कर रहा हूँ | और इसी वजह से मैं बुद्धू बक्से पर एक तरह से विपक्ष की नुमाइंदगी भी कर रहा हूँ | इस देश के जिम्मेदार नागरिक होने के नाते यह मेरा कर्त्तव्य है कि अस्त व्यस्त और पस्त पड़े लुंजपुंज विपक्ष की आवाज बनूँ क्योंकि अगर मैं ऐसा नहीं करूँगा या करता तो देश में एक बार फिर आपातकाल लगने का खतरा बढ़ जाता |
            जब मुझे लगा कि मेरी आवाज सरकार तक नहीं पहुँच रही या मोदी सरकार मुझे इग्नोर कर रही तो मैंने अपने कार्यक्रमों में विरोध स्वरुप टीवी स्क्रीन को काला कर खुद को झक सफ़ेद और वैचारिक रूप से निष्पक्ष दिखाने की कोशिश की | खैर जैसे ही मैंने यह पुरस्कार ग्रहण किया मुझे लगा कि इस देश में लोकतंत्र जीवंत रूप से प्रवाहमान है,संविधान भी खतरे में नहीं है अगर ऐसा होता तो सरकार कभी ना कभी किसी न किसी केस में फंसाकर मुझे जेल में डाल देती | जैसे लालू यादव,चिदंबरम,अमित जोगी वगैरह को डाला है |
                                        विडंबना देखिये कि मुझे जो पहचान इस सरकार,व्यवस्था को कोसते हुए,सरकार की हर नीति नियति में खोट निकालते हुए पिछले पांच छह वर्षों में मिली है वो आशातीत है | मुझे ख़ुशी है कि मैं ऐसा कर पाया | यह भी कमाल की बात है कि मुझे जिस टीवी से इतनी शोहरत,दौलत,और इज़्ज़त ( इसमें मुझे थोड़ा संदेह है ) मिली मैंने अपने कार्यक्रम में लोगों से उसी को देखने से मना किया | लेकिन मैंने खुद टीवी नहीं छोड़ा,और न देश छोड़कर गया | मैं चाहता तो आराम से राजनीति में जा सकता था,लेकिन मैंने आंसू तोष की हालत देखकर अपना मन बदल लिया | टीवी पर रहते हुए आप राजनीति कर सकते हैं अपना मनपसंद एजेंडा पत्रकारिता की आड़ में चला सकते हैं,लेकिन राजनीति में रहते हुए ऐसा संभव नहीं होता |
अच्छा एक बात और देश में मेरे डर के माहौल ने मेरा पीछा मनीला में भी नहीं छोड़ा और मैंने डरते डरते ही अवार्ड ग्रहण किया |
खैर अब जबकि इस सरकार के मेरे अंध विरोध को एक विदेशी सम्मान और पहचान मिली है तो अपने अवार्ड वापसी गैंग वाले परम आदरणीय मित्रों को यह बताना चाहता हूँ कि मैं ये अवार्ड कभी वापस नहीं करूँगा हाँ अपना एजेंडा आगे बढ़ाता रहूँगा पत्रकारिता के नाम पर विपक्ष का पक्ष रखता रहूंगा |
   पुनश्चः
कल बगुला भगत पल्लव बागला का विज्ञान के प्रति पागलपन देख के मुझे बहुत ख़ुशी हुई | दरअसल मैं जब अपने जैसे लोगों जो की इस देश में गिने चुने ही हैं देखता हूँ तो मुझे लगता है कि देश में लोकतंत्र अभी जिंदा है हाँ हम अपने कृत्यों पर कतई नहीं शर्मिंदा हैं |
           

Monday, 5 August 2019

मैं कश्मीर बोल रही हूँ

एक देश में रहते हुए,वर्षों से भेदभाव सहती,सीमा पार से आतंकवाद को झेलती,नेहरू के आदर्शवाद की गलतियों का खामियाजा भुगतती मैं कश्मीर बोल रही हूँ

पटेल की दृढ इच्छा शक्ति से अस्तित्व में आई,हरिसिंह के राजघराने के वैभव की साक्षी मैं कश्मीर बोल रही हूँ

धारा 370 और 35 ए के जरिये,देश के विधान और संविधान से कटने वाली,कभी खुद के तिरंगे पर इतराने वाली मैं कश्मीर बोल रही हूँ

स्वर्ग से उपमा दी जाती मेरी,प्रकृति के अद्भुत सौंदर्य को समेटे,हिमालय की वादियों से मैं कश्मीर बोल रही हूँ

कभी अब्दुल्ला,कभी महबूबा,कभी कांग्रेस के अजूबों से जूझती उनकी लिजलिजी नीतियों से आजिज मैं कश्मीर बोल रही हूँ 

रक्त रंजित लाल चौक,कभी हजरतबल दरगाह,कभी उरी तो कभी पठानकोट पर आतंक का नंगा नाच झेल चुकी मैं कश्मीर बोल रही हूँ

अपने कोमल ह्रदय पर पत्थरबाजों का चोट झेलती,अफजल,बुरहान वानी जैसों के काम और हिंदुस्तान के वीर सैनिकों द्वारा उसके काम तमाम की वजह से देश दुनिया में खबरों में आती मैं कश्मीर बोल रही हूँ,

रहते मेरी मिट्टी पर,और गीत गाते हमदर्दी जताते पाक परस्त गद्दारों का बोझ ढोती मैं कश्मीर बोल रही हूँ,

अपने एक हिस्से को वर्षों से पाक के हाथों में देखती तड़पती,हुर्रियत के पीछे छिपी बदनीयती,जम्हूरियत से वंचित,इंसानियत को रोजाना रक्त रंजित होते हुए देखने वाली,कभी डल झील की खूबसूरती पर इतराने वाली अपने तारणहार की प्रतीक्षा करती मैं अभागी कश्मीर बोल रही हूँ

आज ऐसा लगता है मानो सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी,मेरी बरसों की पुकार सुनी गई 
370 और 35 ए से मुक्ति पाई, एक देश एक विधान,एक संविधान के दायरे में आई,56 इंच के सीने का आभार जताती,बलखाती,इतराती,भविष्य के सुनहरे सपनों में खोई मैं कश्मीर बोल रही हूँ,

जिन्होंने मुझे अब तक छला है अब वो हो जाएंगे अप्रासंगिक और राजनीतिक पटल पर बहुतों की बंद हो जाएगी दुकान,
मेरे आँगन में लोग बेरोकटोक गाएंगे वन्दे मातरम,देश के दुश्मनों का होगा काम तमाम,मुझे मिलेगी नई पहचान
लाल किला हो या लाल चौक हर जगह फहराएगा तिरंगा झंडा,पुरे आन बान और शान
ये सोचकर आहलादित मैं कश्मीर बोल रही हूँ | 

Tuesday, 28 May 2019

चलो इस्तीफा इस्तीफा खेलते हैं

सुनो,मैं प्रलयंकारी हार की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए,

इस्तीफा दूंगा\दूंगी,
तुमलोग स्वीकार मत करना,
करना केवल चीत्कार,
कहना कौन बनेगा खेवनहार ?
हार पर होगा गंभीर चिंतन मंथन,
सौगंध गंगा मैया की
अबकी आमूलचूल होगा परिवर्तन,
पिछले कई बार की तरह इस बार भी कमिटियों का होगा गठन,
कुछ बलि के बकरे ढूंढे जाएंगे,
हम उनको हटाएंगे,
अपनी नाकामियों को छुपाएंगे
परिवार को बचाएंगे
सेकुलरिज्म,समाजवाद,संविधान,लोकतंत्र का सहारा लेकर
अगले चुनावों के लिए कुछ लक्ष्य भेदी बाण चलाएंगे |
देश तो बचा हुआ है,बचा रहेगा,
परिवार बचना चाहिए,
निष्ठा दिखाओ,
नहीं नहीं,जनता,देश और संविधान के प्रति नहीं,
परिवार के प्रति,
क्या हुआ गर बिहार से बंगाल तक,गुजरात से गुड़गांव तक हो गई हमारी मिट्टी पलित,
जनता ने ध्वस्त किए हमारे अरमान,
खान मार्किट वाले भी ना आए किसी काम,
मज़बूरी थी जनादेश का करना था सम्मान,
हाथ,हाथी,साईकिल,लालटेन
सब हो गए बेकाम |

पिछले पांच सालों में हमने क्या क्या नहीं किया
गर्भ से कब्र तक हर बात के लिए केंद्र को कोसते रहे
लोकतंत्र,संविधान,देश,सहिष्णुता सब खतरे में पड़े थे,
पहले इसे बचाना था
फिर जनता के बीच भी जाना था,
सोचा था हमने,सब धर्मनिरपेक्षता के झण्डेबरदार
एक छत के नीचे आएँगे,
चौकीदार को चोर और नीच बताएंगे,
भगवा वालों को पानी पिलाएंगे,
उनके नए भारत की काट के लिए
हम हर महीने एक नया पीएम बनाएँगे
मगर ये हो ना सका,
हमने जनता को Granted लिया
जनता ने हमें Unwanted किया
सपनों को जमींदोज कर दिया |
इस्तीफों का खेल यूँ ही चलता रहेगा,
पर लगता है
अब सत्ता में परिवारवाद का खेल नहीं चलेगा | 

Sunday, 12 May 2019

क्या देश में अघोषित आपातकाल लागू है ?

क्या देश में अघोषित आपातकाल लागू है ? 

मई 2014 में जब एनडीए ने नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में प्रचंड जनादेश हासिल कर दिल्ली का राजसिंहासन संभाला तो उसके कुछ समय बाद ही भारतीय राजनीति में कुछ शब्द बहुत तेजी से उभरे और चर्चित हो गए | जैसे,हिटलर,तानाशाही,अलोकतांत्रिक,असहिष्णुता,अराजकता,अघोषित आपातकाल,आदि | ऐसा नहीं था कि भारतीय मतदाता जिसने भाजपा को दिल्ली की सत्ता के लिए स्पष्ट जनादेश दिया था इन शब्दों को पहली बार सुन रहा था,लेकिन 2014 के बाद ये शब्द रोजाना अख़बार,और टेलीविजन की सुर्खियां बनने लगे | 

विपक्ष बार-बार मोदी सरकार को आड़े हाथों लेते हुए यह आरोप लगा रहा कि इस देश में अघोषित आपातकाल लागू है | यह आरोप अन्य विपक्षी दलों के अलावा वह कांग्रेस भी लगा रही जिसकी दुर्गा रूपी अवतार प्रधानमंत्री ने अपनी सत्ता बचाने को लोकतंत्र की मान मर्यादा और उसके नैतिक मूल्यों को रौंद डाला था | शायद पुराने कांग्रेसियों को आपातकाल की निरंकुशता,प्रताड़ना और भयावहता अच्छी तरह याद है | आपातकाल में लोगों के मौलिक अधिकार भंग कर दिए गए थे,न्यायपालिका की शक्तियां कम कर दी गईं थीं, प्रेस के मुँह पर ताला लगा दिया गया था,सरकार के खिलाफ किसी तरह के विरोध या प्रजातान्त्रिक मर्यादाओं के पालन की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी गई थी | इंदिरा गाँधी,कार्यपालिका,न्यायपालिका और विधायिका का एकमात्र शक्ति पुंज बन गईं थीं | कहा जाता है कि उन दिनों दिल्ली में एक व्यक्ति ने किताबों की दुकान में जाके संविधान की एक प्रति मांगी तो दुकानदार ने कहा क्षमा करें हम इस नाम की कोई पत्रिका नहीं मंगवाते | 

                                                              अब जरा हम इस दौर में आते है जिस दौर की बकौल विपक्ष अघोषित आपातकाल से तुलना कर रहा | सबसे पहले तो जिन मुखारबिंदों से यह तुलना निकल रही है वो खुद ही काफी मुखर हैं,सोशल मीडिया,पारंपरिक मीडिया हर जगह अविरलता दिख रही | प्रधानमंत्री को मौत का सौदागर,नीच,सांप,बिच्छू,महिषासुर,औरंगजेब जैसी उपमाओं से नवाजा जा रहा,ये सब जुबानी प्रक्षेपास्त्र हैं और जो मौलिक अधिकारो की श्रेणी में आते हैं,जिनपर कोई रोकटोक नहीं | ऐसा लगता है मानो मोदी जी ने इन लोगों से व्यक्तिगत उधार लिया हो और प्रधानमंत्री बनने के बाद उधार चुकाने से मुकर गए हों | 


न्यायपालिका स्वतंत्र रूप से अपना काम कर रही,ये अलग बात है कि जब भी न्यायालय का कोई फैसला सरकार के पक्ष में आता है तो विपक्ष को अघोषित आपातकाल याद आ जाता है,और जब फैसला सरकार के खिलाफ आता है तो यही लोग न्यायपालिका को सर आँखों पर उठा लेते हैं | इसे वैचारिक लिजलिजेपन से ज्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता | 

                   अब आते हैं प्रेस की तरफ | आज मीडिया स्पष्ट रूप से,मोदी विरोध और मोदी समर्थक दो वर्गों में बंटा नजर आ रहा,एक तबका है जिसे सरकार की नीतियां,उसकी योजनाएं विकासोन्मुख लगती हैं तो दूसरा तबका नकरात्मत्का,मोदी विरोध और वैमनस्य से भरा हुआ है | इस पक्ष को अभी भी यकीन नहीं हो रहा है कि मोदी को प्रचंड जनादेश से इसी देश की जनता ने चुना था | मीडिया का यह तबका,किसानों की आत्महत्या,सड़कों के गड्ढे,महंगाई,बेरोजगारी हर मुद्दे के लिए मोदी सरकार को जिम्मेदार ठहरता है | विरोध और नफरत की पराकाष्टा में कुछ चैनल बैकग्राउंड को काला कर देते हैं,जुबानी नफरत की तो बात ही छोड़ दीजिये | इन सब कृत्यों को करते हुए जब यह तबका कहता है कि क्या देश में अघोषित आपातकाल लगा हुआ है तो उनको आपातकाल के बाद,लाल कृष्ण आडवाणी की प्रेस पर यह टिपण्णी याद रखनी चाहिए कि, आपातकाल के दौरान आपको झुकने को कहा गया था पर आप तो रेंगने लगे | आज की स्थिति उलटी है मीडिया का एक वर्ग,येन केन प्रकारेण मोदी सरकार को बदनाम करने पर तुला है | खुलकर सरकार की आलोचना की जा रही है, क्या आपातकाल में भी किसी मीडिया संस्थान की हिम्मत थी की वह इंदिरा सरकार की आलोचना का अ भी लिख दे | 
                                                                 बुद्धिजीवियों का कोई जनाधार नहीं होता उनके पास केवल विचार होते हैं,जिनकी प्रासंगिकता और महत्व समय के साथ घटते बढ़ते रहती है | हमारे देश का अधिकांश बुद्धिजीवी वर्ग वामपंथी विचारों का लबादा ओढ़े आत्ममुग्धता से लबरेज रहा है | इन बुद्धिजीवियों को जिनमें से अधिकांश ने आपातकाल का दंश झेला है,को दिन रात यह चिंता सताए रहती है,इस देश का लोकतंत्र खतरे में है,देश और संविधान खतरे में है,यह अलग बात है कि इंदिरा गाँधी के आपातकालीन काल में जब कुख्यात 42वां संविधान संशोधन हुआ था,इन लिजलिजे बुद्धिजीवियों ने एक आध अपवाद को छोड़कर शुतुरमुर्ग की तरह ख़ामोशी का आवरण ओढ़ लिया था | 
                                                                  इन सबमें सबसे विचित्र बात ये है कि जब यह तबका इस सरकार के खिलाफ विषवमन करते हुए एक सरकार विरोधी माहौल बनाने की कोशिश कर रहा होता है,और मोदी सरकार को कोसते हुए,सरकार की नीतियों पर प्रहार करते हुए,बेलगाम,बदजुबानी करता है तो यह कहकर हंसी का पात्र ही बनता है कि इस सरकार में बोलने की आजादी छीन ली गई है | 

इंदिरा गाँधी के आपातकाल के बारे में बहुत कुछ लिखा,पढ़ा बोला और झेला जा चुका है | 

कहा जाता है कि उस वक्त गुलजार की फिल्म आंधी को सेंसर बोर्ड ने अनापत्ति प्रमाणपत्र ना देकर इसलिए रोक दिया था क्योंकि बकौल तत्कालीन सरकार इस फिल्म में इंदिरा गाँधी का नकारात्मक चरित्र-चित्रण किया गया था बाद में काफी काट-छांट के बाद इस फिल्म को रिलीज़ होने दिया गया | अब जरा वर्तमान हालात पर गौर फरमाइए,मोदी जी पर बनी बायोपिक को चुनाव आयोग ने चुनाव समाप्त होने तक रिलीज होने से रोक दिया,क्या ये आपातकाल की आंधी है ? लोकतान्त्रिक मूल्यों और संस्थाओं का सम्मान करते हुए आयोग या किसी अन्य संस्था के सरकार विरोधी निर्णय को शिरोधार्य करना यह दर्शाता है कि इस देश का लोकतंत्र पिछले पांच सालों और पुष्पित,पल्लवित,विकसित और परिपक्व हुआ है | 
                                                     दरअसल आपातकाल जैसी वीभत्स चीजों का दुष्प्रचार कर देश का वो राजनितिक,आत्ममुग्ध लिजलिजा बुद्धिजीवी वर्ग अपने बचे खुचे अस्तित्व को बचाने की कवायद में जुटा है जिसे 2014 में जनता ने ख़ारिज कर दिया | 

Tuesday, 30 April 2019

धुली हुई जैकेट


क्या बात है भाई आजकल कूड़ा ले जाने नहीं आते हो ? देखो आज तीन दिन हो गए,घर में कूड़े का ढेर लग गया है,पैसा मांगने तो हर महीने की पहली तारीख को आ जाते हो,साले कामचोर | 

इनर,फुल स्वेटर,जैकेट,शॉल और हाथों में ग्लब्स पहने,कॉफी की चुस्कियां लेते हुए दरवाजा खोलते ही अविनाश उस कूड़े वाले पर बरस पड़ा,जो हाड़ कंपाती ठंड में बिलकुल फटे चिटे कपड़ों में काँधे पर कूड़े का बोरा लटकाए अपने शरीर को गर्माहट देने की कोशिश कर रहा था | 

भैया आजकल ठंड थोड़ी ज्यादा बढ़ गई है इसलिए रोज नहीं आ पा रहा हूँ | 

हाँ तो ठंड सिर्फ तुम्हारे लिए ही है क्या,हमें भी ठंड लगती है,हम तो अपना काम नहीं छोड़ते | 

दरअसल तुमलोगों को आदत हो गई है कामचोरी की | उसपर अपनी भड़ास निकाल,अविनाश ने जोर से दरवाजा बंद किया और आकर बाथरूम में गीज़र ऑन करके शेविंग करने लगा |

                 ऑफिस निकलते समय उसकी नजर वाशिंग मशीन पर पड़े एक पुरानी जैकेट पर पड़ी जिसे वो पिछले तीन सालों से पहन रहा था,जैकेट की स्थिति काफी अच्छी थी और उसने सोचा था कि कूड़े वाले को दे दूँ,लेकिन उस कूड़े वाले के तीन दिन की छुट्टी ने अविनाश का मन बदल दिया,रहने देते हैं,इसे लांड्री में धुलवा कर मैं ही पहनूँगा वैसे भी इन सालों को इतनी महंगी जैकेट देकर होगा क्या |

                                                      इस विचार से अविनाश उस जैकेट को लेकर निकल गया और ऑफिस के रस्ते में पड़ने वाले एक लांड्री वाले को देकर आगे निकल गया | 

अगले दिन कूड़े वाला नहीं आया,अविनाश को अपने उस फैसले पर बड़ा गर्व हुआ,ठीक किया मैंने साले को जैकेट नहीं दिया | फिर अगले चार दिनों तक भी कूड़े वाला कहीं नजर नहीं आया,अविनाश जैसे ही घर में कूड़े का ढेर देखता,उसकी जुबान से कूड़े वाले के लिए भद्दी गाली निकलती | साले कामचोर,निकम्मे,,,

  अगले दिन ऑफिस से लौटते समय लांड्री वाले की नजर अविनाश पर पड़ी,अरे साहब अपना जैकेट ले जाइये,वरना दुकान में कहीं इधर उधर हो जाएगा | अच्छा बड़ी जल्दी कर दिया अविनाश ने कहा,साहब मैंने सोचा इतनी ठण्ड पड़ रही है,शायद आपको जरुरत पड़े,और आप तो वर्षों से हमारे ग्राहक हैं | हम्म्म्म,अविनाश ने उससे जैकेट लिया और घर की तरफ बढ़ गया | 

अरे वाह जैकेट तो बिलकुल नई जैसी लगने लगी कल,इसी को पहन के ऑफिस जाऊंगा | 

सुबह फिर कूड़े वाले को कोसते हुए अविनाश तैयार हुआ और आज,इनर और शर्ट के ऊपर उसने वही जैकेट पहनी | 

दरवाजे पर बेल बजी,वह भन्नाते हुए निकला कि साला आज इस कूड़े वाले को हटा ही दूंगा,सामने 16,17 साल का एक लड़का कूड़े की बोरी लिए खड़ा था | 

अरे वो बुड्ढा नहीं आया कूड़ा लेने अविनाश ने चिल्लाते हुए कहा,

भैया अब्बा इस दुनिया में नहीं रहे,चार दिन पहले ही ठंड से उनकी मौत हो गई,क्या अविनाश अवाक् रह गया,बिलकुल खामोश,अब उस लांड्री से धुली हुई जैकेट में भी उसे ठंड लग रही थी | 

Monday, 4 March 2019

अबकी लाहौर में भारत का तिरंगा लहराएगा

शत्रु ने कायरता पूर्वक वार किया,
अबकी बार सेनाओं ने भीषण हुंकार किया,
अपना स्वरूप-विस्तार किया,
वायुपुत्रों ने सीमा पार किया
दुश्मन के ठिकानों पर प्रहार किया
दुष्टों का संहार किया
अभिनंदन ने भी सीमा पार किया
सीमा पार जाकर वार किया |

डगमग-डगमग दिग्गज डोले
मोदी कुपित होकर बोले
जब नाश मनुष्य पर छाता है
पहले विवेक मर जाता है
क्यों छिपकर वार कराता है
इमरान अब पछताता है
जेनेवा कन्वेंशन की आड़ में
शांति के कबूतर उड़ाता है | 

छल कपट अब तुम्हारा नहीं चलेगा,
नया भारत तुमसे अब ऐसे निपटेगा,
तुम कश्मीर का राग अलापते रहो,
हम समूचे विश्व को नापते रहें |

कहते हो नया पाकिस्तान बनाएँगे 
पर पुरानी हरकतों से बाज नहीं आएँगे
दर दर झोली फैलाएंगे
पर दहशतगर्दी फैलाएंगे |

तुम विषवमन यूँ ही करते रहो
हम फन तुम्हारा कुचलेंगे,
अबकी ना सऊदी आएगा,
ना चीन तुम्हें बचा पाएगा
71 में तुम्हारे दो टुकड़े किए थे
अबकी लाहौर में भारत का तिरंगा लहराएगा | 

Friday, 22 February 2019

नामवर सिंह - स्मृति शेष

"हज़ारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी पे रोती है

बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा |" 

नामवर जी का हिंदी आलोचना,और साहित्य में क्या योगदान रहा है इस पर हिंदी के तमाम विद्वान उन्हें याद करते हुए श्रद्धांजलि दे रहे हैं |
मैं सिर्फ नामवर जी से अपनी मुलाकातों को इस ब्लॉग के जरिये आप सबसे साझा कर रहा हूँ |
                                                              अरे ये चेहरा तो बिलकुल जाना पहचाना लग सा रहा है,सर अगर मैं गलत नहीं हूँ तो आप शायद नामवर सिंह हैं ? सामने बैठे शख्स ने नजरें उठाई और हल्की मुस्कान बिखेरते हुए कहा,हम्म्म | सर अख़बारों,पत्रिकाओं में आपके लेख और आलोचनाएं पढ़ता रहता हूँ,अच्छा |
हमने करीब 3,4 मिनट बातचीत की | उस समय मैं एक छोटी डायरी लेकर चला करता था,जो मैंने उनके सामने बढ़ा दी,सर ऑटोग्राफ,अरे मेरा ऑटोग्राफ क्या लोगे ? मैं कोई सेलेब्रिटी हूँ ? सर मेरे लिए तो आप हैं,फिर उन्होंने मुझे ऑटोग्राफ दिया जो मेरे अब तक के जीवन का पहला और अंतिम ऑटोग्राफ है |
                                                              यह वाकया है वर्ष 2005 का जब मैं पहली बार घर से कुछ दिनों के लिए दिल्ली आया था,और एक मित्र के साथ रोजाना साहित्य अकादमी की लाइब्रेरी जाया करता था,वहीं मुझे पहली बार हिंदी आलोचना के शिखर पुरुष नामवर जी से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था |
                                                                    वक्त का कारवां यूँ ही चलता रहा,जीवन की आपाधापी में समय गुजरता रहा | नामवर जी से दोबारा मिलने का मौका मुझे एक प्रोफेसर साहिबा के द्वारा मिला | बात मई 2016 की है,जब प्रोफेसर साहिबा ने मुझसे कि क्या तुम नामवर जी से मिलने जाना पसंद करोगे ? मैंने बिना सोचे हामी भर दी | रास्ते भर मैं सोचता रहा कि एक 90 साल के वयोवृद्ध साहित्यकार से क्या बातें हो सकती हैं,उन्हें कुछ याद भी होगा ? क्या वो बोल पाते होंगे,वगैरह वगैरह | खैर इन्हीं विचारों के साथ हम नामवर जी के कालिंदी कुंज वाले फ्लैट पर पहुंचे |
              हमें इस बात की कतई उम्मीद नहीं थी कि दरवाजा स्वयं नामवर जी खोलेंगे | लेकिन हमारे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब मुँह में पान की गिलौरी दबाए,हल्की सी मुस्कान लिए दरवाजे पर स्वयं नामवर जी थे,आइए | हम दोनों ने हिंदी साहित्य के उस पुरोधा के पाँव छूए,बैठिये मैं जरा पान लेकर आता हूँ  |                                                                                           बिस्तर,अलमीरा,सोफा जिधर नजर जा रही थी हर तरफ किताबें | उन किताबों पर नजर दौड़ाते हुए मैं सोच रहा था कि अगर नामवर जी,विधायक,सांसद या प्रशासनिक अधिकारी होकर सेवानिवृत जीवन जी रहे होते तब भी क्या उनके व्यक्तित्व में इतनी ही सादगी होती ?  आपलोग चाय लेंगे ? नहीं सर बस आप बैठिए ना | फिर उनसे बातों का सिलसिला शुरू हुआ | साहित्य,समाज,समकालीन राजनीति तमाम मुद्दों पर हमें उनके विचार जानने का सौभाग्य प्राप्त हुआ | वो बहुत स्थिर से धीरे-धीरे बात कर रहे थे और सबसे बड़ी बात इतनी उम्र के बावजूद उन्हें देश-दुनिया के तमाम ताजा हालातों की पुख्ता जानकारी थी | प्रोफेसर साहिबा उन्हें अपने द्वारा संपादित कुछ किताबें और लेख वगैरह दिखा रही थीं और नामवर जी बड़ी पैनी नजरों से उनकी आलोचनात्मक त्रुटियाँ बता रहे थे |
                      सर हम चाहते हैं कि आपका 90 वां जन्म दिन मनाएं,प्रोफेसर साहिबा ने नामवर जी से मुखातिब होते हुए कहा | अरे अब क्या जन्म दिन,आजकल बाहर निकलना नहीं के बराबर होता है,कुछ उम्र संबंधी समस्याएं भी हैं,बस अब तो कभी भी ऊपर से बुलावा आ सकता है | अरे नहीं सर अभी तो आप बिलकुल फिट हैं,अभी क्या हुआ है | प्रोफेसर साहिबा उनसे बातें कर रही थीं |
                                              जेठ की दुपहरी में एक शानदार मुलाकात के बाद हमने उनसे विदा लिया | उसके बाद 2017 के विश्व पुस्तक मेले में नामवर जी को देखा था | 19 फरवरी को जब उनके निधन का समाचार सुना तो मेरे जेहन में एक बात कौंधी कि गर नामवर सिंह 1959 में चंदौली का चुनाव जीत जाते तो वे बतौर जनप्रतिनिधि कैसे होते ये तो पता नहीं लेकिन हिंदी साहित्य को ऐसा नामवर ना मिलता | ॐ शांति 

Friday, 15 February 2019

तुम्हारी शहादत पर देश यूँ कब तक मौन रहेगा

तुम सीमा पर जान गँवाओगे,
शहीद कहलाओगे,
मुआवजे की घोषणा होगी,
तुम्हारे नाम पर गालियां,चौक,चौराहे होंगी
और हाँ सड़कों का भी निर्माण होगा,
तुम्हारी विधवा,बच्चे,बूढ़े माँ बाप का,
अख़बारों में फोटो के साथ नाम होगा
तुम वीरगति को प्राप्त हुए हो,
हे मातृभूमि के सजग प्रहरियों,
तुम्हारा यूँ ही गुणगान होगा !!
हम कैंडल मार्च निकालेंगे,
शब्दों से दुश्मन को रौंदेंगे,
तुम कफ़न में विदा हो जाओगे |
इधर तुम्हारी चिता जलेगी,
और हम
सबसे पहले कड़ी निंदा करेंगे
सबूतों दस्तावेजों का पुलिंदा इकठ्ठा कर पड़ोसी को थमाएंगे,
और आतंकवाद पर
पाक पाक चिल्लाएंगे,
कड़े कदमों के नाम पर हम राजदूत वापस बुलाएंगे,
अमेरिका के सामने गिड़गिड़ाएंगे,
लेकिन विश्व गुरु कहलाएंगे,
गाँधी के सच्चे अनुयायी का तमगा पाएंगे,
मानवाधिकारवादियों की प्रशंसा पाएंगे |
फिर कुछ दिनों में मौन हो जाएंगे,
आखिर हम विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक मुल्क हैं,
जिम्मेदार सहिष्णु,शांत,
हमारा तंत्र तुम्हारी शहादत पर ही कुलबुलाता है,
वो भी धीमी आंच पर क्योंकि,
हमने अपनी सीमाएं तय कर रखी हैं,
जैसे लक्ष्मण ने सीता के लिए खींची थी,
हम सीमा पार करना नहीं जानते,
चाहे हमारा कितना भी चीर हरण हो,
हम सिर्फ धमकाना जानते हैं,
उस युग में तो
राम और कृष्ण ने तुम्हारी रक्षा की थी,
इस युग में कौन करेगा ?
तुम्हारी शहादत पर देश यूँ कब तक मौन रहेगा 

Thursday, 14 February 2019

प्रेम चाहता हर कोई है,पर देना कोई नहीं चाहता

आज इंसान के पास वो तमाम आधुनिक सुख-सुविधाएँ मौजूद हैं,जिनकी किसी युग में कोई कामना कर सकता हो | इंसान अंतरिक्ष पर पहुंचा,चाँद पर कदम रखे,एवरेस्ट की ऊंचाइयों को छुआ,इन तमाम ऊंचाइयों को छूने और सुख सुविधाओं के रहते हुए भी लोग खुश नहीं हैं,हर कोई अधूरा महसूस कर रहा,हर तरफ कटुता,वैमनस्य,लोभ लालच,युद्ध | असल में आज सब कुछ होते हुए भी दुनिया में प्रेम कम पड़ रहा है,जो आज हर किसी की जरूरत है,जो पाना हर कोई चाहता है लेकिन देना कोई नहीं चाहता | 


प्रेम है क्या ?
यहाँ प्रेम के संबंध में शिव-पार्वती का एक बड़ा रोचक संवाद है
पार्वती शिव को गुरु मानकर एक शिष्या की तरह शिव से पूछती है,हे महादेव प्रेम क्या है ?
शिव:- सती के रूप में अपने प्राण त्याग जब तुम दूर चली गयी थी मेरा जीवन,संसार,मेरा दायित्व,सब निरर्थक और निराधार हो गया | हम दोनों के मिलन हेतु इस समस्त ब्रह्माण्ड का हर संभव प्रयास करना,षड्यंत्र रचना,इसका कारण हमारा असीम प्रेम ही तो है | तुम्हारा पार्वती के रूप में पुनः जन्म लेकर मेरे एकाकीपन और मुझे मेरे वैराग्य से बाहर निकालने पर विवश करना,और मेरा विवश हो जाना यह प्रेम ही तो है |
तुम जब मुझे चौसर में पराजित करती हो तो भी विजय मेरी ही होती है, क्योंकि उस समय तुम्हारे मुख पर आई प्रसन्नता मुझे मेरे दायित्व की पूर्णता का आभास कराती है | तुम्हें सुखी देख कर मुझे सुख का जो आभास होता है यही तो प्रेम है पार्वती |
                कुछ लोग अपने सपनों से प्रेम करते हैं,कुछ विचारों से,कुछ लोग शरीर के प्रेम को ही प्रेम कहते हैं |
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि प्रेम कभी शारीरिक नहीं हो सकता,हाँ यह उसकी बहुत छोटी सी तार्किक परिणति जरूर हो सकती है लेकिन इसे प्रेम नहीं कहा जा सकता | दरअसल प्रेम का सच्चा अर्थ पिघलने से है,खुद को मिटा देने से है | आपको अधिक प्रेम देना सीखना पड़ेगा,इस बात की परवाह या अपेक्षा किए बिना कि सामने से आपको क्या मिला है या मिलेगा | मतलब यह कि इस अवस्था में आने के लिए आपको राजाओं की तरह व्यवहार करना पड़ेगा,भिखारियों की तरह नहीं | क्योंकि अगर आप भिखारी बन प्रेम करेंगे तो आपका मन हमेशा सामने वाले से कुछ अपेक्षा करेगा क्योंकि आपकी अवस्था कुछ देने की नहीं है,इसलिए प्रेम करने उसे जीने और निभाने के लिए आपको राजाओं की तरह हमेशा उन्मुक्त भाव से देने को तत्पर रहना पड़ेगा |
दरअसल प्रेम विधा की तरह है,जिसे आप जितना बाँटेंगे उतना ही यह अंदर भरता जाएगा,यह सतत प्रक्रिया आपके अंदर जीवन पर्यन्त चल सकती है और तमाम त्याग करते हुए भी आप खुद को आनंदित और धनी महसूस करेंगे | अगर आपने प्रेम करते समय इस बात कि चिंता की कि कहीं यह घट तो नहीं जाएगा,तो समझिये आप प्रेम की पहली सीढ़ी चढ़ने में ही असफल हो गए,क्योंकि प्रेम मात्रा नहीं है यह गुणवत्ता है,जिसे आप जितना देंगे यह आपके अंदर उतना ही बढ़ेगा और रोक लेंगे तो स्वतः ही घट जाएगा | इस बात की प्रतीक्षा ना करें कि कोई आएगा और आपसे प्रेम मांगेगा,बस आप इसे बांटते चलें |
                                                     इस दुनिया में केवल प्रेम ही ऐसी चीज है जिसके लिए कोई पात्रता नहीं होती | गरीब हो अमीर हो,नादान हो बुद्धिमान,जवान हो वृद्ध हो,हिंदू हो मुसलमान हो,कहीं कोई पात्रता नहीं किसी योग्यता की जरुरत नहीं |
                 प्रेम धीमी आंच पर पकने वाला पकवान है | और जैसा कि सब जानते हैं कि धीमी आंच पर पका हुआ खाना बहुत जायकेदार होता है | लेकिन आधुनिक युग की समस्या दूसरी है | आज हर किसी को जल्दी है,प्रेम करने की,पाने की और चीजें जरा भी इधर उधर हुई नहीं कि दूसरे प्रेम में पड़ जाने की |
                                                            जहाँ बहुत अपेक्षाएं और उम्मीद है वहाँ प्रेम कभी दीर्घायु नहीं हो सकता,प्रेम को दीर्घायु बनाने के लिए आपको अपने अंदर की अपेक्षाओं को मारना पड़ेगा और इसे मारकर जो आप प्राप्त करेंगे वो अद्भुत होगा |
                  आजकल हर कोई अपनी मानसिक सुरक्षा की खोज में लगा हुआ है,सुख-सुविधा,साथ के लिए हर इंसान दूसरे पर निर्भर हो रहा | क्योंकि तकनीक की इस आधुनिक दुनिया में भी हर इंसान गहराई तक अकेला है,इसलिए तवज्जो पाने,प्रेम पाने,सहारा पाने को बेचैन रहता है | लेकिन समस्या ये है कि इस प्रक्रिया में हर कोई एक दूसरे पर हावी होने की फ़िराक में लगा है | फिर प्रेम कहाँ है ? तुम और मैं तथा हम और वे |
तो प्रेम का बड़ा मूल और शाश्वत भाव यह है कि प्रेम पाने के लिए बिना कोई उम्मीद पाले प्रेम दीजिए,बांटिए और हर क्षण,हर घड़ी उसे महसूस कीजिये,इसे अपनी ताकत बनाइए और इसी ताकत,ऊर्जा से प्रेम को जिएं |