ट्रंप की ज़िद और अमेरिका का साम्राज्यवादी हरम
आखिर ट्रम्प ने निकोलस को अपने साम्राज्यवादी हरम में जबरन बुला ही लिया | यह एक त्वरित और दुनिया को अचंभित करने वाला रक्तहीन ऑपेरशन था | पूरी उम्मीद है कि अब मादुरो की ख़ातिरदारी न्यूयॉर्क में ट्रम्प की देख रेख में होगी | इसमें खास बात यह रही कि साम्यवादी मादुरो को हथकड़ी पहनाए उस न्यूयार्क शहर में उतारा गया जहाँ कुछ दिनों पहले ही ट्रम्प के धुर विरोधी और घोर वामपंथी जोहरान ममदानी ने मेयर का पद संभाला है | ममदानी ने चुनाव के वक्त ट्रम्प को ये धमकी दी थी कि अगर वो न्यूयार्क आए तो उन्हें गिरफ़्तार किया जा सकता है | ख़ैर ट्रम्प ने ममदानी को ये दिखा दिया की तुम केवल इस शहर के मेयर हो, माँ बदौलत तो हम ही हैं |
अब चलते हैं इसके अन्य बड़े पहलुओं पर | अमेरिका से वेनेज़ुएला की दूरी लगभग 5 हजार किलोमीटर है लेकिन ये फासला और अमेरिकी सेनाओं द्वारा केवल दो घंटे में मादुरो की गिरफ़्तारी ऐसे हुई मानो लेमन सोडा हो कि ठर्र से खोला और फर्र से पी गए | क्या मादुरो को इस बात का इल्म नहीं था कि ट्रंप उन्हें ऐसे विदा करवाएंगे ? कोई विरोध, प्रतिरोध, हिंसा नहीं | क्या तानाशाह ( अमेरिका की नजरों में) इतने कमजोर होते हैं ? वो भी तब जब मादुरो 13 वर्षों से वेनेज़ुएला पर एकछत्र राज कर रहे थे |
चीन, रूस, ईरान उत्तर कोरिया, यूरोपियन यूनियन ने ट्रम्प के इस कदम ( इस कार्रवाई को अमेरिका की बजाय ट्रम्प इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि ये ट्रंप की निजी इच्छा थी कि न कि अमेरिकी कांग्रेस की) की राजनाथ सिंह की तरह कड़े शब्दों में निंदा की है | इन देशों द्वारा ये निंदा या गुस्सा निकोलस मादुरो, वेनेज़ुएला या लोकतंत्र के भविष्य को लेकर नहीं बल्कि वहाँ 303 अरब बैरल तेल के विशाल भंडार को लेकर है जिस पर कब्ज़ा कर डोनाल्ड ट्रम्प अपने चुनावी वादे के मुताबिक MAGA (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन) को सफलीभूत करने के और करीब आएँगे |
इस बार ट्रंप ने शायद अपने पूर्ववर्तियों जॉर्ज बुश और ओबामा से सबक लेकर अपनी सेनाओं को इराक और अफ़ग़ानिस्तान वाली गलतियाँ नहीं दोहराई | जहाँ अमेरिका ने सद्दाम हुसैन और तालिबान को हटा तो दिया लेकिन उनके हाथ कुछ आया नहीं सिवाय वैश्विक आलोचनाओं के | यह नहीं भूलना चाहिए कि ट्रंप राष्ट्रपति तो बाद में बने पर पहले वो कारोबारी थे | अब उनकी हर कार्रवाई के पीछे सीधे सीधे आर्थिक लाभ सर्वोपरि होता है जिसे कभी लोकतंत्र तो कभी अमेरिकी खतरों का नाम देकर अंजाम दिया जाता है |
दरअसल ये नया अमेरिका है जो घर में घुसकर तभी मारता है जब मारने की पूरी कीमत वसूल की जा सके | वरना क्या वजह है कि किम जोन युंग जैसा दमनकारी तानाशाह वर्षों से उत्तर कोरिया का भाग्य विधाता बना बैठा है | अगर ऐसा न होता तो अमेरिका सीरिया में बहुत पहले ही बशर अल असद के क्रूर शासन को कुचल देता | चूँकि सीरिया में अमेरिका की आर्थिक साम्राज्यवादी लिप्सा को पोषित करने वाली कोई ख़ास चीज नहीं थी इसलिए उसे ऐसे ही छोड़ दिया गया | ये अलग बात है कि असद के शासन का ख़ात्मा करने वाला अहमद अल शरा जो तालिबानी आतंकवादी था और जिसपर अमेरिका ने लाखों डॉलर का इनाम रखा था की बाद में वाइट हॉउस ने मेज़बानी की |
इन सबके बीच सवाल उठता है कि यूएन कहाँ है ? आज की तारीख़ में वो कागजों और संधियों से सिमटी ऐसी संस्था है जो न तीन में गिनी जा सकती है न तरह में | इस संस्था की महत्ता या सुरक्षा परिषद के विस्तार की बातें भारत जैसे देश ही करते हैं और अमेरिका जैसा मुल्क अपने हितों के लिए जब चाहे तब इसके कानूनों को रौंदता रहता है |
अमेरिका ने कहा है कि वो अब वेनेज़ुएला में नई या कहें कठपुतली सरकार की स्थापना तक शासन चलाएगा | तो फिर वहां का विपक्ष क्या करेगा ? इस साल की नोबेल शांति पुरस्कार विजेता ट्रंप की घोर समर्थक मारिया मचाडो क्या करेंगी | हालाँकि वहाँ के विपक्ष की इस बात के लिए दाद देनी पड़ेगी कि वो भले ही चुनावों में हारते रहे हों लेकिन कभी उन्होंने राहुल गाँधी की तरह दूसरे देशों में जाकर वोट चोरी, मादुरो की तानाशाही या लोकतंत्र का मुद्दा नहीं उठाया |
पुनश्चः
वेनेज़ुएला के बाद क्या अब क्यूबा का नंबर आएगा ? कम लोगों को पता है कि सीआईए ने फिदेल कास्त्रो को मारने के लिए 600 से अधिक बार नाकाम प्रयास किए | वैसे क्यूबा में कुछ है नहीं केवल ग़रीबी, भुखमरी और ढ़लान की ओर जाते साम्यवाद के | फ़िलहाल तो मादुरो का तेल निकालने के बाद अमेरिका वेनेज़ुएला का तेल निकालेगा ,,,,,,,,

धाराप्रवाह विश्लेषण 💦💦
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