बंगाल चुनाव: झालमुड़ी का जायका या मछली का दम?
कल पाँच राज्यों के चुनाव परिणाम आएंगे, लेकिन सबकी निगाहें बंगाल पर टिकी हैं। सवाल बड़ा है—'मोमता' रहेंगी या जाएंगी? क्या जन संघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी के राज्य में पहली बार 'कमल' पूरी ताकत से खिलेगा? दोनों पार्टियां स्ट्रांग रूम की पहरेदारी ऐसे कर रही हैं, जैसे ईरान 'होर्मुज' जलडमरूमध्य की कर रहा है। कल का सूरज यह तय करेगा कि बंगाल के आसमान में 'जय श्री राम' की गूँज होगी या 'जय बांग्ला' का शंखनाद। संघ की खामोश तपस्या और भाजपा का पसीना 'झालमुड़ी' का स्वाद बदल पाएगा या नहीं, यह बस चंद घंटों की बात है। सवाल गली-कूचों में तैर रहा है—दीदी का किला ढहेगा या दिल्ली की ताकत नबान्न (Secretariat) तक पहुँचेगी?
नैरेटिव की जंग: जीत और हार के अपने-अपने मायने
आज रात से ही टीवी चैनलों पर राजनीतिक विश्लेषकों की एक बड़ी फौज तैनात मिलेगी—तैयारी ऐसी, मानो किसी महायुद्ध का सीधा प्रसारण हो। आज रात से ही टीवी स्क्रीन पर ऐसे ग्राफिक्स तैरेंगे मानो कल काउंटिंग नहीं, बल्कि पानीपत का चौथा युद्ध होने जा रहा है। चिल्लाहटें बढ़ेंगी और हर आधे घंटे में बड़ा उलटफेर घोषित होगा। कल के नतीजों के बाद दो ही तरह के नैरेटिव सुनने को मिलेंगे |
यदि भाजपा जीती तो विपक्ष के तरकश से वही घिसे पिटे पुराने तीर निकलेंगे—लोकतंत्र की हार, संविधान खतरे में, ईवीएम हैक, और एक अकेली औरत को हराने के लिए सत्ता का दुरुपयोग। और यदि ममता जीतीं तो लोकतंत्र बच गया, चुनाव निष्पक्ष हुआ, झालमुड़ी पर मछली भारी, मीडिया में हेडलाइन चमकेगी—बंगाल की बेटी ने दिल्ली का गुरूर तोड़ा आदि आदि | और फिर 'खेला होबे' के शोर में लोकतंत्र की लंबी उम्र की दुआएं माँगी जाएंगी।
कांग्रेस और लेफ्ट: अस्तित्व की तलाश
कांग्रेस की स्थिति बंगाल चुनाव में न तीन में, न तेरह में वाली है। केरल और असम को छोड़ दें, तो बंगाल में उनके पास खोने को कुछ खास नहीं है। खाता खुल गया या दो-चार सीटें आ गईं, तो राहुल गांधी का गुणगान शुरू हो जाएगा, वरना प्रदेश अध्यक्ष तो बलि का बकरा बनने के लिए तैयार ही हैं। वहीं, लेफ्ट के अवशेष बंगाल में कहीं-कहीं वैसे ही नजर आ सकते हैं, जैसे डायनासोर के पदचिह्न—विलुप्त होने की कगार पर, पर अभी पूरी तरह खत्म नहीं।
असली कसौटी: एग्जिट पोल और आम आदमी
इस चुनाव में सिर्फ पार्टियों, नेताओं की नहीं, बल्कि एग्जिट पोल वालों की साख भी दांव पर है। लेकिन हकीकत यह है कि कल रात 8-9 बजे तक सारा शोर थम जाएगा। परसों से फिर वही आम आदमी की रोजमर्रा की जद्दोजहद शुरू होगी। संभवतः सिलेंडर के दाम बढ़ेंगे और 'सूत्रों के हवाले से' बिहार मंत्रिमंडल विस्तार की खबरें हेडलाइन बन जाएंगी।
पुनश्चः
परिणाम चाहे जो भी हो, इसमें कोई संदेह नहीं कि इस बार भाजपा के जमीनी कार्यकर्ताओं से लेकर शीर्ष नेतृत्व तक ने बंगाल की मिट्टी में खूब पसीना बहाया है। ऊपर से संघ का शांत पर गहरा जमीनी काम। मेरा अनुमान है कि बंगाल में झालमुड़ी चलेगा |
