चित्रा टॉकीज और देबू की झालमुड़ी
तीन-चार दिन पहले ट्विटर पर 'झालमुड़ी' ट्रेंड होते देखा, तो बरबस ही हंसी आ गई। राजनीति की गलियों में कब क्या वायरल हो जाए, कोई नहीं जानता। खैर चुनाव का माहौल है, तो ऐसी चीजें होती रहती हैं और रहेंगी। मोदी जी का अचानक उमड़ा झालमुड़ी प्रेम हो या विपक्ष की उन पर टिप्पणी, यह सब अपनी जगह है, लेकिन इस बहाने मुझे अपने क़स्बे (सुलतानगंज, भागलपुर) की पुरानी यादें ताजा हो गईं। आज मैं आपको यादों के झरोखे में मिलवाना चाहता हूँ हमारे क़स्बे के सिनेमा हॉल चित्रा टॉकीज और झालमुड़ी मास्टर देबू से।
चित्रा टॉकीज हमारे क़स्बे का गौरव कह लीजिए या मनोरंजन का एकमात्र साधन था | उस समय समाज में इतनी उन्मुक्तता या छिछोरापन नहीं था इसलिए उसे लवर्स पॉइंट नहीं कह रहा | 72 एमएम का पर्दा, मिथुन, गोविंदा,सनी देओल की फिल्मों का दौर | मुँह में गुटखा दबाई आधी भीड़ का सीटी और ताली बजाता उन्माद और इंटरवल पर देबू की झालमुड़ी | इंटरवल हुआ नहीं कि भीड़ देबू की दुकान की और दौड़ पड़ती थी |
जहाँ तक मुझे याद है मैंने पहली बार उसके यहाँ एक रूपये की झालमुड़ी खाई थी |कुछ समय बाद फिर दो रूपये की झालमुड़ी उस पर एक रूपये की अलग से प्याज और बेसन वाली कचरी | उसे खाने के बाद केवल पेट नहीं भरता था, बल्कि आत्मा को निर्वाण प्राप्ति का अनुभव होता था |
आज मल्टीप्लेक्स वाले दौर में जहाँ तीन चार सौ की टिकट और लगभग उतने की बड़े चाव से पॉपकॉर्न खाने वाली पीढ़ी जिन्हें भुट्टे का पता भी नहीं वो शायद उस दौर की एकल खिड़की की कहानियां अपने बड़े बूढ़ों से ही सुनते होंगे वो भी तब अगर संयुक्त परिवार में रहते हों तो |
चित्रा टॉकीज के बहाने देबू को याद करना उस दौर को याद करना है जब सिनेमा देखना महज मनोरंजन नहीं, एक उत्सव हुआ करता था। गेहुआं रंग, नाटे कद का, गठीला बदन और हमेशा काम में व्यस्त रहने वाले हाथ। उस वक्त भीषण गर्मी में, पसीने से तर-बतर देबू को झालमुड़ी बनाते देख कभी 'हाइजीन' का ख्याल नहीं आया—न देबू को, न खाने वालों को। शो शुरू होने से ख़तम होने तक देबू को सांस लेने की फुर्सत नहीं होती थी | उसके हाथ ऐसे चलते थे मानो गरीबों पर पुलिस का डंडा | वह 'हाइजीन' के उस दौर का आखिरी रसोइया था, जहाँ स्वाद, सफाई के सर्टिफिकेट का मोहताज नहीं होता था।
देबू का एक और शौक था—सोमरस। भीड़ थोड़ी कम होते ही देबू स्टील के ग्लास में ठंडा मतलब कोका कोला की तरह एक गिलास गटक जाता | और चखना वही उसके अपने हाथ की झालमुड़ी और फिर पूरी शिद्दत से काम में जुट जाता। 24 घंटे में कितनी बार गिलास उसके होठों तक पहुँचता इस बात का इल्म मुझे नहीं है |
सुबह 11 से रात 11 बजे तक चलने वाले चार शो के दौरान देबू के हाथ किसी मशीन की तरह चलते थे। देबू का हाथ कड़ाही पर नहीं, मानो वो स्वाद की कोई जादुई स्क्रिप्ट लिख रहा हो। उसका वह मिट्टी का चूल्हा और बड़ी सी कड़ाही आज भी आंखों के सामने है। 90 के दशक में सविता टॉकीज भी खुला, वहां भी झालमुढ़ी की दुकान थी, लेकिन देबू के स्वाद और उस अनुभव की बराबरी कोई नहीं कर सका। दरअसल "देबू की झालमुड़ी में सिर्फ मसाले नहीं थे, उसमें उस वक़्त मनोरंजन के एकमात्र साधन "सिनेमाई" जुनून का नमक-मिर्च घुला था।"
समय बदला और भारत के हर शहर क़स्बे की तरह एकल खिड़की चित्रा टॉकीज भी बंद हो गया | चित्रा और सविता टॉकीज पर ताले ने सिर्फ एक सिनेमा हॉल बंद नहीं किया, बल्कि उसने एक पूरी पीढ़ी के 'इंटरवल' को खत्म कर दिया। इसका तुरंत तो देबू पर असर नहीं पड़ा लेकिन बिना मनोरंजन, सिनेमा के लोगों ने जेठ की दोपहरी में देबू की दुकान पर जाना कम कर दिया |
धीरे धीरे क़स्बे में पिज़्ज़ा बर्गर मोमोस ने पांव ज़माने शुरू किये और झालमुड़ी उपेक्षित सा हो गया साथ ही देबू की आमदनी भी | जब दिल्ली रहने लगा तो उधर आना जाना कम हो गया था | एक बारी उधर से गुजरा तो उसकी दुकान नहीं दिखी | बग़ल के पान वाले से पता चला चला कि देबू अपनी झालमुड़ी का अनोखा स्वाद अपने साथ लेकर दुनिया छोड़ गया | देबू की झालमुड़ी आज भी उन गलियों में किसी पुरानी धूल जमी रील की तरह ज़िंदा है।
कुछ लोगों ने बताया कि उसकी पत्नी और बच्चे ने दूसरी जग़ह एक दुकान खोली है | अभी तक तो वहाँ गया नहीं पर अब शायद 4 मई को जाऊं | हो सकता है तब तक पूरे देश में बिहारी झालमुड़ी का चलन शुरू हो जाए | और बड़े होटलों के मेनू में भी ये शामिल हो जाए |
पुनश्चः
झालमुड़ी आज भी बिहार में बेहद लोकप्रिय है, लेकिन अफसोस कि यह एक 'अंडररेटेड' स्नैक बनकर रह गया है। ओवररेटेड लिट्टी-चोखा तो ब्रांड बन गया लेकिन झालमुड़ी आज भी 'आम बिहारी का पहला पियार है। आज भी हमारे कस्बे में 10 रुपये की झालमुढ़ी कई लोगों का पेट और मन दोनों भरती है। बंगाल चुनाव का नतीजा चाहे जो भी झालमुड़ी को मोदी जी के रूप में एक ब्रांड एम्बेसडर तो मिल ही गया है | जय बिहार जय भारत |
