Monday, 4 May 2026

फ़ाइलों का गुलाबी मौसम और एक पुल की 'आत्महत्या'

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 फ़ाइलों का गुलाबी मौसम और एक पुल की 'आत्महत्या'


सुना है कि उसकी तबीयत काफी अरसे से नासाज़ थी। लोग उससे मिलने जाते, उसकी तस्वीरें खींचते और उसे अनदेखा कर रौंदकर आगे बढ़ जाते। आखिरकार एक दिन उसके सब्र का बाँध टूट गया और बिना किसी को कोई तकलीफ दिए, वह खामोशी से गंगा की गोद में समा गया। 


वह अचानक नहीं गिरा था; गिरने से पहले उसने हुक्मरानों की चौखट पर बहुत गुहार लगाई थी। कई चिट्ठियों में अपना दुखड़ा रोया, अपनी जर्जर हड्डियों (सरियों) का हाल बताया, पर बहरे तंत्र ने एक न सुनी। अब प्रशासन कह रहा है कि उसने 'आत्महत्या' की है, इसलिए उस पर केस दर्ज होगा। यह विडंबना ही है कि तंत्र अपनी नाकामी छिपाने के लिए अब एक निर्जीव पुल पर साज़िश रचने का आरोप मढ़ रहा है। 


ख़ैर जब हिरण खुद मरने के लिए गोली के सामने आ सकता है तो पुल गंगा में क्यों नहीं समा सकता वो भी बिहार में | यहाँ तो उसके गिरने का समृद्ध इतिहास रहा है | 


एक ही दर्द की दो कहानियाँ

कुछ समय पहले उसका भाई भी इसी तरह गंगा में गिरा था; बेचारा आज तक उठ नहीं पाया है। वह चाहता था कि जब वह गिरे, तो शोर हो, चहुंओर चर्चा हो, ताकि भविष्य में किसी और की बलि न चढ़े, किसी को इस तरह गंगा में न समाना पड़े । पर उसकी यह आखिरी ख्वाहिश भी सियासत की भेंट चढ़ गई। इत्तेफाक देखिए, जिस दिन भाजपा ने 'गंगासागर' ( बंगाल) फतह किया, उसी दिन यह अभागा पुल गंगा में फ़ना हो गया। जब सत्ता की लहरें इतनी ऊंची हों, तो उस बेज़ुबान की सिसकियाँ सुनता भी कौन?

बंगाल को तारणहार तो मिल गया पर इन बेजुबान पुलों को कब मिलेगा | कब तक ये भरभराकर गिरते रहेंगे और बनाने वालों के घर भरते रहेंगे | 


कागजी सेहत और भ्रष्टाचार का पेट

कागजों में उसकी सेहत बहुत 'तंदुरुस्त' दिखाई गई थी। सरकारी बाबुओं का तर्क था— "अभी तो तुम जवान हो, तुम्हें कुछ नहीं होने वाला! जब तुम्हें बनाने वाले (एस.पी. सिंगला) को आज तक खरोंच नहीं आई, तो तुम्हारा बाल भी बाँका कैसे होगा?" शायद वे उसे बचाना भी नहीं चाहते थे, क्योंकि उसके वजूद के बहाने जो फंड आता, उससे न जाने कितने बाबुओं, माननीयों के चूल्हे जलते थे। 


भागलपुर की नई पहचान

कहते हैं भागलपुर को अब दो विशेष पहचान मिल गई हैं—एक 'उल्टा पुल' और एक 'टूटा पुल'। यहाँ टूटना ही शायद नियति है; क्योंकि जब तक कुछ पुराना टूटेगा नहीं, तब तक नए टेंडरों के जरिए 'घर' कैसे जुड़ेंगे?


जाते-जाते वह ढहता हुआ ढांचा अदम गोंडवी की ये अमर पंक्तियाँ छोड़ गया, जो आज के सिस्टम पर सबसे सटीक प्रहार हैं:


तुम्हारी फ़ाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है

मगर ये आँकड़ें झूठे हैं, ये दावा किताबी है

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