Friday, 17 April 2026

नीतीश कुमार भी दिल्ली चले गए

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                               आख़िरकार नीतीश कुमार भी दिल्ली चले गए 


थोड़ा लेट पोस्ट है तो इसमें कोनो बड़ा बात तो नहीं है ! बिहार में कौन चीज समय पर होता है ? पुल आराम से बनता गिरता है, स्कूल में मास साहब, सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर, विश्वविद्यालयों का सेशन, थानों में एएफआइआर, सारे सरकारी काम सब तो लेटे से होता और चलता आ रहा है | तो क्या सुशासन बाबू भी लेटे से दिल्ली गए ? मन से या बेमन से गए ? ये या तो सिर्फ वो जानते हैं या भाजपा | 

ख़ैर नीतीश कुमार दिल्ली चले गए और मुझे लगता है कि बेमन से ही गए होंगे मन से कौन बिहारी दिल्ली जाना चाहता है ! उनके जाने की ख़बर से अनेक मंत्री इतने मर्माहत हुए कि कैमरे पर आँसू नहीं रुक रहे थे | इतना तो बेटी की विदाई में भी नहीं रोए होंगे | लेकिन इतनी पीड़ा के बावजूद इस्तीफ़ा नहीं दिए | दें भी कैसे आख़िर नीतीश की छत्रछाया में फले फूले सत्ता से फेविकॉल की तरह चिपके लोग भला इस्तीफ़ा क्यों देने लगे | 

वैसे बिहारियों का दिल्ली आना या जाना कोई नई बात नहीं है | ये तो उनकी नियति है और बरसों से ये सिलसिला चलता आ रहा है | कुछ लोग हवाई जहाज़ से आते हैं पर अधिकांशतः ट्रेनों में भेड़ बकरियों की तरह पेट की ख़ातिर आते रहते हैं | शुक्र है दिल्ली में राज ठाकरे और स्टालिन जैसे नेता नेता नहीं हैं वरना यहाँ भी उन्हें ज़िल्लत झेलनी पड़ती | ख़ैर जब पेट की ख़ातिर अपने घर से निकल ही गए तो क्या इज्ज़त क्या ज़िल्लत | ये वो ही राजनीतिक रूप से जागरूक लोग हैं जो वोट देने भी बिहार जाते हैं | इस उम्मीद में कि अब शायद अपनी मिट्टी से पलायन न करना पड़े | हवाई जहाज वाले वोट देने नहीं जाते | उन्हें ज़रूरत भी नहीं है |


2005 के बाद ऐसा लगा था कि सुशासन के अश्वमेघ का घोड़ा बिहार में रुकेगा और फिर यहाँ विकास, निवेश, शिक्षा स्वास्थ्य एक साथ हमला करेंगे | लेकिन हर बीते दिनों के साथ उम्मीद धूमिल होती गई और विक्रमशिला,सीमांचल एक्सप्रेस, सम्पूर्ण क्रांति, गरीब रथ,जैसी ट्रेनों में दिल्ली जाने वालों की वेटिंग बढ़ती गई | लोगों का घरों से नाता टूटता गया और सुशासन बाबू धीरे धीरे दलितों को महादलित, पिछड़ों को अतिपिछड़ा बनाने की मुहिम में लगे रहे | और इस तरह बिहार पिछड़ेपन की जकड़न में और जकड़ता चला गया | 

दिल्ली में डबल इंजिन की सरकार बनने के बाद विकास फिर कुलाचें भरने को व्याकुल हो उठा | लेकिन वो दिल्ली से चलते हुए रास्ते में ही दम तोड़ देता | और बिहार में सिर्फ उसकी कहानी बचती | ऐसा नहीं था कि सुशासन बाबू को बिहार की बीमारी नहीं पता थी लेकिन उनका इलाज का तरीका ऐसा था मानो आग कश्मीर में लगी हो और पानी का छिड़काव कन्याकुमारी में किया जाए | जैसे पुल गिरा तो बनाने वाली कंपनी के बदले मंत्री बदल दिए गए | 

जरा सोचिये कि छठ पर्व में एक बिहारी लाख कोशिशों के बावजूद सिर्फ़ इस वजह से अपने घर नहीं आ पाता कि ट्रेन में उसे एक अदद कन्फर्म सीट तक नहीं मिली | ये हालत तब है जब देश के प्रधानमंत्री बिहार आकर डबल इंजन सरकार की हुंकार भरें और विश्व गुरु की तरह फिर दिल्ली निकल जाएं |

पर उनके शासनकाल में प्रशासन बेलगाम हुआ, भ्रष्टाचार आम हुआ, आम आदमी हलकान हुआ | 

ये सब चलता रहा और कुमार साहब चुनाव दर चुनाव जाति की माला को मजबूत कर यहाँ के मठाधीश बन गए | कभी मन बदला तो इधर उधर भी हो गए लेकिन कुर्सी नहीं छोड़ी | कागज़ी शराबबंदी ने तो बिहार में रिकॉर्ड ही बना दिया | यहाँ नई फैक्ट्रियां भले न खुलीं लेकिन देशी शराब की भट्टियां और सीमावर्ती राज्यों से पकड़ाने वाली अवैध शराब हर रोज अख़बार की सुर्खियां बनने लगीं | शासन, प्रशासन अदालतें सब शराबबंदी को रोकने में मशगूल हो गए | इधर सरकार का राजस्व रसातल में पहुँचता गया उधर नीतीश बाबू लोकप्रियता के आसमान पर पहुँच गए | 

पर आसमान कभी किसी का हुआ है क्या ? चिड़ियाँ कितनी भी ऊंचाई पर उड़ान भर ले दाना चुगने के लिए उसे ज़मीन पर ही आना पड़ता है | बाबू भी आ गए, चुनाव भी जीता गए पर कुछ समय बाद उन्हें पाटलिपुत्र से इंद्रप्रस्थ की ओर पलायन करना पड़ा | और पलायन तो बिहारियों की नियति है | अब शायद उन्हें इसका दर्द समझ में आए | पर हुजूर आते आते बहुत देर कर दी |

हमेशा की तरह लोग कह रहे कि नीतीश कुमार का सीएम कुर्सी छोड़कर जाना बिहार में एक युग का अंत है पर मैं कहता हूँ ये एक नए युग की शुरुआत हो सकती है और सेलेक्टेड सम्राट चक्रवर्ती सम्राट बन सकते हैं | बाकी तो जो है सो हइये है | जय बिहार 

उनके जाने पर जावेद अख़्तर की एक बहुत मौजूं पंक्तियाँ मुझे याद आ रही हैं "जाते जाते वो मुझे अच्छी निशानी दे गया उम्र भर दोहराऊंगा ऐसी कहानी दे गया" |   


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