मच्छर: इंसानियत का भिनभिनाता सच
वो बिना किराया दिए बरसों से हमारे ही घर में कुंडली मारकर बैठा है। पहले तो इक्का-दुक्का थे, फिर धीरे-धीरे उनका कुनबा बढ़ा और साथ में उनकी ज़रूरतें भी। उनका भोजन क्या है, यह तो नहीं पता, पर हमारा 'ख़ून' उनका प्रीमियम पेय ज़रूर बन चुका है। खैर, जब आज के दौर में इंसान ही इंसान का ख़ून पी रहा है, तो फिर मच्छरों से क्या ही शिकायत करना!
सब ठीक था, लेकिन हद तो तब हो गई जब उन्होंने हमारी रातों की नींद हराम करना अपना परम कर्तव्य समझ लिया, गोया हमने उनसे भारी कर्ज़ ले रखा हो। वक्त-बेवक्त अपनी उपस्थिति दर्ज कराना तो जैसे उनका शगल बन गया है। और सबसे शर्मनाक स्थिति तब होती है जब घर में मेहमान आते हैं। हम उन्हें दावत पर बुलाते हैं, और जाते-जाते वे अपनी जली-कटी जुबां से कहते हैं— "अरे, आपके यहाँ तो बहुत मच्छर हैं!" तो क्या मच्छरों के चक्कर में हम अपना घर बार छोड़कर चले जाएँ?
काश! उनमें इतनी तो शर्म बची होती कि जिनका ख़ून पीते हैं, कम से कम उनकी इज़्ज़त तो न उतारें।
हाल ही में तो उन्होंने धमकी भी दी है— "देखो भाई, हमें ये 'गुड नाइट' और 'ऑल आउट' वग़ैरह दिखाकर डराने की कोशिश मत करो। अब ये हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते। हमने इतने तरह-तरह के इंसानों का ख़ून चखा है कि अब हमारी इम्युनिटी बहुत मजबूत हो गई है। और तुम्हें क्या लगता है, हर किसी का ख़ून मीठा होता होगा? हमारी तो हर दिन जहरीले, दोगले, कमीने और ज़लील किस्म के लोगों से मुलाकात होती है। और हाँ, हम ख़ून पीने में तुम इंसानों की तरह कोई भेदभाव नहीं करते; हम तो सबको समान भाव से देखते हैं!"
...और अंत में, वे भिनभिनाते हुए बोले:
"सच तो यह है कि तुम इंसानों ने हमें अपना 'गुरु' मान लिया है। फर्क बस इतना है कि हम अपनी भूख मिटाने के लिए ख़ून पीते हैं, और तुम अपनी अनंत लोभ लालच की प्यास बुझाने के लिए। नैतिकता का पाठ हमें मत पढ़ाओ—आईना देखो, हम तो बस तुम्हारी भिनभिनाती हुई प्रतिच्छाया हैं, जो शोर मचाते हुए तुम्हारा असली चेहरा दिखा रही है।"
