बिहार में कब ख़तम होगी कागज़ी शराबबंदी ?
बिहार में शराबबंदी भगवान की तरह हो गई है—दिखती कहीं नहीं, लेकिन कण-कण (और हर जगह) में मौजूद है।"
घोषणाओं से भरी नई नवेली बिहार सरकार का ख़जाना खाली है | ख़ाली मतलब एतना खाली कि अप्रैल मई में सरकार वृद्धा पेंशन भी नहीं दे सकी | रोज दर्जनों घोषणाओं हो रही हैं | यहाँ के पुलों में भी अब इमोशनल इंटेलिजेंस आ गई है—नेताओं की घोषणाओं का बोझ सुनते ही वे खुद-ब-खुद जलसमाधि ले लेते हैं। वैसे सरकार गिरने की अभी कोई संभावना नहीं है क्योंकि ये अमित शाह की देख रेख में अंबुजा सीमेंट से बनी है |
बिहार में घोषणाओं का मीटर इतनी तेजी से भाग रहा है कि बिजली का बिल भी शर्मा जाए, बस तिजोरी में करंट गायब है। घोषणा करने में कोई जीएसटी नहीं लगता और इसमें बिहार सरकार ट्रम्प को भी मात दे रही | जैसे डोनल्ड ने अब तक 49 बार ईरान से डील की डींगें हाँकी और हर घोषणा के बाद किसी न किसी तरफ़ से मिसाइल गिरे | मतलब जब तक मसाइल हल न हो मिसाइल मारते रहिये | खैर ट्रम्प इ नौटंकी के बाद दो चार पैग मार लेता होगा लेकिन बिहार में ? मतलब यहाँ क्या कैसे | झारखंड या बंगाल का | अरे भाई बिहार को भी तो आत्मनिर्भर बनाइये |
यहाँ जो भी जैसे भी हो रहा है उसके तार दिल्ली से जुड़े हैं | डबल इंजिन की सरकार में आगे वाला इंजिन तो दिल्लीये में न है इसलिए | अभी अभी चक्रवर्ती सम्राट ने बिहार में विकास के अश्वमेघ यज्ञ के लिए हस्तिनापुर से मात्र 18,000 करोड़ का स्वैछिक दान माँगा है | मोदी चाहें तो इससे ज्यादा भी दे सकते हैं | लेकिन इससे होगा क्या, क्योंकि
अब तो उतनी भी मयस्सर नहीं सरकार के ख़जाने में
जितनी छूट जाया करते थे एक ज़माने में |
यहाँ तो वैसे भी ढेले भर का राजस्व नहीं है | कब तक दान से अश्वमेघ यज्ञ चलेगा | तो बात घूम फिरकर फिर आ जाती है कि कागजों में लिपटी शराबबंदी को अनावृत कीजिये | बहुत सारे सभासद दबी जुबां से ये कहने लगे हैं कि कब तक चोरी छिपे खुशियों की होम डिलीवरी होती रहेगी | बिहार में कागजी शराबबंदी के कारण सरकार को हर साल हजारों करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हो रहा है, जबकि 'होम डिलीवरी' के जरिए समानांतर अर्थव्यवस्था धड़ल्ले से चल रही है। कंठ और ख़जाना दोनों सूख रहा है, कुछ कीजिये सम्राट | लेकिन चचा नाराज़ हो जाएंगे | फ़ौरन हस्तिनापुर से पाटलिपुत्र आ जाएंगे | और सम्राट को गद्दी छोड़नी पड़ेगी |
पर एक उपाय है जिसपर शायद जोर शोर से चिंतन मंथन भी चल रहा हो | बिहार को ममतामयी छांव में ले लीजिये | लेकिन ममता की छांव तो सिर्फ़ अभिषेक तक सीमित रह गई | नहीं नहीं "अमित शाह के जुनूँ का नतीजा ज़रूर निकलेगा इसी सियाह समुंदर से नूर निकलेगा |"
दो फूल के चुनाव चिन्ह पर जीते ममता के सिपाहियों ने विद्रोह का झंडा बुलंद कर दिया है | वो आतुर हैं कमल का फूल पकड़ने को | बस इंतजार है हरी झंडी का | वो इधर आए तो आत्मनिर्भर का नारा देने वाली भाजपा खुद आत्मनिर्भर हो जाएगी और चचा अप्रासंगिक | क्योंकि एक बार चचा की बंदिश ख़तम हो गई तब ही ख़तम होगी बिहार में कागज़ी शराबबंदी | फिर तो चचा विद्रोह भी नहीं फूला पाएंगे क्योंकि ममता का हाल देख लिया और दूसरे यहाँ निशांत सम्राट की निगेहबानी में जो है |
तो कीजिये कुछ दिनों का इंतजार फिर झूमेगा अपना बिहार | अभी तो दारु की तलाश में बाहर जाता है, शराब शुरू होने के बाद सिर्फ पेट की ख़ातिर जाएगा |
