ब्रेकअप का अर्थशास्त्र
वह जीवन में आई थी एक स्टार्टअप की तरह,
उसकी बातों में शहद था और लहजे में बिजनेस प्लान
वह दिखाने आई थी ख्वाबों का कोई ब्लूप्रिंट महान।
भरोसा दिलाया उसने एक शानदार रिटर्न का,
मैंने भी भविष्य देख, भावनाओं का निवेश कर दिया।
चल निकला हमारा स्टार्टअप, होने लगी चर्चा,
दुनिया देखने लगी हमारे टाई-अप का जलवा।
जब पहुंचे हम एक मुकाम पर, तो सोचा IPO ले आएं,
इस साझेदारी को अब एक नया नाम दें।
उसने ही तय की वैल्यू, उसे समझ थी बाज़ार की,
नफ़े-नुक्सान के तराज़ू में, माहिर थी मोहब्बत के व्यापार की।
जब कभी हमारे रिश्तों में मंदी का दौर आता,
वो फौरन अपनी इमोशनल लिक्विडिटी खींच लेती,
ताकि उसकी डिमांड हमेशा बनी रहे।
अजीब दौर था वो
उसकी मांगें इन्फ्लेशन (मुद्रास्फीति) की तरह बढ़ती रही,
और मेरी सप्लाई घुटने टेकती रही।
कई बार संबंधों में मुद्रास्फीति (Inflation) भी आई,
उसकी बेतहाशा मांगें, और मेरी गिरती हुई आपूर्ति।
वह बनना चाहती थी एक विकसित अर्थव्यवस्था,
और मुझे बस एक सस्टेनेबल ग्रोथ की तलाश थी।
उसने प्रॉफिट का झाँसा दिया
मैं उसमें फसता चला गया
फिर एक दिन उसने खुद का अवमूल्यन (Devaluation) किया,
मुझ पर बाज़ार की समझ न होने का आरोप मढ़ दिया।
साझेदारी तोड़ दी, जैसे कोई दिवालिया (Bankrupt) फर्म हो,
तर्क दिया कि मेरा साथ अब उसके लिए प्रॉफिटेबल नहीं।
उसने अपनी कम्फर्टेबिलिटी के हिसाब से 'इक्विटी' समेटी और मुझे लिक्विडेट कर दिया,
किसी नए मर्जर की खातिर, रिश्ता टर्मिनेट किया।
सुना है अब किसी टैक्स-फ्री आइलैंड में उसने अपनी पूंजी जमा की है,
और मैं इस मंदी के दौर में, दिल के बेलआउट पैकेज के इंतज़ार में बैठा हूँ।
