Wednesday, 6 May 2026

विकास का वृद्धाश्रम

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 विकास का वृद्धाश्रम


गाँव की वह पुश्तैनी हवेली, बाप-दादाओं के पसीने से सींची हुई थोड़ी ज़मीन और इकलौता बेटा—यही उसकी दुनिया थी। माँ ने अपनी आँखों के सपनों को बेटे की किताबों में बो दिया और उसे पढ़ने के लिए शहर भेजा। आर्यन पहली बार शहर की चकाचौंध से मिला, तो गाँव की धूल उसे अपनी साख गिराती हुई लगने लगी। उसे लगा गाँव की वह 'नीरव शांति' दरअसल 'मरघट का सन्नाटा' है। उसे कोलाहल चाहिए था, क्योंकि उसके भीतर की महत्वाकांक्षाएँ खुद शोर मचा रही थीं।


आर्यन जो "प्रोग्रेस" की तलाश में शहर गया था ताकि वह बड़ा आदमी बन सके—इतना बड़ा कि उसे अपनी जड़ें 'कबाड़' और गाँव की ताज़ी हवा 'पिछड़ापन' लगने लगी।


इधर गाँव भी चुपचाप बदल रहा था। उसे भी शहर बनने की जल्दी थी। खेतों के सीने पर तारकोल की सड़कें बिछने लगी थीं। जमीन के फेफड़े चीरकर हाईवे निकल रहे थे। पुराने नीम, बरगद, पीपल के पेड़ों की जगह अब चमकीले बिलबोर्ड्स थे, जिन पर मुस्कुराती मॉडल्स 'मसाला पिज्जा' बेच रही थीं। और गांव के इस 'विकास' का सबसे बड़ा गौरव था—"स्वर्ण युग वृद्धाश्रम"। इसका उद्घाटन एक ऐसे मंत्री ने किया था, जो खुद अपने माता-पिता की पुण्यतिथि पर ट्वीट करना नहीं भूलते थे। गाँव के चौक पर एक चमचमाता साइनबोर्ड लग गया था—"ममता केयर: यहाँ बुढ़ापा उत्सव है"। विडंबना देखिए, जिस समाज ने 'अनाथालय' बनाए थे, वही अब गर्व से 'वृद्धाश्रम' बना कर इसे विकास का नाम दे रहा था।


गाँव में अस्पताल बाद में बना और 'वृद्धाश्रम' पहले। दरअसल गाँव अब न गाँव रहा, न शहर; वह 'त्रिशंकु' की तरह अधर में लटका एक श्रापित सपना बन गया था।


आर्यन की पढ़ाई पूरी हुई, नौकरी लगी और उसे ऑफिस की एक आधुनिक लड़की, तान्या से उसे प्रेम हो गया। वह 'इन्क्लूसिव' और 'ओपन-माइंडेड' थी, बस उसके माइंड में सास के लिए जगह नहीं थी। जब दोनों ने शादी कर ली, तब गाँव खबर पहुँची। माँ स्तब्ध थी—"बेटा, तूने बताया तक नहीं?" आर्यन का जवाब संक्षिप्त और यांत्रिक था—"सब इतनी जल्दी हुआ कि क्या बोलूँ।"


तान्या आधुनिक थी, पर उसके 'नारीवाद' की परिभाषा में सिर्फ 'स्व' का स्थान था। उसे किसी का दखल या मर्यादा की लकीरें पसंद नहीं थीं। आर्यन उसके प्रेम में ऐसा डूबा कि उसे माँ की ममता की गहराई दिखनी बंद हो गई। शहर के फ्लैट की ईएमआई और स्टेटस के बोझ ने उसे पूरी तरह जकड़ लिया था।


"एक बार गाँव चलें माँ से मिलने?" आर्यन ने झिझकते हुए पूछा।

"क्या तुम्हारा दिमाग खराब है?" तान्या बिफर पड़ी। "गाँव कोई भागा नहीं जा रहा, और माँ अभी मरी नहीं जा रही हैं। हमें अगले हफ्ते उस पॉश लोकेशन वाला फ्लैट फाइनल करना है। अपना स्टेटस भी तो देखो!"


शहर में तान्या को फ्लैट का किराया देने में 'नारीवाद' का अपमान महसूस होता था। उसने ब्रह्मास्त्र निकाला—"हमें अपना स्टेटस मेंटेन करना है। इस किराये के डब्बे में रहकर मैं घुट रही हूँ।" उसने सिसकते हुए कहा—"क्या हम पूरी ज़िंदगी इस रेंटेड होल में बिताएंगे? तुम्हारे गाँव की वह खंडहर हवेली किस काम की?" आर्यन को बात समझ आ गई। उसने ममता का सौदा 'स्क्वायर फीट' में कर लिया।


पेड़-पौधे, खेत-खलिहान, सब पड़े हैं अब सुनसान,

बस इसी ज़िद के पीछे—कि शहर में हो एक अपना मकान।


दोनों गाँव पहुँचे। माँ की बूढ़ी आँखों में दीवाली उतर आई। उसे लगा बहू-बेटा रहने आए हैं। बहू 'पाँव छूने' आएगी, पर तान्या तो हवेली के 'कार्पेट एरिया' को अपने जूतों से नाप रही थी। उसे नक्काशी में पूर्वजों की यादें नहीं, बल्कि 'एंटीक वैल्यू' दिख रही थी। रात को उसने आर्यन से कहा—"यह हवेली तो गोल्ड माइन है! इसे बेचो और माँ को उस नए वृद्धाश्रम में शिफ्ट कर दो। सुना है वहां वाई-फाई भी है, माँ आराम से भजन सुन पाएंगी।"


आर्यन ने एक पल को झिझक कर पूछा—"पर माँ वहां अकेले...?" वह बुदबुदाया—"पर माँ ने तो कभी हमें अकेला नहीं छोड़ा..."

तान्या ने पलटकर कहा—"तभी तो आज हम यहाँ हैं! अब उन्हें 'स्पेस' दो। वह वहाँ अपनी आज़ादी एन्जॉय करेंगी।"

उसने कटाक्ष किया—"अकेले कहाँ? वहां उनके जैसे 'रिटायर्ड' लोग होंगे। और वैसे भी, हम उन्हें 'वीकेंड' पर वीडियो कॉल कर लेंगे। डिजिटल इंडिया है जी!"


फैसला हो गया। हवेली बिक गई। माँ को 'आधुनिक सुविधाओं' वाले उस वृद्धाश्रम में छोड़ दिया गया |  माँ को लगा कि बेटा खुश है क्योंकि उसने शहर में घर ले लिया है। आर्यन खुश था क्योंकि तान्या के चेहरे पर पॉश कॉलोनी में फ्लैट की मुस्कान थी। 


शहर में नए फ्लैट की पार्टी हुई। शैंपेन के गिलास टकराए। आर्यन मेहमानों को बता रहा था—"गाँव अब पिछड़ा नहीं रहा। वहां भी 'मॉडर्न इंस्टीट्यूशन्स' (वृद्धाश्रम) खुल गए हैं। वह 'आधुनिक वृद्धाश्रम' के फायदों का बखान कर रहा था। माँ वहां बहुत 'इंडिपेंडेंट' महसूस कर रही हैं।"


पार्टी ख़त्म हुई। नए घर की बालकनी से आर्यन आसमान को देख रहा था। उसे लगा वह बहुत ऊंचा उठ गया है, पर वह यह भूल गया था कि जड़ें कटने के बाद पतंग कुछ देर ही हवा में लहराती है, फिर सीधे 'कचरे के ढेर' पर गिरती है।


वृद्धाश्रम के बाहर गेट पर लिखा था—"अपनों से दूर, अपनों के बीच"—यह शायद इस सदी का सबसे बड़ा और क्रूर मज़ाक था।


मिट्टी बेच दी, यादें बेच दीं, शहर में नाम करने को,

माँ को घर से बाहर किया, बस एक मकान अपने नाम करने को।

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