Mirzapur The Movie गद्दी, बाहुबल और बकचोदी: क्या बड़े पर्दे पर जम पाया कालीन भैया का भौकाल?

 Mirzapur The Movie गद्दी, बाहुबल और बकचोदी: क्या बड़े पर्दे पर जम पाया कालीन भैया का भौकाल?

गद्दी न तो विरासत से मिलती है न सियासत से --- मिलती है तो सिर्फ और सिर्फ बाहुबल से और टिकती है डर से | अखंडानंद को पर्दे पर देखकर असीम आनंद की अनुभूति होती है और इसी दिव्य भव्य और आनंदित आवाज से फ़िल्म की शुरुआत होती है | बहराइच के बाहुबली को कालीन भैया स्वर्ग लोक के दर्शन करवाते हैं उधर उसके बेटे को गुड्डू और बबलू पंडित टपकाते हैं | ई मिर्जापुर का पहला सीन है | 


फिर बकचोदी से ओत प्रोत बिगड़ैल मुन्ना भैया स्क्रीन पर आते हैं | धीरे धीरे स्वीटी, गोलू, वकील साहब, गुड्डू की माँ, बहिन सब दिखेंगे | मतलब सिर्फ दिखेंगे क्योंकि ई सब न भी दिखते तो घंटा कोई फरक नहीं पड़ता | हां मम्मी यानी शीबा चड्डा के हिस्से में दो तीन दमदार सीन आए हैं | और फिर त्रिपाठी खानदान के बुजुर्ग, रसिक लेकिन दमदार, मटन प्रेमी बाबूजी और भाभी जी यानी कुलभूषण खरबंदा और रसिका दुग्गल के अलावा जे पी यादव, उसकी रखैल, रति शंकर शुक्ला,उसका बेटा, मकबूल और बब्बन की माशूका मुमताज़, कम्पाउंडर भी स्क्रीन पर दिखते जाते हैं | फिर एंट्री होती है बबुआ उर्फ बब्बन यानी रवि किशन की | 


स्टार इंट्रो सब तो हो गया, अब ज़रा फ़िल्म ( Mirzapur The Film) के समीक्षात्मक पहलू और कलाकारों पर आते हैं। फ़िल्म को बिल्कुल अपने व्यापार की तरह कालीन भइया (पंकज त्रिपाठी) मुन्ना और गुड्डू थाम रखे हैं | बड़ी डील में गुड्डू (अली फ़जल) और बकौल अखंडानंद उसके विशुद्ध चूतिये पुत्र मुन्ना भी बहुत हद तक स्क्रीन पर अपनी धाक जमा  जाते हैं | मुन्ना और जे पी यादव का सीन जिसमें मुन्ना, जरीना से कहता है कि तुम इस गंदी शक्ल वाले आदमी के साथ सोती कैसे हो ? इस फिल्म के कुछ शानदार सीन और संवाद अदायगी में शुमार है | 

कहीं कहीं ओवर एक्टिंग करते दिखता बब्बन यादव ( रवि किशन) जो कि गुड्डू के हाथों अंत में मोक्ष को प्राप्त हुआ साला बिना चश्मे के सीन में आता ही नहीं है | भौकाल अच्छा दिखा है लेकिन कुछ दृश्य में वो इर्रिटेट करता है | मतलब उन दृश्यों को हटा दिया जाए तो फिल्म की लंबाई भी कम होगी जो कि तीन घंटे 16 मिनट है और उतनी बोरियत भी महसूस नहीं होगी | 

मतलब बात मिर्जापुर में हो रही और अगले ही पल साला बबुआ जैसलमेर में दिख जाता है | या यूँ कहें कि डायरेक्टर उसको वहाँ दिखाता है | हम यहाँ थोड़े से चूतिया टाइप फ़ील किए कि साला ऐसे कौन सीधे कश्मीर से कन्याकुमारी का प्लॉट दिखा देगा | फिर इसी में एक डायलॉग कि "व्यापर हमारे हिसाब से चलता है हम व्यापार के हिसाब से नहीं" मतलब डायरेक्टर जो और जैसे दिखाना चाहेगा दिखाएगा भौंसड़ी के तुमको देखना है तो देखो | अब पैसा लगा के देखने आए थे और जितने का टिकट लगभग उतने का फ्रेंच फ्राई भी खाए थे तो देखना तो पड़ता ही | 

अच्छा भाभी जी का प्रेमी बिरजू लोहार कहाँ से टपक गया | सीरीज में तो वो नौकर के साथ अंतरंग सीन में दिखती थी | रहता वो जैसलमेर में है तो क्या सिर्फ बीना त्रिपाठी से मिलने मिर्जापुर आया था और काम करके चला गया | मतलब बनाए हो तो कहीं भी कुछ भी घुसेड़ दोगे | 

बबलू पंडित यानि पंचायत फेम वाले सचिव जी ( जितेंद्र कुमार) को देखकर बेहद निराशा होती है | साला गुड्डू पंडित का भाई इतना कमजोर, मरियल सा दिखता है | ऐसा लगता है कि बबलू अभी भी एमबीए की तैयारी और रिंकी के सोच में डूबा हुआ था और उसे जबरन फुलैरा से मिर्जापुर में घुसा दिया गया | कहाँ विक्रांत मेसी और कहाँ जितेंद्र कुमार कोई तुलना ही नहीं है | 

बाबूजी जितना काम सीरीज में करते दिखे थे उससे थोड़े कम में इन्हें यहाँ निपटाया गया यानी शेर शेरनी को टीवी पर पर संभोगित होते देखना और अपने खानदान के वारिस की ख़ातिर बहु के साथ जबरन संभोगित होना | बाकी किरदारों का रोल इतना छोटा और साधारण है कि उस पर समय और स्याही क्यों ही जाया किया जाय | 

Mirzapur The Film बड़ी स्क्रीन पर देखकर लगता है कि साला सीरीज में तो ई सब मर गया था फिर कौन सी संजीवनी बूटी पीके सब जिंदा हो गए बे | यहाँ आपको दद्दा त्यागी, उसके दोनों बेटे, गोलू के पप्पा ई सब नहीं देखेंगे | सीरीज में मरे तो ई सब भी थे, तो दिमाग पर गुड्डू भैया की तरह ज्यादा जोर नहीं लगाना है बस देखने जाना है | सीरीज में हर दूसरा सीन पहले से जुड़ा हुआ है | सस्पेंस भी है यहाँ आपको ई सब नहीं मिलेगा | 


प्यार था बाबूजी हमेशा थोड़े न रहता है | अब मैं त्रिपाठी खानदान की बहू हूँ |  त्रिया चरित्रं, पुरुषस्य भाग्यम्, देवो न जानाति कुतो मनुष्यः | भाभी जी ने आखिरी वाले इस सीन में अपने प्रेमी बिरजू लोहार की जान लेकर सीन में जान डाल दी | और बाबूजी का व्हीलचेयर ओह्ह भाई ऊ तो कमाले है | अब इससे ज्यादा डिटेल के लिए तो हॉल जाना पड़ेगा | और हाँ अगर आपने सीरीज नहीं देखी है तो ठीक ही क्योंकि वो देखने के बाद फिल्म देखने पर ऐसा लगेगा जैसे रसमलाई खाने के बाद बूंदी का लड्डू खा रहे | और ई लड्डू साला ऐसा है कि खाए बिना रह भी नहीं सकते | 

जाइये अपने लिए नहीं तो कम से कम कालीन भैया का शानदार काम देखने के लिए | हम तो आपलोगों को बताने के लिए देखे और एक गलती फ्रेंच फ्राई लेकर कर दिए | फ़ोटो में दिखेगा और पता चलेगा कि मल्टीप्लेक्स वालों ने लूटने के मामले में एयरपोर्ट को कोसों पीछे छोड़ दिया है | आप ई गलती मत कीजिएगा | 

अब सवाल ये कि क्या फिल्म भी तीन-चार पार्ट में बनेगी ? जरूर बनेगी , क्योंकि बबलू को डील के बाद भी कालीन भैया ने बहराइच की गद्दी नहीं दी | ऊ ठगा महसूस कर रहा | दूसरा न तो कालीन भैया के साम्राज्य को कुछ हुआ न गुड्डू, बबलू को बस जे पी यादव और रति शंकर का सपना टुटा | कोई बात नहीं जो डायरेक्टर इतना कुछ तोड़ मरोड़ सकता है ऊ अगले में तो जोड़ ही लेगा | मनमर्जियां है उसकी | तो मिर्जापुर पार्ट 2 जरूर आएगा |  

और हाँ कुछ लोग कहेंगे कि फिल्म के रिव्यू में गाली-गलौज काहे डाले हो तो भाई ऐसा कि हम मिर्जापुर का रिव्यू लिखे हैं मदर इंडिया का नहीं | 

चलते चलते 

इतना लिखने के बाद अब रेटिंग भी देना पड़ेगा तो हम 5 में से 3 देंगे | और हाँ अवध बोझा, फैजलबा ई सब तो फर्स्ट डे फर्स्ट शो देखा होगा | आखिर बच्चों को चूतिया बनाने उन्हें कुछ बताने के लिए इन चुतियों के प्रिय पात्र को देखना तो पड़ेगा | 






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