नाना पाटेकर: अभिनय की पाठशाला का क्रांतिवीर
आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने
नहीं नाना, हम तो आपकी और फ़िल्में देखने की ख्वाहिशें पाले बैठे थे, पर नियति को शायद ये मंजूर नहीं था |
आज सुबह जब आंख खुली तो एक चिड़ियाँ (ट्विटर) से पता चला कि मौत नामक परिंदे ने मल्हार का अपहरण कर लिया | तिरंगा का इंस्पेक्टर वागले रातों रात ख़ामोशी से 9 2 11 हो गया
मौत के बाद जिंदा कौन रहता है
रहता है न
10 मिनट तक दिल
20 मिनट तक दिमाग
और चार घंटों के लिए आँखें
वो चार घंटों में आँखें जो
अपनों का रवैया देखती होंगी
उसके बाद मुर्दे को तो
मौत तोहफ़ा लगती होगी |
कितनी साफ़गोई थी आपकी इन बातों में! सच तो यह है कि अमिताभ बच्चन के बाद अगर सिने प्रेमियों को किसी के डायलॉग याद हैं, तो वे नाना पाटेकर थे। आप न विशुद्ध हीरो थे न विलेन, पर जब पर्दे पर आते तो लोग भूल जाते थे कि वो किसे देखने आए हैं। अभिनय की आपकी यह पाठशाला एक 'युगपुरुष' की तरह हमेशा जीवंत रहेगी।
नाना को पर्दे पर देखना ऐसा था मानो आसमान में इंद्रधनुष की अनोखी छटा। किरदार कोई भी हो, चाहे 'परिंदा' का अन्ना हो, 'क्रांतिवीर' का प्रताप या 'वेलकम' का उदय भाई—आप अपनी शानदार, वज़नदार संवाद अदायगी से उसमें जान डाल देते थे।
आपने अपने शागिर्दों को दीक्षा दी थी कि डरना मना है और आप जिए भी वैसे ही बेख़ौफ़, बेलौस। कभी अपनी जुबान पर अंकुश नहीं लगाया। 'यशवंत' के यशवंत लोहार बनकर आपने अपनी संवाद अदायगी से पर्दे पर कोहराम मचाया।
मुंबई की दिखावटी जिंदगी आपको रास नहीं आती थीं, इसलिए आप प्रकृति के बीच एक क्रांतिवीर की तरह सादगी से रहते थे। कभी राजनीति नहीं की, लेकिन जब पर्दे पर 'राजनीति' के भाऊ साहब बनकर उतरे, तो सत्ता के सारे मोहरे आपकी शक्ति के आगे पानी भरते नज़र आए।
रिश्वत न ली हो, तो ही हाथ लगाना क्योंकि अब 'गुलाम-ए-मुस्तफा' का उस लोक से हमेशा के लिए हो गया याराना। लेकिन आपकी ये बेबाक विरासत हमेशा अमर रहेगी।
हमारे बाद अब महफ़िल में अफ़्साने बयाँ होंगे
बहारें हम को ढूँढेंगी न जाने हम कहाँ होंगे
इसी अंदाज़ से झूमेगा मौसम गाएगी दुनिया
मोहब्बत फिर हसीं होगी नज़ारे फिर जवाँ होंगे
न हम होंगे न तुम होगे न दिल होगा मगर फिर भी
हज़ारों मंज़िलें होंगी हज़ारों कारवाँ होंगे |
भावपूर्ण श्रद्धांजलि ॐ शांति

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