दिल्ली एनसीआर की "BMW" लाइफ और वो 10 रुपये वाली गिल्ट ट्रिप
दिल्ली की "BMW" लाइफ और वो 10 रुपये वाली 'गिल्ट ट्रिप': एआई के दौर में एक कड़वा सच
अगर आप दिल्ली-एनसीआर में रहते हैं, तो आपने भी "BMW" का मज़ा ज़रूर लिया होगा। नहीं, मैं लग्जरी कार की नहीं, बात कर रहा हूँ दिल्ली की लाइफलाइन की: Bus (बस), Metro (मेट्रो) और Walk (वॉक) की |
मेट्रो के जाल ने बसों की ज़रूरत कम कर दी है, और छोटी दूरियों के लिए हमारे पास रिक्शा है—वो रिक्शा जो अब ई-रिक्शा के शोर में अपनी आखिरी साँसें गिन रहा है।
जब 'सरप्राइज' खुद एक इमोशनल राइड बन गया
पिछले रविवार, मैं टिनटिन' को सरप्राइज देने निकला। लेकिन उसे भनक लग गई। फोन करके पूछने लगा— "अरे तुम, दिल्ली से निकला या नहीं? कब पहुँचेगा?" अप्रैल की दोपहर थी, लेकिन धूप में वो तपिश नहीं थी। बादल सूरज की डिग्रियों के साथ खिलवाड़ कर रहे थे। जैसे ही मैं मेट्रो की सीढ़ियाँ उतरा, मेरा सामना तीन जोड़ी उम्मीद भरी आँखों से हुआ।
ये तीन अधेड़ उम्र के रिक्शा वाले थे। मुसीबत ये थी कि मैं उन्हें जानता था और वो मेरा पता ठिकाना। हम सब एक ही मिट्टी (बिहार) से थे। मैंने कभी उनका नाम या धर्म नहीं पूछा, क्योंकि सच तो ये है कि गरीब का सबसे बड़ा धर्म उसकी भूख होती है।
'बोहनी' का इंतज़ार और वो 'गिल्ट'
टिनटिन का घर मेट्रो से सिर्फ एक किलोमीटर दूर था। इन रिक्शा वालों के साथ मैंने सैकड़ों बार सफर किया है। इस छोटी सी दूरी में रास्ते भर उनके साथ अंगिका (छै-छा) में बातें होतीं—खेत, खलिहान, गाँव की राजनीति और पलायन का दर्द।
बातों-बातों में जब वो कहते, "दोपहर हो गई लेकिन अभी तक बोहनी (पहली कमाई) नहीं हुई है," तो कलेजा मुँह को आ जाता। मन में सवाल उठता—क्या इनकी हाड़तोड़ मेहनत,कर्म का कभी इनके भाग्य से मिलन होगा?
"घोयर कहिया गेलो छलहो?" (घर कब गए थे?)
जवाब मिलता— "हीन्हें धनकटनी म, ओकरो बाद तुरत भोट दय क आबि गेली हों… वहां कोनो कामो त नय छै।"
ये लोग हर चुनाव में वोट देने गाँव जाते हैं। इनकी उम्मीदें ज़ख्मी हैं, पर मरी नहीं हैं। इन्हें आज भी लगता है कि 'करन-अर्जुन' आएँ न आएँ, इनके 'अच्छे दिन' ज़रूर आएँगे।
एक अजीब 'मोरल क्राइसिस'
मेरे सामने एक अजीब संकट था: इन तीनों में से किस पर बैठूँ? अगर मुमकिन होता, तो मैं थोड़ा-थोड़ा तीनों रिक्शों पर बैठ जाता। मैंने एक को चुना। जब रिक्शा आगे बढ़ा, तो पीछे मुड़कर देखा—बाकी दोनों अपनी सीट पर बैठे मुझे देख रहे थे।
उस पल मैं सवारी नहीं, उनकी नज़रों में एक 'गुनहगार' था। मेरा गुनाह बस इतना था कि मैंने उन दोनों को नहीं चुना, जबकि पेट की आग उन तीनों को बराबर लगी थी।
एआई (AI) बनाम खाली पेट
आजकल हर तरफ चर्चा है कि AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) नौकरियाँ खा जाएगा। लेकिन जिन्हें ठीक से दो वक्त की रोटी भी मयस्सर नहीं है, उनका ये एआई क्या ही छीन लेगा? हम भविष्य की तकनीक की बातें कर रहे हैं, जबकि एक बड़ा तबका आज भी आज की 'बोहनी' के लिए संघर्ष कर रहा है।
सफर खत्म हुआ। मैंने उसे किराए के ऊपर 10 रुपये एक्स्ट्रा दिए और कहा— "ये लीजिए, चाय पी लीजिएगा।" उसने पैसे वापस करते हुए जो कहा, वो किसी भी एआई की समझ से बाहर है:
"नय रहे दहो, खाली पेटो म कि चाय पिबय... जाय छिये कुछ खाय लेबय।" (रहने दीजिए, खाली पेट क्या चाय पिएँगे, जा रहे हैं कुछ खा लेंगे।)
वो अपनी भूख मिटाने चला गया, और मैं टिनटिन के पास पहुँच गया। "BMW" का सफर खत्म हुआ, पर वो तीन जोड़ी आँखें वहीं रह गईं।

आपने बेरोजगारी, महंगाई और अर्थव्यवस्था पर आधारित बहुत सुन्दर लिखा है। सादर
ReplyDeleteहौसला अफ़्जाई के लिए बहुत आभार भाई |
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